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पकाशक--गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर (2
सं १९९३ से २०५० तक
३२ „००० सं० २०५२. आटठवोँ संस्करण
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योग ३७,०० ©
मूल्य- पचास रुपये
= मद्रक गीताप्रेस, गौरखपुर- २७ ३००५ दूरभाष -- ३३४७२१९
भीहरिः प्रस्तावना
छान्दोग्योपनिषद् सामवेदीय तलवकार बराद्यणकेः अन्तगेत है । केनोपनिषद् भी तर्वकारशाखाकी ही दै । इसलिये इन दोर्नोका यक ही शान्तिप्राड ड । यह उपनिषद् बइत ही महच्वपूणं दै । इसको वर्णन्डी अत्यन्त ऋमवद्ध ओर युक्तियुक्तं है । इसमे तचक्ञान ओर तदुपयोगी कभ तथा उपासनाओंका बड़ा विशद ओर विस्वत द्णन है । यद्यपि आजकल ोपनिषद कमे ओर उपासनाका भायः सर्वथा छोष हो जानक कारण उनके स्वरूप ओर रटस्यका यथावत् हान इने-गिने प्रकाण्ड पण्डित ओर विचारकोको दी दै, तथापि इससे कोई संदेह नदीं कि उनके मूलम जो भाव ओर उदेदय निहित ह उसी आघारपर उनसे परवतो स्मतं कमे पवं पोराणिक सर तान्त्रिक उपालना्का आविर्भाव इमा हे ।
अद्धैतवेदाभ्तकी श्क्रियाके अलुखार जीव भविद्याकी तीन शक्तियोसे आचरत दै, उह मर, विक्षेप ओर आवरण कटते द । इने मक अर्थात् अन्तःकरणकरे मलिन संस्कारजनित दोषोकी निवृत्ति निष्काम कर्मसे दोती दै, विक्षेप अर्थात् चित्तचाञ्चस्यका नाङ्वा उपासनासे दोता है ओर यावरण अर्थात् स्वरूपविस्खति या अह्ञानका नादा ज्ञानसे होता हे! इस भकार चित्तके इन चिविघ दोषोके लिये ये अरग-अकग तीन ओषधिं ह । इन तीरनोके दाय तीन ही भ्रकारकी गतिर्या दतो द । सकामकर्मा रोग धूममागेसे स्वगौदि ोकोको प्रास्त दोकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः जन्म रेते है। निष्कामकर्मी ओर उपासक अर्चिरादि मागंसे अपने उपास्यदेवके लोकै जाकर अपने अधिकारादुखार सारोक्य, सामीप्य, सारूष्य । या सायुज्य मुक्ति पा करते ह । इन दोना गतियो का इस उपनिषद्- कं पांचवें अध्यायमै विष्टादरूपसे वर्णन किया गया हे । इन दोनोँखे अरग जो तच्क्चानी होते है उनके प्राणोका उत्कमण ( रोकान्तरमे गमन.) नदीं होता; उनकं शरीर य्ह अपने-अपने तर्वोम लीन हो जाते दै मौर उन्हे यहाँ ही कैवल्यपद् प्रत दोता दै ।
[१ सिद्धान्तके ई अद्धेतसिद्धान्तके अनुसार मोक्षका साक्षात् साघन ज्ञान ही दे, इख विषयमै (ऋते श्चानान्न मुक्तिः ज्ञानादेव तु कैवस्यम्' “भथ
( ४ )
येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षव्यलोका अवसितः “सवे पते पुण्य- छोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेतिः आदि वहुत-सी श्रुतियाँ प्रमाण
। निष्काम कमं जर उपासना मल ओर विक्षेपकी निच्र्ति करके शानद्वारा मुक्ति देते दै । क्षानसे ही आत्मसाक्षात्कार दोता हे ओर फिर उसकी दष्टिम संसार ओर संसारवन्धनका अत्यन्ताभाव होकर सर्व अरोषः विरोष-शून्य पक अखण्ड चिदानन्दधन सन्ता ही रह जाती हे । इस प्रकार जव उसकी द्म पपञ्च दौ नदीं रहता, तव अपना पञ्चकोशात्मक शरीर ओर उसके स्थिति या विनाश दी कहां रद सकते है तथा उसके लिये जोचन्मुक्ति ओर विदेदमुक्तिका मी प्न नदीं रहता; वह तो नित्य सक्त ही है। उसके इख वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण अन्य लोग उसमे जीवन्मुक्ति ओर विदेहमुक्तिका आरोप करते ठँ; वद मुक दोता नीं, मुक्त
क्ञान ही है तथापि ज्ञानप्रा्तिका अधिकार प्रदान कृरनेवारे दोनेकं कारण कमं ओर उपासना भी उसदं साधन अवश्य हें । इस शाखामे कमनिरूपण पले किया जा का है; अब आस्मज्ञानका निरूपण करना हे, इसलिये यद उपनिषद् आरम्भ की गयो दै । इसमे भी तरवञानम उपयोगी दोनेक कारण पहले भिन्न-भिन्न उपासना्ओंका जिनमे पके पांच अध्यायो मघानतया उपासना्ओंका वर्णन हं ओर अन्तिम तीन अघ्यार्योमे श्ञानका ।
सम उपासना ओर ज्ञान दोनों दी विषर्योका वड़ा खुन्द्र विवेचन हे । .उन्ह खगमतासे समञ्चानेके ख्ये जगद-जगह कई आख्यायिकां भी दी गयी हे, जिनसे उन विषयों हेदयंगम होने सदायता मिलनेकं अतिरिक्त कर भकारकी रिक्षा भो मिरतो हे । प्रथम अभ्यायमं इभ्यग्राममे रहनेवाले उषस्तिको कथा हे । उषस्ति
पड़ा कि उन्दे कई दिनोतक निराहार रहना पड़ा । जव प्राणसंकरः उपस्थित हआ, तव उन्ोने पक दाथीवानसे जाकर ङ्ङ अन्न मोंगा।
९ ०क पास ऊ उडद थे; परन्तु वेरच्छिष्ट य, इसलिये उन्हे देनेम उसे हिचक दुर । परन्तु उषस्तिने उर्दीको मोँगकर अपने प्रार्णोकौ
( ५) शा कौ । जब वद उच्छिष्ट जक भी देने खगा तो उरे “यदं उच्छिष्ट & पेखा ककर निषेधं कर दिथा। इसपर जब दाथीवानने शङ्का की कि क्या जूठे उड़द खानेसे उच्छिष्ट-भोजनका दोष नदीं हभा ? तो वे बोटे- (न वा अलीविष्यमिमानखादन्.“““कामो मे उदपानमू'
घर्थात् इन्हे ल्लाये विना म जीवित नीं रह सक्ता था, जल तो सुतर इच्छाजुसार स्त्र मिल सकता है। इस भकार उच्छिष्ट जलक्रे लिये निषेध करके उन्दने यद मादौ उपस्थित करः दिया कि मयुष्य आचारसम्बन्धो नियर्मोकी उपेक्षा भी तभी कर सकता & जब कि उसके विना भाणरश्ताका कोर दूखण उपाय दी न दो।
पथम अच्यायसरै जो शिलकः, वैकितायन ओर भ्रवादणका संवाद् दे तथा पञ्चम अध्यायमे जो उदएलकके साथ भ्राचोनशालादि पंच महषियोँने राजा अश्वपतिके पास जाकर वैश्वानर आत्माके विषयत जिक्नासा की डे, उन दोनों प्रसं गोसे यद बात स्पष्ट होती है कि सनातन शिष्टाचारे अदुखार उपदेश देनका अधिकार ब्राहमर्णोको दी दे; परन्तु यदि कोड उच्छृष्ट विद्या किसी अन्य द्विजातिके पासदोतोभी ली जा सकती दे । किसी मो कदथाण- कारिणी विद्याको ब्रहण करनेके लिये मलुष्यको कितने त्याग, तप, खेवा, सत्य ओर विनय आदिक आवदयकृता हे-यद बात कड आख्यायिकां प्रददीत की गयी है । राजा जानश्चतिने संवशे- विद्याकी भिक ल्ियि गाडीवाले रेक्वका तिरस्कार सहा ओर उन्हें बहुत-सा धन, राज्य एवं अपनी कन्या देकर मी उख विद्याको अ्रदण किया । इन्द्रे आत्मविद्ाकी भ्ासिके ल्य पक सो पक चषेतक ब्रह्मचयेवबतका पारन किया, सत्यकाम जाबालने जब अपने गुड हारिद्रुमत गोतमसरे उपनयनके व्यि प्राथंनाकी ओर उन्दने उसका गोज पृछा तो उसने उस विषयमे अपने अश्ञानका कारण स्पष्ट श्दोम कट दिथा; उसके श्स स्पष्ट कथने दी जाचार्यको निश्चय द्यो गया कि यह ब्राह्मण ही है मोर उर्ोन उसे दीश्चा दे दी । फिर सत्यकामने गुरुसेवाके पमावसे ही ब्रह्मविद्या प्रत्त कर री । सत्यकाम आचाय हारिद्रमतके पास विद्याध्ययनके क्थ गया था; भाचायैने उसका उपनयन कर उसे चार सौ गो देकर आक्षा दी कि र्हं जंगम छे जाओ; जवतक इनकी संख्या
( & )
वदृंकर पक सल्ल न टो जाय तवतक भत कोटना । बालक सत्यकामने शुख्जीके इस आदेशका ध्राणपणस पालन किया ओर केवर गोचारणद्धारा दी उसे गुसरृपासे जह्यज्ञान प्राक्त हो गया । जिस समय वह गोर्ओंको केकर गुरुजीके पास आया उस समय उखके तेजको देखकर उनः भी कहना पडा-
श्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु ववानुराशास'
ह सोम्य ! त् ब्रह्मवेत्ता-सा जान पड़ता ह, तुचे किसने उपदेशच दिया है इसी प्रकार सत्यकामके शिष्य उपकोसरको मी श्रियमालुसषर अधचिहोत्र करते-करते ही शुरङपासे ब्हावियाकी सि हो गयी । इन चषटान्तोका माराय यही है कि जिस पुरषका जिख समय जो कर्तव्य है उसे उस सभय सवंथा उसीको यथावत् रूपसे पालन करना चादिये । अपने क्त॑न्यका यथोचित रीतिसे पारन करना ही कर्याणकारक हे ।
सतम जध्यायमे सनत्कुमार ओर नार दका संवाद् है। देवर्षि नारदजी आ्मक्ञानको जि्ासासखे खनछकुमारजीकी शरणमे जाते
। खनलकमारजी पृते दहै तुम सुञचे यह वतलाभो कि कौन-कौन विद्याष् जानते हो ? उससे आगे तँ उपदेश करूगा ।' नारदजी कहते हभ ऋग्वेद, यजुवद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण- रूप पञ्चम वेदः व्याकरण, ्रादकट्प, गणित, उत्पातक्ञान, निधि- राख, तकरा नीतिशाखन, निरुक्त, शिक्षा, भ्रूततन्त, धनुवेद्, उयोतिष, गाख्ड ओर संगोतविद्यया-ये सव जानता हं ।' ` इतनी विया जाननेपर भी नारद्जीको रन्ति नही हे; शान्ति मिके कैसे ? किसी राजाको राज्य, वैभव, खी, पु ओर सम्मानादि सभी भ्रात 26 परन्तु उसके शरीरम भयंकर पीड़ाहोतो वह सारा वैभव भौ उस शान्ति नहीं दे सकता ? इसी ` भकार संसारका
ः गवानका साक्षात्कार किये दःस छरकारा पाना आका्चको चमङ़के समान ख्पेट खेनेकी तरह असम्मव टै--
यदा चमेवदाकाशं वे्टविष्यन्ति मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविप्यति ॥
( ७ ) सीसे नारदजो कते दै - सो ह मगो मन्त्रविदेवास्मि ना्मविच्छुतः हयव मे भगवदूटशेभ्य- स्तरति शोकमात्मदिदिति सो हं भगवः सोचामि तंमा भगवाञ्छोकस्य पार तारयतु । ( ७।१।२ )
प्भगवन् ! म केवल शाखक् ह, मारमन्ञ नहीं हं । मैने आपजेसो- से सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर छेता हे ओर सुद शोक है, इसलिये भगवान् सुञ्चे शोकसे पार करं । इससे थह निश्चय हता है कि कवल शाखन्ञानसे संखतिचक्ररूप शोकससुद्रको पार नटीं किया जा सकता; इसकं चियि तो अनुभवको आवद्यकता हे। जब सर्व॑तन्तरस्वतन्त्र, अशेषविद्यामहाणेव देवषि नारदको भी उनको विद्या शन्ति प्रदान नदीं कर सकी तो दम-जेसे साधारण जीर्बोकी तो बात दीक्षया हे?
इख रकार दम देखते द कि इख उपनिषद् बहुत-से उपयोगी विषय ह । प्राचीन कालसे दी इखका बहुत मान रहा दे । वेदान्त सूर्मि जिन तियो पर विचार किया गया दै उनमै सवसं अधिक दसी उपनिषद्की देँ । इसका क्ञानकाण्ड तो जिक्ञास्ुओकी अक्षय निधि दे । जो “तच्वमसिः महावाक्य अद्धेतसस्ध्दायमे बह्यात्मेक्य- बोधका प्रधान साधन माना जाता हे वह भी इसीके छठे अभ्यायम आया दे । वदँ आरणिने भिन्न-मिन्न दृष्टान्त देकर नो बार इसी वाकयसे अपने पुत्र च्वेतकेतुको आरमतस्वका उपदेश किया हे।
ओपनिषद्-दशन द सम्यण्द शन हे । इससे भवमयका निराख होकर आत्यम्तिक आनन्दकी भ्रासि होती दे । इस ष्टिको भास् कर लेना हो मानव-जोवनका प्रधान उदय ह--यदी परम पुरुषाथे हे । इसे पाये विना जीवन व्यथं दै, इसे न पा सकना ही सबसे बड़ी
हानि हे; यदी बात केन-भरति भी कदती है
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । ( २।५ )
अतः इस दष्िको श्रा करनेके छिये भ्त्येक पुरुषको भ्राणपणसे ययतन करना चाद्ये । भगवान् हमे इसे पास करनेकी योग्यता द् ।
| अयुवादक-
~ ~ कनद कन नन ¬ = - (^ ~ काकाः ` नररा
भीदरिः
विषय-सूची ` विष्य १. शान्तिपाठ
प्रथम अध्याय प्रथम लम्ड २. सम्बन्ध-माष्य ३. उद्रीयदष्टिसे ओंकारकी उपासना ४. उदरी यका रखलमत्व । < ५. उद्रीयोपाखनान्तर्गत ऋक् , साम ओर उद्रीयका निर्ण ६. ओंकारं संखष्ट मिथुनके समागमका फट न ७. उद्गीयदष्टसे ओंकारकी उपाखना करनेा फठ ८. ओंकारकी समृद्धिरुणवत्ता ९. ओ कारी स्तुति < १०. उद्गीयवियाके जानने ओर न जाननेकाखेके कर्मा मेद दवितीय खण्ड १9. पराणोपाखनाकी उक्कृषटता सूचित करनेवाटी आख्यायिका १२. घाणादिका सदोषत्व ^^ १३. मुख्य प्राणद्रारा अबुरोंका पराभव १४. प्राणोपासकका महत्व १५ भराणको आङ्गिरस संशा होनेमे हेवु १६. प्राणकी बदस्मति संखा होनेमे देत १७. प्राणकी आयास्य संशा होनेमे देव॒
१८. प्राणदष्टिसे ओंकारोपासनाका फडः ००
पृष्ठ २५
४७ ४९ ५४ 9 ५९ ६१ ६१ ६२
र न किर च
( ‰ )
त्रतीय खण्ड १९. आदित्यदष्टिसे उदगीयोपासना = २०. सूं ओर प्राणकी समानता तया प्राणदश्टसे उद्गीथोपासना २१. व्यानटदष्टिसे उद्गीथोपासना [न
२२. व्यानप्रयुक्त दोनेसे वाक , ऋक् › साम ओर उद्गीथकी समानता &९
२३. उद्गीथाश्चरोमे प्राणादि २४. उदुगीथाक्षरोमे चुलोकादि तथा सामवेदादि दृष्टि २५९. सकामोपासनाका क्रम चतुथं खण्ड २६ उदुगीयसंहक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका “““" २७. ओंकारका उपयोग गोर महत्व ` = २८. ओंकारोपासनाका फक पश्चम खण्ड २९. ओंकार, उद्गीथ ओर आदित्यका अभेद ३०. रर्मिदटिसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान ओर फक ३१. मुख्य प्राणदष्टिसे उद्गीथोपासना क ३२. प्राणभेददष्टिसे मुख्य प्राणकी व्यस्तोपाखनाका विधान ओर फलक ३३. प्रणव ओर उदूगीयका अभेद् + षष्ठ खण्ड ३४. अनेक प्रकार कौ आधिदेविक उद्गी थोपासनार्े सप्तम खण्ड ३५. अध्यात्म-उद्गी योपासना ३६. आदित्यान्तगंत ओर नेत्रान्तगत पुरषो की एकता ३७. इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फक अष्टम खण्ड ३८. उदूगीयोपाखनाकी उक्कृष्टता-प्रद्रिीत करनेके छथि शिलकः, दाह्य ओर प्रवाइणका संबाद " नवम स्रण्ड ३९. शिकककी उक्ति--आका ही सबका आश्रय ह
३1 ६५ ६७ ७२ ७३ ७७
० ८१
-* १०३
` १०६
र)
४०. आकाशसंश्क उद्गी थकी उत्कृष्टता ओर उखकी उपासनाका फल ११८
द्म खण्ड ४१. उषस्तिका आख्यान 9 ४८२. राजये उषस्ति ओर छविजोका संबाद र
१ ०००४ १२८ ~
( १० ) एकादश्न खण्ड ४३. राजा ओर उषस्तिका संवाद ४४. उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रशन
४५. उषस्तिका उत्तर-ग्रस्तावानुगत देवता प्राण है ४६. उद्गाताका प्रन
४७. उषस्तिका उत्तर--उद्गीयानुगत देवता आदित्य है “.-
४८. प्रतिहतांका प्रन ४९. उषस्तिका उत्तर--प्रतिहारानुगत देवता अन्न है दरादद्य खण्ड ५०. शओोवसामसम्बन्धी उपाख्यान ५१. कुत्तोद्रारा किया हुआ हिंकार ` श्रयोद्श्च खण्ड २" सामाबयवभूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासना ५३. स्तोभाक्षरसम्बन्धिनी उपाखनाओंका फल
द्वितीय अष्याय
५५
„9
ग्रथम खण्ड ५४. साधुदृष्टिसे समस्त सामोपाखना दितीय खण्ड ५५५. लोकविषयक पाच प्रकारकी सामोपाखना
+£. आङृत्तिकाछिक अधोमुख कोको पञ्चविघ सामोपासखना
त्रतीय खण्ड
५७. बृष्टिविषयक पाच प्रकारकी सामोपासना चतुथं खण्ड
4८. जलबिषयक पोच प्रकारकी सामोपाखना पञ्चम सखण्ड
५९. ऋुतुविषयक पोच प्रकारकी -सामोपासना षृष्ठ खण्ड
६०. पञ्युविषयक पच प्रकारकी सामोपासना सप्तम खण्ड
89. प्राणविषयक पांच पक्तारकी सामोपाखना *“
मष्टम खण्ड
&२. वाणीविषयकं ससि सामोपासना ०५५
॥ २) ` १३३ ˆ १३३ ` १३५ ९.१४ “ १३६ ` १३६
ˆ“ १३८ ˆ १४२
` १४४ “ १४७
७१ १ ४ ९
“" १५४ ००४ १ ९4। ९, ७
` १५९
"“" १६१
` १६३
` १६५
` १६७
“ १७०
भा
( ११ ) नवम खण्ड ६३. आदित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपाखना दश्नम खण्ड ६४. सूद्युसे अतीत ससतविघ सामकी उपाखना एकादश खण्ड &"4. गायत्रखामकी उपाखना द्रादश्च खण्ड ६६. रथन्तरखामकी उपासना च्रयोदश्च खण्ड ६७. वामदेन्यसामकी उपाखना # 4 चतुर्दा खण्ड ६८. बृहत्छामकी उपाखना पञ्चद्श्च खण्ड ६९. वरैरूपसामकी उपासना षोडश खण्ड ७०, तैराजसामकी उपासना सप्तदश सखण्ड ७१. शक्वरीसामकी उपासना अष्टादश लण्ड ७२. रेवतीखामकी उपाखना ् एकोनविंश खण्ड ७३. यश्ायज्ञीयसामकी उपासना ९ कि खण्ड ७४. राजनसामकी उपासना एकर्विंश्च खण्ड ७५५. स्वविषयकं सामकी उपासना - ०० ७६. स्वविषयकं सामकी उपासनाका उत्कं ५ = द्वाविंश खण्ड ७७. विनर्दिगुणविशिष्ट सामकी उपासना °> ७८. स्तवनके समय ध्यानका प्रकार ००० ७९. स्वरादि वर्णोकी देवात्मकता ० ८०. वर्णोकि उच्वारणकालमें चिन्तनीय च ००
१७३
१८१
१८७
१८९
१९१
१९२ १९४ १९६ १९८ १९९ २०० २०२
र् २०६
२०८ २१० २१० २१२
( १९६ ) श्रयोक्ि खण्ड
८१. तीन घमस्कन्ध ८२. चयीविदया ओर व्याहृतिर्योकी उत्पत्ति ८३. ओंकारकी उत्पत्ति चतुरविद्च सण्ड ८४. सवननके अधिकारी देवता <+. साम आदिको जाननेवाला ही यञ्च कर सकता है ८६. प्रातःसवने वश्ुदेवतासम्बन्धी सामगान ८७. मध्याहख्वनमें सद्रसम्बन्धी सामगान
८८, तृतीय सवनम आदित्य ओर विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान
ठतीय अध्याय म्रथमं खण्ड
८९. मधुविद्या
९०. आदित्यादिमें मधु आदि दृष्टि
९१. आदित्यकी पूर्ेदिक्छम्बन्धिनी किरणो मधुनाढ्यादि दष्ट द्वितीय खण्ड
९२. आदित्यकी दक्षिणदिक्सम्बन्षिनी किरणोंमे मधुनाङ्यादि दृष्टि
तृतीय खण्ड
९३. आदिव्यकी पश्चिमदिक्घम्बन्विनी किरणो मघुनाब्यादि दृष्टि
चतुथं खण्ड
१४. आदित्यकी उत्तरदिक्खम्बन्धिनी किरणोमिं मधुनाल्यादि दृष्टि पच्चम खण्ड
९५. आदित्यकी ऊष्व॑दिक्सम्बन्धिनी किरणोमिं मधुनाल्यादि दष्ट षष्ठ खण्ड
५६. वसुरओंके जीवनाश्रयभूत प्रथमः अमतकी उपासना ˆ“ सप्तम खण्ड
९७. सद्रोके जीवनाश्रयभूत द्वितीय अधृतकी उपासना `“ अष्टम खण्ड
९८. आदित्योकि जीवनाभयभूत तृतीय अभूतकी उपासना.“ नवम खण्ड
९९. मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुरं अमृतकी उपासना दाम खण्ड
१००. खार्योके जीवनाशयभूत पञ्चम अमतकी उपासना ----
२१४ २३० २३१
२३३ २३४ २३५ २३८ २३९
२४२ २४३ र
२४९ २५१ २५२ २५५४ २५७ २६२ २९४ - | २६८
२७०
( १३ )
एव्दञ्च खण्ड
१०१. भोग-क्चयके अनन्तर खबका उपसंहार हो जानेपर
आदित्यरूप ब्रह्म की स्वस्वरूपर्मे स्थिति
१०२. त्रह्मढोकके विषयमे विद्वानका अनुभव
१०३. मधुविद्राका फठ्
१०४; लभ्पदायपरम्परा द्राद्श्च चण्ड
१०५५. गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना &
१०६. कार्यब्रह्म जौर शुद्धवह्मका मेद
१०७. भूताकाश्च, देहाका् ओर हृदयाकाश्चका अमेद् श्रयोदस्च खण्ड
१०८. हृदयान्तग॑व पूव॑सुषिभूत प्राणकी उपासना
१०९. दृद्यान्तग॑त दश्चिणयुषिभूत व्यानकी उपासना ¬
९५०. हृदयान्तर्गत पश्रिमसुषिभूत अपानकी उपासना
१११. इदयान्तरगत उष्ठरसुषिभूत समानकी उपासना
१२, इदयान्तगंव ऊष्व॑सुषिभूत उदानकी उपासना
११३. उपयुक्त प्राणादि द्वारपार्खोकी उपाखनाका फक `
११४. इदयस्थित मुख्य ब्रह्मकी उपासना ९०० ११५. हृद्यस्थित परम ज्योतिका अनुमापक लिङ्ख न ४ चतुदश खण्ड
( शाण्डिल्यविद्या ) ११६. सर्वदृष्टिसे ब्रह्मोपासना ११७. समग्र ब्रह्मे आरोपित गुण ^< ११८. बह्म छोरे-से-छोटः भर बदे-से-वडा हे क ११९. इदयस्थित ब्रह्म ओर परत्रह्मकी एकता प्चदन्न खण्ड १२०. विराय्कोशोपाखना षोड खण्ड १२१. मात्मयश्ञोपासना (2 सप्तदश्च खण्ड १२२. अ्चयादि फर देनेवाटी आत्मयज्ञोगसना अष्टादश खण्ड १२३, मन आदि दृष्टस अध्यात्म ओर अ!षिदेविकं श्रहोपाखना
२७२ २७२ २७४ २७५
२७८ २८४ २८५५
२८९ २९१ २९२ २९४ २९५ २९६ २९८ २९९
३०३ २०६ २११ २१२
३१६
२३२३
२३०
११३८
( १४ )
एकोनविंश सण्ड १२४. भादित्य मोर अण्डटष्टिसे अभ्यारम एवं आषिदैविक उपाखना-^. ३४४ चतुथं अध्याय म्रथम खण्ड १२५. राना जानभुति ओर रैक्वका उपाख्यान “ = ३५२ दवितीय खण्ड ° १२६. रेक्वके ग्रति लानभुतिकी उपखत्ति ““ “३६३ ततीय खण्ड १२७. शक्वद्वारा संव्गवियाका उपदेश न १९ १२८. संवर्गकी स्तुतिके स्थि मस्यायिका ०० ३७२ चतुथं खण्ड १२९. सत्यकामका ब्रह्मचयं-पाठन ओर वनम लाकर गौ चराना “~ ३८० पत्म लण्ड १३०. इषमदवारा सत्यकामको ह्मे प्रथम पादका उपदेश. ~ ३८६ षष्ठ सण्ड । १३१. अग्निद्धारा ब्र्मके द्वितीय पादका उपदेश ~ सप्तम खण्ड १२२. हंसद्टारा ब्रह्मके तृतीय पादका उपदेश न ~“ ३९२ अष्टम खण्ड | १३२. मद्रुदरारा ब्रहमके चदं पादका उपदेश ० „० नवम खण्ड । १३४. सत्यकामका आचायकुढमे परहुचकर आचायदारा पुन उपदेश प्रहरण करना ३९७ द्श्चम खण्ड १३५. उपकोसलके प्रति अगनिद्रारा नक्षविद्याका उपदेश "^° "न एकादश्च खण्ड १३६. गा्हपत्याग्निविद्या न्न द्वादग्न खण्ड १३७. अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या क
४१२
१३८.
११९.
4.४९,
१४९. १४२.
१४३. १४४. १४८९.
१४६. १४७.
१.४८.
१४९. १५०.
१५९१. १५२.
१५५३.
१५४. १५५. १५६.
१५७.
१५८.
१५९९. १६४६०,
( ५ ) च्रयोदश्च खण्ड आहवनीयाग्निविद्या भस
चतुदश खण्ड आचा्य॑का आगमन आचाय ओर उपकोसलका संवाद प्चदश्च खण्ड आचा्यका उपदेश-नेत्रस्थित पुरूषकी उपासना“. ब्रह्मवे्ताकी गति ४ षोडश्च खण्ड यश्ञोपासना रक्षके मोनमज्गसे यशकी हानि ब्ह्माके मौनपाटनसे यशकी प्रतिष्ठा सप्तदश्च खण्ड यश्च दोषके प्रायश्चितरूपसे व्याहतिरयांकी उपासना" विद्धान् बरह्माकी विशिष्टता 5
पचम अन्याय
प्रथम खण्ड ख्येषठभेष्ठादिुणोपासना इन्दरिर्योका विवाद प्रनापतिका निणेय वागिन्द्रियकी परीश्चा चक्षुकी परीश्चा ओ्रकी परीक्षा मनकी परीश्चा प्राणकी परीश्चा ओर विजय इ्धिर्योद्वारा प्राणकी स्वति
द्वितीय खण्ड प्राणका अननिरदेश प्राणका वखनिर्देश प्राणविद्यादी स्तुति ए
॥ 811
४१६ ४१७
४२०
४२३
४२८ ४३० ४३२
" ४३४ ४३८
४४ ४४४
४४८ ४४९ ४४९
४/९.
४५२
४६९० ४६३ १११०. ॥ 1 ६४
( १६ ) ततीय खण्ड १६१. पाञ्चाछोकी सभामें श्वेतकेतु १६२. प्रवाहणके प्रश्न ००५ १६३. प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेठका अपने पिताके पास आना १६४. पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना १६५५. प्रवाहणका वरप्रदान चतुर्थं खण्ड १६६ पञम प्रशनकां उत्तर १६७. लोकरूपा अग्निविद्या पञ्चम खण्ड १8८. पर्जन्यरूपा अग्निविद्या ~“ ~ षष्ठ खण्ड १६९. प्रथिवीरूपा अग्निविद्या सप्तम खण्ड १७०. पुरषरूपा अग्निविद्या ` अष्टम खण्ड १७१. खीरूपा अग्निविद्या नवम् खण्ड १७२. परञ्चम आहूति पुरषत्वको प्रा हूए आपकी गति द्म खण्ड १७३. प्रथम प्रदनका उत्तर ~ १७४. तृतीय प्ररनका उत्तर ग ८ देवयान ओर धूमयानका व्यावत॑नस्थान ) १७५५. द्वितीय प्ररनका उत्तर 9 ८ पुनरावतैनका क्रम ) १७६. अनुशयी जीर्वोकी कर्मानुरूप
१७७. चतुथ प्रदनका उत्तर ००
( अशखरीय प्वृत्तिवालोकी गति ) १७८. पांच पतित १७९. पञ्चाग्निवियाका महत्व
४७२ ४७३ ४७५ ७७ ४७९
४८१ ४८३
४८७ ४८९ ४९१ ४९३ ४९६
८१९०० ५१०९
५१४
५२९ ५२१
५३४ ५३५
( १७ )
एकादश्च चण्ड
१८०. जौपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक् प्रस्ताव ~" ५५३६
१८१, ओपमन्यवादिका उदाठकके पास आना = " ५३८
१८२. उद््ाठकका ओपमन्यवादिके सहित अश्वपतिके पाख आना “““ ५५३९
१८२. अश्वपतिद्वारा शरुनिर्योका स्वागत ~ ४०
१८४. अङ्वपतिके प्रति मुनिर्योकी प्राथ॑ना = . ^ ५४२
१८५. राजाके प्रति मूनिरयोकी उपस्ति ~ ` “~ (५४8 द्रादश्च खण्ड
१८६. अश्वपति ओर ओपमन्यवका संवाद - = ५४५ त्रयोदश्च खण्ड
१८७. अश्वपति ओर सत्ययशका संवाद ~ "५४९ चुं खण्ड
१८८. अश्वपति ओर इनद्रयुम्नका संवाद ( ५ 0 पञ्चदश सण्ड
१८९. अश्वपति ओर जनका संवाद "५५३ षोढङ्गा खण्ड
१९०. अरवपति ओर बुडिकका सवाद् न सप्तदश खण्ड
१९१. अश्वपति ओर उदाककका संवाद न अष्टादश्च खण्ड
१९२. अरवपतिका उपदेश वैश्वानरी खमस्तोपाखनाका फ ˆ“ ५५९
१९३. बैदवानरका साङ्गोपाङ्ग स्वस्प == “~ ५६१ एकोन्विस खण्ड
१९४. भोजनकी अग्नहोत्रत्सिद्धिके टये श्राणाय स्वाश' इख पदी
आहुतिका वणन -“ ५६३
विंश खण्ड
१९५. “न्यानाय स्वाहाः इस दूखरी आइतिका व्ण "न एकविं खण्ड
१९६. अपानाय स्वाहा, इल तीसरी आहतिका वणेन “” `" ५९९
(न) द्वावि्च खण्ड
१९७. समानाय स्वाहा' इस चौथी आहुतिका वर्णन । श्रयोविशि खण्ड
१९८. उदानाय स्वाहाः इस पांचवीं आहुतिका वर्णन “““
चतुविंश खण्ड १९९. अविद्वान्के हवनका स्वरूप २००. विद्वान्के वनका फल
षष्ट अध्यायं प्रथम खण्ड २०१. आरूणिका अपने पुत्र श्वेतकेत॒के प्रति उपदेश द्वितीय खण्ड २०२. अन्य पक्के खण्डनपूंक जगत्की सदरपताका समर्थन 4 ततीय खण्ड २०३. खष्टिका क्रम चतुथं खण्ड २०४. एकके ज्ञानसे सबका लान पश्चम खण्ड २०५५. अनन आदिके त्रिविध परिणाम षष्ठ खण्ड २०९. अन आदिका सूक्ष्म भाग ही मन आदि होता 8.5 सप्तम खण्ड २०८. षोडशकठाविशिष्ट पुरषका उपदेदय अष्टम खण्ड २०७. सुषुप्तिकाटमें जीवकी स्थितिका उपदेश भध नवम खण्ड २०९. सुषुप्तिमे सत् की प्रापिका शान न दोनेमे मघु- मक्ियोंका दष्टन्त ~+ ^“ दश्चम खण्ड २१०. नदौके द्टान्तदवारा उपदेशा एकादग्र खण्ड ` २११. इष्षके ट्टान्तद्वारा उपदेश ¦ द्वादश्च खण्ड २१२. न्यग्रो्फठके इष्न्तद्वारा उपदेश द
६७
५१६८
५६९
५६९
"७३
८२
६०४
६१३.
६२३
६२९ ६३२
६४०
६६२
६६८
६७९१
६७8६
(^)
श्रयोदश्च खण्ड २११, कवणके दष्टान्तद्वारा उपदेश चतुर्दश खण्ड
२१४. अन्यत्रसे लाये हु पुरूषके इष्टान्तद्वारा उपदे "““
पञ्चदश खण्ड २१५. ममू पुरुषके दष्टान्तद्वारा उपदेश्च षोडश्च खण्ड २१६. चोरके तप्त परदयुग्रहणके दन्तद्वारा उपदेश सष्मं अध्याय प्रथम खण्ड २१७. नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश दवितीय खण्ड २१८. नामकी अपेश्चा वाककी महत्ता ततीय खण्ड २१९. वाककी अपेक्षा मनकी भेता चतुथं खण्ड २२०. मनसे संकल्पकी भर्ता र पञ्चम खण्ड २२१. संकृत्पकी अपेश्चा चित्तकी प्रघानता = षष्ठ खण्ड २२२. चित्तकी अपेश्चा ध्यानका महत्व कः सप्तम खण्ड
२२३. ध्यानसे विज्ञानकी महत्ता अष्टम खण्ड
२२४. विज्ञानसे बकी भेता नवम खण्ड २२५. बरकी अपेक्षा अननकी प्रषानता दश्चम खण्ड २२६. अन्नकी अपेक्चा जठका महत्व एकादश्च खण्ड २२७. जककी अपेक्षा तेजकी प्रधानता > द्रादश्च खण्ड २२८. तेजसे आकाशकी प्रधानता +
+ । ०१९९९
६८०
६८५
६९४
६९८
७१०
७२१
७४
७२७
७१४
७३८ ७४२ ७४५५
७४९
७९२
८ +
त्रयोदश्च खण्ड
२२९. आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्व चतुदश खण्ड
२३०. स्मरणसे आशाकी महत्ता पञ्चदश्र खण्ड
२२१. आशासे प्राणका प्राधान्य षोडश खण्ड
२३२. सत्य ही जानने योग्य है पप्तदश्च खण्ड
२२२. विज्ञान दी जानने योग्य है अष्टादश खण्ड
२२३४. मति ही जानने योग्य है एकोनक्ि खण्ड
२२३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है विश्च खण्ड
२३६. निष्ठा दी जानने योग्य है एकर्विश्च खण्ड
२३७. कति दी जानने योग्य है द्वा्िश्च खण्ड
२३८. सुख ही जानने योग्य हे त्रयो खण्ड
२३९. भूमा टी जानने योग्य है चतुविंश खण्ड
२४०. भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन
पव्चविशच खण्ड
२४१. सर्वत्र भूमा ही है षटि खण्ड
२४२. इख प्रकार नाननेवाटेके छथि फलका उपदेश
अष्टम अध्याय
म्रथम खण्ड
२४३. दहरःपुण्डरीकमे ब्रह्मकी उपासना
२४४. पुण्यकरम॑फर्लेका अनित्यत्व ्
७६१
७६४
७६७
७७४
७७६
७७९
७८०
७८१
७८२
७८३
७८५
७८६
७९२
७९८
८०२ ८१९
। 1 0
२४५. दहर-ब्रद्मकी उपासनाका फक = २४६. २४७. २४८. २४९.
२५०.
२५१.
२५२.
२५२.
२८५४.
२५५.
२.५६.
२५७.
२८
( २१ ) द्वितीय खण्ड
त्रतीय खण्ड असत्यसे आङ सत्यकी उपासना ओर नामाक्चरोपासना चतुथं खण्ड सेवुरूप आत्माकी उपासना पञ्चम खण्ड यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यादिदृष्टि षष्ठ खण्ड हृद्यनाडी ओर सूर्यरदिमरूप माग॑की उपासना सप्तम खण्ड आत्मतच्वका अनुसंधान करनेके ल्यि इन्द्र ओर विरोचनका प्रजापतिके पास जाना ४५ पः अष्टम खण्ड इनदर तथा विरोचनका जठके शकोरेम अपना प्रतिबिम्ब देखना.“ नवम खण्ड
इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना दश्चम खण्ड
इन्द्रके प्रति स्वप्नपुरुषका उपदेश = एकादञ्च खण्ड
सुषुप्त पुखुषका उपदेश = तः दरादञ्च खण्ड
मरत्य॑शारीर आदिका उपदेश मि (८ श्रयो . खण्ड
“श्यामाच्छबलम्ः इस मन्तरका उपदेश ~~ चतुदश सखण्ड
कारणरूपसे आकासं क नद्मका उपदेश क पञ्चदश खण्ड
. ओंत्मज्ञानकी परम्परा, नियम ओर फलका बणंन ˆ“ ^“
द
८२१
८२६
८२६
८४२
प्म
८६५
८७६
८८७
८९४
९०१
९२७
९२३९
९४
केशाः कञ्जालिकासाभाः कमन्जाम्बुनगोकसः ।
विविगोपतयो ददुः करकारिपिनाकिनिः ॥
भाष्यकार भगवान् शङ्कर
छ
ॐ
तत्वद्ब्रह्मणे नमः
छान्दोग्योपनिषद्
मन्त्रा, शाङ्करमाष्य जर माष्या्थंस्हित
--~ वनय
सच्चिदानन्दसान्दराय स्वातीताय साक्षिण । नमः श्रीदेशिकन्द्राय शिवायाशिवघातिने॥
क शान्तिपाट ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणशवकषुः श्रोत्रमथो बल मिन्द्रियाणि च सर्वाणि । स्व॑ ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराया मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः! शान्तिः ॥| शान्तिः |
मेरे [हाथ-पोव आदि] अङ्ग सब प्रकारे पुष्ट हो, वाणी, पाण, नेव जीर श्रोत्र पुष्ट हो तथा सम्पण इन्दयो बर भाप कर । उपनिषदुम भति पादित ब्रह्म ही सब कुछ दे । मे ब्रह्मका निराकरण (याग).
प्रथम अध्याय
[कौ क री
गथक खणड
अक
सम्बन्ध-भाष्य
ओमित्येतदक्षरमित्यादय्टा- | ष्यायी छान्दोग्योपनिषत् । बस्याः सक्षपतोऽ्थजिहासुभ्य ऋनुविवरणमस्पग्रनथमिदमा- रम्यते ।
तत्र सम्बन्धः-समस्तं कर्मा
धिगबं प्राणादि-
देवताविज्ञानसित- म्चिरादिमार्गेण बद्मप्रतिपत्ति- कारणम् । केवर च धूमादिमा-
प्रयोजनम्
गेण चन्दरलोकप्रतिपत्िकारणम्। | चन्दरोकक़ी जो इन दोनों मगेसि पतितएवं स्वभावा-
स्वभावम्वृ्तानां च मार्गदय-
परिभ्रष्टानां कष्टाधोगतिरुक्ता ।
'ओमित्येतदक्षरम्ः इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाला यह आट अध्यार्योका भ्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद् है । उसका जथ जाननेकी इच्छावालेके किये इस छोटे-से म्रन्थके रूपमे उसकी सरह व्याख्या सक्षेपसे आरभ्भ की जाती है।
वहां [ कर्मकाण्डके साथ ] इसका सम्बन्ध इस प्रकार है-[ विहित घौर निषिद्ध रूपसे ] जाने हए समस्त कमक प्राणादि देवताओंके विज्ञान- पूवंकअनुष्ठान करनेपर वह रचि भादि
दिवयान) मागंके द्वारा ब्र्मरोकक्णी भा्तिका कारण होता है तथा केवर (उपासनारहितं) कमे धूमादि मार्गते प्रातिका हेतु होता है।
यसार भवतत होनेवाले होते है उनकी कष्टमयी अधोगति बतलायी गयी है ।
ण्ड 1
शाङ्लमाष्याथ
£
७
9 9 2 9 9 9 = क = 9 3 क 3 9 =
ज चोभयोमागंयोरन्यतर- स्मि्रपि मागं आत्यन्तिकी पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कम॑निर- वक्षमदरेतात्मविक्तानं संसार-
नतित्रयहैतपमर्देन वक्त व्यमित्यु- षनिषदारभ्यते ।
न चादेतात्मविज्ञानादन्यत्रा- त्यन्तिकी निःश्ेय- मोष्चसाषगत्वम् स॒प्रा्िः । वक्ष्यति हि-अथ येऽन्यथातो विद्रन्य-
ानस्येव
शजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति ।
( छा० उ० ७। २५।२) विपयंये च “स स्वराड्भवति" (छा० उ० ७।२५।२ ) इति ।
तथा देतविषयानृतामिसंधस्य वन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राधि-
रेत्युक्त्वादेतात्मसत्याभिसंध-
इन दोनों मागेमिंसे किसी भी एक मार्गपर रहनेते आत्यन्तिक पुरुषा्थ॑कौ सिद्धि नहीं हो खकती । अतः संसार- की [उपर्युक्त] त्रिविध गतिर्योके हितु- मूत कर्मका निराकरण करते हूए कर्मकी अयेक्षासे रहित शदरैत-भाल- जञानका प्रतिपादन करना है; इरी उदश्वसे इस डपनिषदा भारम्ब करिया जाता है ।
उद्वैतातमविज्ञानके बिना ओर किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी प्राति नहीं हो सकती । लैसा कि भागे करटैगे भी-“जो रोग इष (भद्रैतासन्ञान) से विपरीत जानते है, वे अन्यराज (अनात्माके भीन) होते ओर क्षीण होनेवाठे लोकम जते ह ।” किंतु इससे विपरीत आत्म ज्ञान होनेपर [ श्रुति कहती है कि] “वह् स्वराट् होता है १
इस प्रकार त्पे इए प्रञ्ुको अहण करनेसे चोरके जल्ने भौर बन्धनम पड़नेके समान द्वेतविषय- रूप मिथ्याम अभिनिवेश्च रखनेवाठे पुरुषका बन्धन होता दहै तया उसे संसारिक दुःखोकी भराति होती दहै--यह बताकर भरति
२८
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय १
स्यातस्करस्येव तप्तपरसुग्रहणे बन्धदाहाभावः संसारदुःखनि-
वृ्तिमक्षिथेति । अत॒ एव न करमसहमावि- क्मशचय- बद्वेतात्मद्दोनम् । निराकरणम् क्रियाकारकफलभे- दोपमर्देन ““सत्'"'एकमेवाद्वि- तीयम्"! (छा० उ० ६।२। १) “आत्मेवेदं सवम्" (खा० उ० ७।२५।२ ) इत्येवमादिवाक्य- जनितस्य बाधकप्रत्ययानुप-
` पत्तेः । कर्मविधिग्रत्यय इति चेत् ! न, कठमोक्टस्वमाव- विक्तानवतस्तजनितकर्मफलरा- गद्धेषादिदोषवतश्च कर्मविधा- नात् । विधानादद्रेतजञानबतोऽपि कमे तिच्!
यद्वत आत्मारूप परम सव्ये प्रतीति रखनेवाटे पुरुषको, जो पुरुष घोर नदी है उसके तप्त परञ्च महण करने- पर॒ दाह ओर बन्धन न होनेके समान, संसार-दुःखकी निवृ्ि ओर मोक्षकी प्राति बतलवेगी ।
इसीसे [ अर्थात् कर्मं ओर ज्ञान दोनों विरुद्ध॒फल्वले रै-रेसा निश्चय होनेके कारण दी] उद्वैतास- दशन कर्मके साथ होनेवाला नही है। कथोकि क्रिया, कारक ओर फर्छप मेदका वाध करके सत् [ ब्रह्म ] एक ओर अद्वितीय है" “यह सव॒ आत्मा ही हैः इत्यादि प्रकारके वाक्योसे उदत्न होनेवाछे अद्वैत आलसमज्ञानका कोई बाधक मल्यय होना सम्भव नहीं है । यदि कहो किं क्मविधिविषयक ज्ञान ही [ उसका बाधक ] है तो एेसा होना भी सम्भव नहीं है, क्योकि जो जपनेको स्वभावसे ही कर्ता भोक्तारूप जानता है ओर उससे होनेवाटे कर्मकर्म रागदवषप दोसे युक्त है, उसीके ल्यि करम- का विधान क्रिया गया है । शङ्का-जो सम्पूणं बेदार्थको जानने- ण हे स्यि कर्मका विधान 1 गवादे; इसण्यि अद्रैतातमज्ञानी- कोभीतो करम करना ही चाहिये ?
खण्ड १]
श्ाङ्र्भाच्याथं
2९
न; कर्माधिकृतविषयस्य कत- भोक्तादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य
“सत् एकमेवाद्वितीयम्! ध "आत्मैवेदं सवम्" इत्यनेनोप-
मदितत्वात् । तस्मादविधादि- दोषवत एव कर्माणि विधीयन्ते
नादेतक्तानवतः । अत एव हि वक्ष्यति-““सवं एते पुण्यलोका
भवन्ति ह्मसंस्थोऽस्रतत्वमेति""
( जछ° उ० २।२३। १) इदि । =, (~ न्दे विद्याप्रकरणे तत्रेतस्मिनदतविद्याप्रकरणे-
प्रकरणप्रति- ऽभ्युद्यसाधनान्यु-
पायनिस्पणम् पासनान्युच्यन्ते । कैवल्यसंनिकृष्टफलानि चादेता-
दीषद्विकृतव्रह्मविषयाणि मनो- मयःप्राणशरीर इत्यादीनि, करम- सम्द्धिफलानि च कर्माङ्गसम्ब-
न्धीनि । रहस्यसामाल्यान्मनो- इृत्तिसामान्याच; यथाद्ेतन्ञानं ।
समाधान-न्हीं, क्योकि कके अधिकारीसे सम्बन्ध ॒रखनेवाख कवरल-भोकतृ त्वादि रूप स्वाभाविक विज्ञान “सत् [ ब्रहम ] एक ओर अद्वितीय हे” “यह सव आत्मा हो हे'" इत्यादि वाक्योसे बाधित हो जाता है । इसल्यि कर्मोका विधान अविद्यादि दोषवान् पुरषके स्यि ही किया गया है, अद्ैतासन्ञानीके स्यि नहीं किया गया । इसीर्यि श्रति आगे कटैगी-“ये सव [कर्मकाण्डी] पण्यलो्कोको प्राप्त होते है तथा ब्रह्मनिष्ठ [परमहंस] अमतत (मोक्ष) को प्राप्त होता हे |" वहो इस अद्रैतदिदाविषयक प्रकरणम अभ्युदयको साधनमूता उपासनाएं बतलथी जाती है, जिन- का फलु कैवल्यमोक्षका समीपवतीं हे ओर जो अद्रेत्रहमकी अपेक्षा मनोमधः प्राणहयरीरः, इत्यादि वाक्योके अनुसार कुछ विकारको प्रप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवारी है । वे उपासना कमङ्गसे सम्बद्ध है ओर करमपरकी समृद्धि ही उनका फल हे । करयोकि रप्यमे [ अर्थात् उप- निषद् शब्दसे ज्ञातव्य होनेमे ] तथा मनोवरत्तिरूप होनेमे उन (आसज्ञान ओर उपासनाओं ) में समानता है [इसीसे वे उपासना आत्विदयाके प्रकरणम रक्खी गयी है ] । जिस
|
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय १
ऋ ९
मनोवृत्तिमात्रं तथान्यान्यपयुपा- | भकार अदवतजञान मनोदृपिमात्र ह
सनानि मनोबृ्तिरूपाणीत्यस्ति हि सामान्यम् । कस्तदयदेतन्ञान- स्योपासनानां च विशेषः ! उच्यते--
स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रिये- शनोपाखनबो-ऽभ्यारोपितस्य कर््रा- वि्ेषः दिकारकक्रियाएल- भेदविज्ञानस्य निवतंकमदेतवि- ज्ञानम्, रज्ज्वादाविव सर्पाद्य- ध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्वादि स्वरूपनिश्वयः प्रकाशनिमित्तः । उपासनं त॒ यथाजाखरसमथितं किञ्चिदालम्बनगुपादाय तस्मिन् समानचित्तवृत्तिसंतानकरणं त-
ल (~
दिरक्षणम्रत्ययानन्तरितमिति ` विषः ।
तान्येतान्युपासनानि स्न- धुद्धिकरत्वेन वस्तुतच्चावभास- कत्वादद्ेतत्तानोपकारकाण्याल- म्बनविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति
- पूर्युपन्यस्यन्ते । तत्र क्माम्या- है
उसी प्रकार अन्य उपासनाएे भी मनोषृत्तिूप ही है--यही उन दोनो. की समानता है । तो फिर बद्रेतञ्चान भर उपासना्भोमं अन्तर क्या षै ! स्लो बतसया जाता - भदरेतामञ्ान अक्रिय आत्म स्वमावसे ही रोपित कर्ता भादि कारकः,क्रिया भौर ॒फरके मेदज्ञान- की निवृत्ति करनेवाखा ठै, जिस प्रकार फ प्रकशके कारण होनेवाख रज्जु आदिक स्वषूपका निश्चय रज्जु भादि- म आरोपित सर्पादिके ज्ञानको निवृत्त करदेता है। रितु उपासना तो किं्ी शखोक्त आरम्बनको ग्रहण फर उसमे विन[तीय प्रतीतिसे अग्यवदहित सदश चित्तपृत्तिका परबाह करना है- यही इन दोनोमे अन्तर है । वे ये उपासना चित्त्ुद्धि करनेवाली होनेसे बस्तुतस्वकी भकारिका होनेके कारण अद्वैत- नमे उपकारिणी रै तथा आलम्बन- यक्त होनेके करण घुगमतासे सम्पन्न की जा सकती है-इसीरिये इनका पहङे निरूपण किया जाता । वहं [ साघारण पुर्पमिं ]
सस्य॒दृदीकृतत्वात्कमंपरित्या-
गेनोपासन एव दुःखं चेतः- त 0 (~ माङ्गवि
समपंणं कतुमिति कर्माङ्गविषय-
तावदादावुपासनष्ुषन्य-
मेव स्यते-
कमभ्यासकी इढ़ता होनेके कारण कर्मका परित्भाग करके उपासनारमे ही चित्तको लगाना त्यन्त कठिन षै । इसीसे सवते पढे कम्ग- सम्बन्धिनौ उपासनाका दी उन्टेल किया जाता है--
उद्गीथदष्टिसे जोकारकी उपासना ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति हयद्गायति तस्योपग्याख्यानम् ॥ १ ॥ ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसफी उपा्चना करनी चाहिये । ॐ पेसा [उच्चारण करके यज्ञमे उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) करता है । उस ८ उदूगीथोपसना) की ही व्याख्या की जाती ह ॥१॥
ओमित्येतदक्षरमुद्रीथयुपासी- त॒ । ओमित्येतदक्षरं परमा- त्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम् । तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति ग्रियनामग्रहण इव लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्त
मभिभायकत्वाद्ष्यातितं
उद्गीथशब्दवाच्य “ॐ इस अक्षरी उपासना करे-ॐ यह अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती ८ प्रियतम ) नाम हे । उसका प्रयोग (उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न होता हे,निस प्रकार कि साधारण रोग अपनाप्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होते है । वह ओंकार यहाँ ( इस मन्त्रम ) इतिपरक ८ जिसके आगे इति शब्द् है; एेसा ) प्रयुक्त हा है । अर्थात् परमाताका भभि-
धायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा
गब्दस्वरूपमाध्रं प्रतीयते । चाचादिवत्परस्यारमनः
व्यावर्तत ८ प्रथक् निर्दिष्ट ) होकर वह केवर शब्दस्वरूपसे प्रतीत होता हे ओर इस प्रकार वह मूरति
| |
| ३२ प्रतीक सम्पद्यते । एवं नामत्वेन म्रतीकत्वेन च परमात्मोपासन-
साधनं श्रेष्टमिति सववेदान्तेष्व वगतम् । जपकर्मस्वाध्याया- न्तेषु च बहुशः प्रयोगास्र- सिद्धमस्य श्रेष्चम् । अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मक- मदरीथमक्त्यवयवत्वादुद्रीथ- शब्दवाच्यमुपासीत । क्माङ्गा- वयवभूत॒ अकारे परमात्म- प्रतीके दृटामैकाग्ररक्षणां
मतिं संतटुयात् । स्वयमेव
भरुतिरोङ्कारस्योद्रःथशब्दवाच्य- त्वे देतुमाद- ओमिति दद्रा
यति । ओभित्यारम्य हि
यस्मादुद्रायत्यत उद्धीथ ओङ्कार इत्यर्थः |
छान्दोग्योपनिषद्
[ अन्याय १
~अ आदिके समान परमात्ाका प्रतीकं
टी सिद्ध होता है । इस तश नाम ओर प्रतीकरूपसे वह परमालाकष उपासनाका उत्तम साधन दै-पसा सम्पूणं बेदान्त-मरन्थोमिं विदित है । जप, कर्म ओर स्वाध्यायके आदि एवं अन्तम इसका बहुधा प्रयोग होनेके कारण # इसकी श्रेष्ठता प्रसिद्ध हे।
अतः वह यह षर्णह्धप अक्षर उदूगीथमक्तिका अवयव होनिके कारण “उद्गीथः शब्दवाच्य दै, इसकी उपासना करे । अर्थात् [ उद्गीथ- ] कर्मके अङ्गमूत ओर परमात्माके ' प्रतीकस्वरूप ओंकारे पु्दर॒एकाप्रतारूप बुद्धिको भवि- च्छिन्न भावसे संयुक्त करे । ओंकारके उद्गीथः शब्दवाच्य होनेमे श्रुति स्वयं ही हेतु वतलाती है-ॐ ठेसा कहकर -उदगान करता है-क्योकिं उद्गाता ॐ इस अक्षरसे आरम्भ करके उद्गान करता हे, इसल्थि
ओंकार न | शार वीय ह) हे। ® जेसा किं भगवानने मी कदा दै--
तस्मादोमिव्युदादहृत्य
` यज्ञदानतपःक्रियाः ।
्रवतन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ ( गीता १७ । २४ ) ` इसलिि वेदमन्वंका उच्चारण करनेवाठे भध पुरुषोकौ शालविधिसे नियत
यज्ञ, दान ओर तपल्प क्रियाएे खदा "ॐ इस परमात्माके नामको उच्चारण
करके दी आरम्भ होती रे |?
¶ सामवेदीय स्तोत्रविशेषका नाम उद्गी यभक्तिः ह । इसलिये इसे उद्गीय कदा गया ह ।
है । ओंकार उसका धशा
ख्ड १ | श्ञाङ्करभाष्या्थं । ॐ 2 9 क ॐ > ॐ ॐ क ॐ > ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ. ॐ 9 तस्योपव्याख्यानम्-तस्याक्षर- | [ यहो ] उसका उपन्याख्यान आरम्भ किया जाता है-उस अक्षरकी
स्योपव्यारयानमेवमुपासनमेवं- | सम्यग् व्याख्या कौ जाती है । स प्रकार उसकी उपासना होती दै, यह
विभूत्येवंलमित्यादिकथनयुप- | उक विमूति दे ओर् बह फक ई इत्यादि प्रकारका जो कथन दै,`
व्याख्यानम् उसे उपव्याख्यान कते ह । यँ
, श्षतैत शृति ्रवर्तते' ८ आरम्भ किया नाता दै )
बाक्यरेषः ॥ १ ॥ यह् क्रियापद वाक्यशेष है ॥ १ ॥
उद्रीथका रसतमत्व एषां भूतानां एथिवी रसः एथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋस यः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः॥२॥
इन [ चराचर ] प्राणियोका परथिवी रस ( उत्पत्ति, स्थिति ओर रुयका स्थान ) द । एरथिवीका रस जक दै, जलका रस॒ ओषधिं है, ओषधियोंका रस पुरुष दै, पुरुषका रस वाक् दै, वाकका रस ऋक् हे, छक्का रस साम है भौर सामका रस उद्गीथ हे ॥ २॥
एषां चराचराणां भूतानां | इन चराचर मर्तोका परथिवी रख . | गति-परायण अर्थात् आश्रय `हे ।
परथिवी ए गतिः ६५. एथिवीका रस आप्(जक) है, क्योकि म्भः । पृथिव्या अपो रसोऽपस | परथिवी जरम ही ओतपोत कै, हि ओता च प्रोता च पृथिवी, | सख्यि वह एथिवीका रस दै । अतस्ता रसः प्रथिव्याः । अपा- | मका रस॒ ओषधियां है, कयाकि मोषधयो रसः, अष्परिणामत्वा नातिवा व श
:\ ~
उन ( ओषध्यो ) का रसं दोषधीनाम् । तासां पुरुषो रसः, ह, क्योकि पुरुष नरदेह ) न
अननपरिणामत्वासुरुपस्य | | ह परिणाम ह ।
३४ 9 ¬-ऋ
[ अध्याय १
तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, | उस पुरुषका भी रस वाक् है|
पुरुषावयवाना हि वाक्सारिषठा, अतो वाक् पुरुषस्य रस उच्यते । तस्या अपि वाच ऋग्रसः सार
तरा। ऋचः साम रसः सार- तरम् । तस्यापि साम्न उद्रीथः
प्रकृतत्वादोकारः सारतरः ॥२॥ एवम्- ..
पुरुषके अवयरवोमे वाक ही सवसे अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक् पुरुषका रस कही नाती है । उस वाणीका भी उससे अधिक सारभूत ऋक् ही रस है, ऋका रस साम हे नो उससे भी अधिक सारतर वस्तु ह तथा उक्त सामका भी रस उद्गीथ (ॐध्कार) हे । यँ उदुगीथ राब्दसे ओंकार ही लेना चादिये; क्योकि उसीका प्रकरण है, यह
सामसे भी सारतर है ॥ २॥ | इस प्रकार ~
स पष रसान! रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो |
यदुद्गीथः ॥ ३ ॥
यह जो उद्गीथ है वह सम्पूणं रसेमिं रसतम, उक्कृष्ट, परमात्माश्न प्रतीक होने योग्य ओर एथिवी [ आदि रसोमे ] आवो है ॥ २ ॥
वह यह उद्गीथसंज्क ओंकार । भूत आदिके उत्तरोत्तर रसम अतिशय रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका , प्रतीकं होनेके कारण परम (उट । है, पराध हे--अरथं कहते है स्थानकरो , जो पर होते हुए अधं भी हो उसका ।
स॒ एष उद्वीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामति- शयेन रसो रसतमः परमः प्रमात्मप्रतीकल्वात् । परारध्यः- अधं स्थानं परं च तदर्ध च प्राधं तदतति परार्ध्यः परमात्मस्थानाहः परमात्मबद्पा- स्यत्वादित्यभिप्रायः । अष्टमः पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्रीथो य उद्रीथः ॥ २ ॥
नाम पराध हे, उसके योग्य होनेसे यद पराध्यषे;तासयं यह है कि परमातमा के समान उपासनीय होनेके कारण यह परमात्मा आलम्बन होने योग्य हे । तथा यह् जो उदुगीथ है पथिवी
आदि ररसोकी गणनामे आखव हे॥३॥
|
खब्ड १] छाङ्करभाष्याथं ३९ ८-9-89 उद््गीोपासनान्तगत ऋक्, साम ओर उद्गीथक्षा बिणय
वाच ऋग्रस इत्यक्तम्-- वाणीका रस क् दै-सा कटा गया-- ।
कतमा कतमक्रतमत्कतमत्साम कतमः कतम
उदृगीथ इति विस््ठं भवति ॥ ४ ॥
` अव यह विचार किया जाता दै कि कौन-कौन-सा ऋक् है, कौन-
ङोन-सा साम है ओर कौन-कौन-सा उदूमीथ है £ ॥ ४ ॥ ।
सा कतमा छक् ! कतम- | कौनसी वह क् हे, कोन-सा
सत्याम! कतमो वा स उद्धीथः १ | बह साम दै ओर कौनसा ब
तीया उदूगीथ दै! कतमा-कतमा' (कौन-
कतमा कतमेति वीप्सादराथा । | दोन) यह द्विरुक्त दरक स्थि । .
शङ्का-“वा बहूनां जातिपरिपरभे
इतमच्, # (५ । ३।९३. ) इस
पाणिनीय सुत्रके अनुसार अनेक
जातिके छोरगमिंसे किसी एक जातिका
बहुलम् , कथं डतमच्योगः १ | निश्चय कटनेके लियि प्रभ होनेपर
८इतमच्' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना. ..
गया दै, तु यहाँ छग्जातिकी बहु-
ठता सम्भव नहीं है, फिर (उतमचः
भ्रत्ययका प्रयोग कैसे किया गया !
ननु "वा बहूनां जातिपरििने
डतमच् ।' न त्र ऋग्जातिः ,
[9 क इस सूत्रका तात्पर्यं यह है कि जहां विभिन्न जातिरयोकरे अनेक पदार्थं
होते है बहो किसी एक जातिके पदार्थ॑का निश्चय करनेके लिये प्रभ्र उपस्थित होनेपर “डतमच्” प्रत्ययका प्रयोग किया जाता है । जिस प्रकार कट आदि बूत सी वेदशाखा है, उनका स्वाध्याय करनेवाटे द्विज लोगोकी जाति उन्दी श्ाखाओंके नामसे प्रसिद्ध हुदै रै । उनमेसे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये ही "कतमः कठः एेखा प्रश्न किया जा खकता है । परंतु यर्ा तो ्रुगवेद् एक
शी जाति दै, फिर उसमे “उतमच प्रत्यया भयोग कैसे शो खकता र {
छाः उ २-
नैष दोषः; जातौ परिप्ररनो जातिपरिप्ररन इत्येतस्मिन्विग्रह
जाताव्रण््यक्तीनां बहुत्योपपत्तेः।
न॒ त॒ जतिः पसिद्न इति विगृह्यते । ननु जातेः परिप्रश्न इत्य-
स्मि विग्रहे कतमः कट इत्या- चयुदाहरणयुपपन्नम्, जातो परि-
प्रन इत्यत्र तु न युज्यते । तत्रापि . कटादिजातावेव
व्यक्तिबहुत्वाभिप्रायेण परिपररन
इत्यदोषः । यदि जातेः परििरनः
स्यात्कतमा कतमर्भित्यादावुप- संख्यानं कतंब्यं स्यात् । विमृष्टं
मवति विमदः कृतो भवति |४।॥
1 ~
| रहन माना जाय तो _कोन-कौन्
| ३६ ऊॐन्दोग्योपनिषद् [ | 3 || १
न 9 "~ ~+ @ तात्पयं यह है कि यदि यक्षं नस्ति
समाधान-यह कोई दोष नदीं है करयोकि "जातिपरिपश्न इस पदा (जाति परिप्रश्नः सा विग्रह करने- पर् ऋक् जाति ऋक् व्यक्तो (विभिन्न चार्थो) कौ अनेकता तो सम्भव है ही; यहाँ 'जातिका परि म्रः एेसा किप्रह नहीं किया नावा। राङ्ा-क्रितु (नातिका परिश्ः एसा विग्रह करनेपर ही कतमः कटः” (भपमे कटशालावास्र कौन ई ? ) इत्यादि उदाहरण सम्भव हो सकता दे, जातिमे परिमरश्ष' रेसा विग्रह होनेपर यह उदाहरण नक्ष दिवा जा प्षकता । समाधान-वहोँ मी कटादि जातिमे ही व्यक्ति्योकी बहुरुताके अभिप्रायसे पेसा प्रभ किया गवा है-यह मान रेनेसे कोर दोष नहीं आता । यदि यह प्रभ (ऋगादि-) जातिसे सम्बन्धं रखता तो पूर्वोक्त सू्तसे कौन-कौन ऋक् हे' इत्यादि उदाहरण सिद्ध न होनेके कारण उसके ल्थि किसी प्रथक् सूत्रफा विधान क्रिया जाता। # [अथ यह्] विग्रष्ट होता है अर्थात् इसका विचार किया जाता है ॥ ॥
= भरन न मानकर जातिसम्बन्धी
नक् हं १ यह प्रश्न असंगत हो जाता है;
क्योकि श्रुक् एक जाति है, उसमे रहनेवारे
वाटे भिन्न-भिन्न मन्नोकी ए्रथक्-षथक्
जाति नदी है । अतः यं ऋक्त्वजातिविरिष्ट मन्बरूप ग्यक्ति्योके विषयमे ही
। घ्न किया गया ह, एेखा मानना चाहिये | `
+
खण्ड १] शाङकराभाष्यारथं ३
आल ह 2 ~ आ ॐ > 2 > ॐ ॐ थ विम हि कृते सति प्रति- | इस प्रकार विचार करने ही यह प्रतिवचन ८ उत्तर ) खूप वचनोक्तिरुपपनना-- उक्ति संगत हो सकती है कि- वागेव. प्राणः सामोमित्येतदक्षरसुदमीथः । तदवा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चकं. च साम च ॥५॥ वाक् ही ऋक्, पराण साम है जर ॐ यह् अकषर उद्गीथ दे। ये नो ऋक् जोर सामरूप वाक् भौर प्राण है, परस्पर मिथुन (जोड) है ॥५॥ बरोबर. प्राणः साम. ओमि- | , वाणी दी ऋक. दै, प्राण साम है तथा ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । त्येतदक्षरमुद्ीथ इति । वाग | स्स प्रकार वाक् ओर ऋककी एकता होनेषर भी [तीरे मन्त्रम बताये चोरेकत्वेऽपि नष्टमत्वन्याघातः, | हुए उद्गीथके] अष्टमतवका व्याधात् ६ _ | नहीं होता, क्योकि यह पूर्व वाक्यसे पूवेस्माद्वाक्यान्तरत्वात्; आप्त | भिन्न. वचन त 'ओमित्येतदक्षर- मुदुगीथः यह वचन ओंकारके व्याि- गुणसिद्धये हि ओमित्येतदक्षर- | गुणकी सिद्धिके णिये प्रयुक्त हुआ दे [ओर दवितीय मन्त्र उसके रसंतम- ुद्रीथ इति । तवका प्रतिपादन करनेके स्यि दै] । वाक्माणादृक्सामयोनी इति | वाक ओर प्राण कमः ऋक. ९ ओर सामके कारण ह । इसल्मि वागेवक प्राणः सामेतयुच्यते । | वाक ही चछक् दै ओर साम भाण है- देसा कहा जाता है । क्रमशः ऋक् ओर सामके कारणरूप वाक यहे हि समासानां सेषं | नोर , भाम हण , कलस सम्पण छक. ओर सम्पूणे सामा च साम्नामवरोभः इतः स्यात् । । अन्तमा हो ज्ञाता है, तथा
यथाक्रमभृकक्ठामयोन्यो्वाक्प्राण-
२८
ध्यानां सव॑क्मणामवरोधः कृतः स्यात् । तदवरोधे च सर्वे कामा अवरुद्धाः स्युः । ओमि- सेतदक्षरमुद्ीथ इति भक्त्या- शङ्का निवत्यते ।
तदा एतदिति मिथुनं निदिं र्यते किं तन्मिथुनम् ? इत्याह-
यद्वाक्च प्राणश्च सर्वक््सामि- कारणभूतो मिथुनम् । ऋक्च
साम चेति ऋक्सामकारणात्र- क्सामब्दोक्तावित्य्थः ।-न तु स्वातन्त्येण ऋक्च साम च मिथु- नम्। अन्यथा हि वाक्च प्राणे त्येकं मिथुनगक्साम चापरं मिथु- नमितिदे मिथुने स्याताम्। तथा .चतद्वैतन्मिथुनमित्येकवचननि-
देशोऽ्नुपपन्नः स्यात् । तस्मादू- क्सामयोन्योर्वाकप्राणयोरेव मिथु- नत्वम् ॥ ५ ॥
ॐ दव धकार समं जमनम तस्ति त्न इस प्रकार सम्पूणं कामना्ो
छान्दोग्योपनिषद् सवक. सामावरोधे चक्समसा- ` | अन्तभवि
[ अध्याय > >< >>> सम्पूणं सामका होनेपर ऋक् ओर सामसे सिद्ध होनेवाटे सम्पूरणं करमो का अन्तर्माव हो जातादहै, ओर उनका अन्तभवि होनेपर समस्त काम- नाण उनके अन्तत हो नाती है ।# “उद्गीथः रब्दसे सम्पूर्ण उदृगीथ- भक्तिन ठे री जाय, इस आशङ्का को ओम् यह अक्षर ही उद्गीथद, एेसा कहकर निवृत्त किया जाता है।
तद्रा एतत्ः इत्यादि वाक्ये मिथुनका निदंश किया जाता है । वह मिथुन कौन हे १ यह बतलाते है यह जो सम्पूणं ऋक्. ओर सामके कारणमूत वाक् ओर प्राण है मिथुन है । क् च साम च, इसमे इकः ओर सामके कारण ही चक् जर सामशब्दोसे कटे गये है । चक् ओर साम स्वतन्त्रतासे मिथुन नहीं है नदी तो वाक् ओर प्राण यह् एक मिथुन तथा ऋक् जीर साम-यह दूसरा मिथुन इस भरकार दो मिथुन होते; ओर देषा होनेप्र “तद्रा एतन्मधुनम्" इसः वाक्यभे जो एकवचनका निर्देश किया गया है, वह असंगत हो जाता । अतः छक सामके कारणभूत वाक् ओर भाण द्वी मिथुन है ॥ ५ ॥ `
सभ्ूणं ऋक् ओर
ग पराति व्यापिशगविरिष्ट दय सिद्ध होत्रा हे | "घडा जारण दोनेवाडा ओंकार
न= --------- ---------- --
खण्ड १ |
५ लाङ्रभाष्याथ 2३९
ओ में संसृष्ट मिथुनके समागमका फट
तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिननक्षरे
स<खजञ्यते
यदा वै मिथुनो समागच्छत आपयतो वें ताव-
न्योन्यस्य कामम् ॥ ६ ॥
वह॒ यह मिथुन ॐ इस अक्षरम संखष्ट होता है । जिस सुमय मिथुन ८ मिथुनके अवयव ) परस्पर मिरुूते है उस समय वे एक-दूसरेकी कामना्ओंको प्राप्त करानेवाले होते दै ॥ ६ ॥
तदेतदेवलक्षणं मिथुनमोमि-
त्येतसिमिन्नक्षरे संचज्यते। एवं
सर्वकामावाचिगुणविशिष्टं मिथुन-
मकारे संसृष्टं विद्यत इत्योका-
रस्य सवंकामावासिगुणवन्चं
प्रसिद्धम्| वाड्मयत्वमोकारस्य
प्राणनिष्पाद्यत्वं च मिथुनेन संसूष्टत्वम् ।
मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्र- सिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते-यथा लोके मिथुनो मिथुनावयवो स्री- पुंसौ यदा समागच्छतो ग्राम्य धर्मतया संयुज्येयातां तदापयतः प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तौ कामम् । तथा च स्वात्माचु-
विटेन मिथुनेन सरवकामाि-
वह यह एसे रक्षणवाखा मिथुन ॐ इस अक्षरम संयुक्त होता हे । इस प्रकार सम्पूणं कामनाओंकी प्रापिषूप गुणसे युक्त मिथुन ओंकार- मे संयुक्त रहता है, इसल्यि ओकार- का सम्पूर्णं॑कामनाओंकी प्रापतिरूप गुणसे युक्त होना सिद्ध होता हे । ओंकार वाडमय हे ओर प्राणसे ही निष्पत्न होनेवाखा है--यही उसका मिथुनसे संयुक्त होना हे ।
कामनार्ओंको भराति करा देना यह मिथुनका प्रसिद्ध ध्म है-इस विषयमे दृष्टान्त बताया जाता है- जिस प्रकार रोकमें मिथुन यानी मिथुनके अवयवमूत सरी ओर पुरुष परस्पर मिरुते है--आम्यव्यवहार(रति) के स्यि आपसम संसगं करते दै, उस समय वे एक दूसरेकी कामना पूणं कर देते है । इसी प्रकार अपनेसे अनुपरविष्ट मिथुनके द्वारा ओंकारका
४० छान्दोग्योपनिषद् [ अभ्याय १ < << < ऋऋ > गुणवत्वमोकारस्य सिद्धमित्य- ! सम्पूणं कामनार्ओकी प्रािद्प गुणसे यक्त होना सिद्ध होता है--यह इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥
---अन वद ्-9--
उद्रीथटषटिसे ओकारकी उपास्तना करनेका एल तदुपासकोऽप्युद्राता तद्धर्मा | उस (ओंकार) का उपास । उदुगाता भी उसीके समान धर्मस युक्त भवतीत्याह-- । होता दै, यह बतलाया नाता है-
आपयिता ह वे कामानां भवति य एतदेवं विद्रानक्षरमुदगीथमुपास्ते ।॥ ७ ॥
जो विद्रान् ( उपासक ) इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपा- सना करता हे, बह सम्पूणं कामनाओोंकी प्राति करानेवाला होता हे ॥७॥
आपयिता ह॒वै कामानां यजमानकौ कामनाओंको प्राप्त
करा देनेवाख होता है। तात्पय॑
यह है किजो इस प्रकार इस
मेवमा्षियुणवदुद्रीथरपास्ते त- | आपिगुणवान् अक्षर उदृगीथकी
£ | < उपासना करता है उसे यह पूर्वोक्त थोक्तं न > / ८-५
स्वतद्थाक्त फलमित्यथः । तं | फर परा होता हे, जैसा कि
यथा यथोपासते तदेव भवति, “उसकी जिस-जिस प्रकार उपासना करता दे वैसादही हो नाता है" (म० जरा° २०) इति श्रुतेः ।॥७॥। । इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ७ ॥
भ
ओकारकी समृदधिगुणवत्ता
भिप्रायः ॥ ६ ॥
यजमानस्य भवति । य एतदक्षरं
८ मकार सयदि गुणवाद समृडगुणनां भकारः, कथम् है, सो किस त वाद्य भी
न~ ~
खण्ड १1 ्ाङ्रमाष्याथे ४९
तद्रा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि कि चानुजानास्योमि- त्येव तदाह एषा एव सखद्धिय॑दनुज्ञा । समधयिता ह वे कामानां भवति य एतदेवं विद्रानक्षरमुद्गीथ-
मुपास्ते ॥ < ॥
वह यह ओंकार ही अनुज्ञा ( अनुमतिपूचक ) क्षर दै । [मनुष्य]
किसको जो कुछ अनुमति देता है तो ए मह अनुज्ञा ही समृद्ध है। नोः उदुगीथ जक्षरकी उपासना करता द, बह निश्चय ही
मृद्ध करनेवारा होता है ॥ ८ ॥ तद्रा एतखकृतमनुराक्षरम-
नु्ञा च साक्षर च तत् । अलुक
, चानुमतिरोङकार इत्यथः । कथ- अलुकता१ इत्याह भ्रुतिरेव यद्वि दवि च यत्कि च रोके ज्ञानं धनं वानुजानाति विद्रान्धनी वा तत्रानुमति ङुषन्नोमित्येव तदाह ।
तथा च वेदे-(्रयन्िशदित्यो- मिति होवाच" (° उ० २। ९।१) इत्यादि । तथा च लोकेऽपि तवेदं धनं गृह्णामीद्युक्त ओमित्येवाह ।
( हो) रेसा दी कहता है ।
इस प्रकार जाननेबाखा पुरुष हस
सम्पूणं कामनार्थोको
वह यह ओंकार ही, जिसका भ्रक- रण चर रदा है, अनुज्ञा्षर है । जो अनुज्ञा हो ओर अक्षर भी हो उसे अनुनञक्षर कहते है । अनुज्ञा अनुमति. का नाम दै, अर्थात् ॐकार अनुज्ञा हे । वह अनुज्ञा किस प्रकार ै १ सो स्वयं श्रुति दी बतसखती है-- लोकम कोई विद्वान् या घनी पुरुष निस किसी ज्ञान अथवा धनके स्यि अनुमति देता है तो उस सम्बन्धे अपनी अनुमति देते हुए वह ॐ” फसा ही कहता हे । तथा वेदम भी “तेतीस रेसा कहनेपर [ शाकल्यने ] ॐ ठेसा कहा" # इत्यादि उदा- हरण है ओर रोकमे भी म तेरा यह धन लेता ईह ेसा कडनेषर ॐ (ह) एसा दी कडते है ।
® शाकृल्यनामक एक बराह्मणे. याशबल्क्यसे पूछा कि कितने देवता हँ १ उसके उ्वरमे माञ्जवल्क्यने क्टा-“ततीसः । तब शाकल्यने “ॐ पेखा कफर
अपनी सनुमति प्रकट की ।
( बृहदारण्जकोपनिषद् )
४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अर्ध्याथं १ = 5 2 > ~> > > < -<>ऋ--< <-> ह. 4 अत एषा उ एवेषव समृद्धि- | ` अतः "एवा उ एक अर्थात् यही ध समृद्धि है। जो कि अनुज्ञा कहलती यदनुज्ञा; यानुज्ञा स समरद्धिस्त- | दै । जो अनुज्ञ है वही समृद्धि दै, क्योकि अनुज्ञा समृद्धमृरुक़ होती "मूरत्वादनुज्ञायाः । सख्द्धो | है । समृद्ध पुरुष ही ॐ एसी अनुज्ञा देता है । अतः तात्पथं यह है चोमित्यनुनञां ददाति । तस्मात् | कि ओंकार सभृद्धि गुणवाद । नो । ^ | फला जाननेवाढा परुष इस उदूगीथ सभृद्धिगुणवानोङ्कार इत्यथः । | जक्षरकी उपासना करता है, ` बह समद्धिगुणयुक्त वस्तुका उपासक समृद्धिगुणोपास॒कत्वात्तद्र्मा सन् | दोनेके कारण उसके ही समान समधेयता ह वे कामानां यज- | भर्मवाला होकर अपने यजमानकी मानस्य भवति य एतदेवं | कामना्ओंको समृद्ध ८ पूणं ) करने- विद्रानक्षरथुदरीथयुपास्त इत्यादि | वाला होता दै-ङ्यादि पूर्ववत् पूर्ववत् ॥ ८ ॥ जानना चाहिये ॥ ८ ॥ ओकारकी स्तुति अथेदानीमक्षरं स्तोत्युपास्य- | इसके बाद अब श्रुति उस अक्षर उतपन्न {४ ख्य त्वात्मरोचनार्थम् | उसकी स्तुति करती हे, क्योकि ॥ ) ०. वह उपास्य हे । कैसे स्तुति करती तनयं द [ यह बतति है ]-- तेनेयं जयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्यो- मिति शसत्योमितयुद्गायत्येतस्येवाक्षरस्यापचित्यै ` महिम्ना प्न ॥ ९॥ „ -उस जक्षरसं ही यह [ऋगवेदादिरूप] जयीविदया प्र ॐ देसा कहकर दी [ अध्वर्युं ] नो कम करता च , ् कहकर दी होता शंसन करता षै तथा ॐ ठेसा कहकर दौ उद्गाता उद्गान करता दै ।, इस अक्ष [ परमात्मा ] की पूनाके कथि ही [ सम्पूणं वैदिक कर्म है ] तथा इसीकी महिमा ओर रस ( बीहि-यवादि हवि ) के द्वारा [ सव कम॑ भ्दृ् होते दै ] ॥ ९ ॥
खण्ड १] काङ्रभाष्याथं ४३
तेनाक्षरेण प्रकृतेनेयम्ण्वेदा- | उस प्रक्रत अक्षरसे दी यह त्रयीविद्या अर्थात् तरयीवि्यासे विधान क्रिया हुआ करम रतत होता है, कर्कि आश्रावण आदि कर्मोद्भारा स्वयं त्रयीविद्या ही प्रवृत्त नहीं हुआ करती । हां, यह परसिद्ध दही दहै कि कमम इस प्रकार प्रवृत्त हुआ करता है । किंस प्रकार [ सो बतछते है-- ] ॐ एसा कृकर [अध्वयुं } आश्रावण करता हे, ॐ एसा कहकर [होता] शंसन करता है ओर ॐ णेसा कहकर [उद्ग।ता] उदूगान करता है । इस प्रकार आश्रावणओआदि तीनों कमेकि समाहारषूप लिङ्ग# (रक्षण)से जाना जाता है कि यह सोमयागका वणनहै।
तथा वह॒ क्म भी इस अक्षरकी | ही अपचिति-पूनके च्यि हे, क्योकि वह परमामाका प्रतीक हे, अतः उसकी पूना परमाताकी ही पूना हे; जैसा कि “अपने करमसे उसका पूजन करके मनुष्य सिद्धि काम करता है” इस स्प्रतिसे सिद्ध होता है ।
दिलक्षणा त्रयीविद्या त्रयी-
[ 6 ~ क 9
विन्राविहितं कर्मेत्यथः । न दि
(~ (0
तरयीविवेवाश्रावणादिभिवतंते । कमं तु तथा प्रवतंत इति प्रसि- द्म्। कथम् १ ओमित्याश्रावयत्यो+ मिति शंसत्योमिद्युदगायतीति
लिङ्गाच्च सोमयाग इति गम्यते । तच्च ॒कमेंतस्येवाक्षरस्यापचि-
त्यै पूजार्थम् । परमात्मग्रतीकं
दि तत् । तदपचितिः परमात्मन् (0 एव सा । “.स्वकमणा तमभ्यच्यं
सिद्धि विन्दति मानवः" (गीता
१८ । ४६) इति स्प्रतेः । कि चैतस्यैवाक्षरस्य महिम्ना | तथा इस अक्षरकी महिमा- महरवेन ऋचविग्यजमानादि- | महत्व. यानी ऋलिन् एवं यजमान ® अष्वयं होता ओर उद्राता--इन तीनोके जच क्त संर ज्वाता- सन तीनोकि करमाका समादयर दर्शपूर्णमास
आदिमे सम्भव नहीं ै। अयिशेम आदि यज्ञौमे ही जो सोमयागसंस्थाके अन्तर्गत र॑ उसकी सम्भावना है । अतः. यहो उक्त तीनों कार्योके समाहाररूप छग ( लक्षण ) से यह सूचित होता है कि यहां ॐ्कारसे आरम्म होनेवाे त्रयीवि्या-विदहित कम॑-सोमयागका ही बणन है ।
७४ छान्दोग्योपनिषद् [ अच्याय १ प्राणेरित्य्थः । तथेतस्येवाक्षरस्य | आदिक पराणोसे दी तथा इस अक्षरे रस-- ब्रीहि-यवादिरससे निष्प रसेन व्रीहियवादिरसनिशर॑तेन | हुए हविष्यसे ह [तैदिककम सम्प होते है] । [तो क्यावे प्राण ओर इविषेत्यथः; यागहोमा्क्षरेण | हवि उद अक्षरके विकार & ! इसपर कहते रै-] वे याग. क्रियते । तच्वादित्ययुपतिष्ठते । | होमादि इस अक्षरके उच्चारणपू वंक ही किये नते है | वे कर्म आदिल्यको ततो वृष्टथादिक्रमेण ब्राणोऽन्नं | प्रा होते है । फिर उससे बृष्टि आदि क्रमसे प्राण जौर अन्नकी च जायते । प्राणेरमनेन च यज्ञ- | उत्पत्ति होती है तथा पराण ओर उन्नसे यज्ञका अनुष्ठान क्रिया जाता स्तायते । अत उच्यते अक्ष- | ३। इसीर्यि इस अक्षरकी महिमासे रस्य महिम्ना रसेन" इति ॥९॥ | जर रसस एेसा कहा गया है ॥९॥
उद्गीथविवाके जानने ओर न जाननेवाठेके कर्मकरा मेद तव्राक्षरविज्ञानवतः कमं कतं- । पेसी अवस्थामे नते असर विज्ञान है उसीको कर्म करना चादिये--इस अवस्थामे श्रुति आक्षेप करती हे--
तेनोभो कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद् । नाना तु विया चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेत- मा भवति ॥१०॥ ॑
इस (अक्षर) को इस
ववो हो क अन हे र ध दोनों भिजत [परदे] ह । ो मं [वष
युक्त होकर किया जाता है वही प्रबरुतर् होता हे, इस मरकर निश्चय ही यष्ट सन इस अक्षरकी ही व्याख्या हे ॥ १० ॥
व्यमिति स्थितमाक्षिपति -
खण्ड १ |
शाकरमाष्याथं
४५
तेनाक्षरेणोभौ यश्चेतदक्षरमेवं व्याख्यातं वेद यथ कर्ममात्र- विदक्षरयाथात्म्यं न वैद तावुभौ कुरुतः कर्म । तयो कर्मसाम- थ्यदिव फं स्याक्कि तत्रा्षर- पाथातम्यविज्ञानेनेति । दुष्टं हि लोकै हरीतकीं भक्षयतोस्तद्रसा- भिङ्धेतरयोविरेवनम् । नेवम् , यस्माक्नानातु विद्या चाविध्याच भिमे हि विद्याविद्ये । त॒ शब्दः
पक्षव्याघृत्यथंः । न ओंकारस्य कर्माङ्त्वमाश्र-
विज्ञानमेव रसतमापिस्दधिगुण- वद्विज्ञानम्, षि तिं १ ततोऽ
भ्यधिकम् । तस्मात्तदङ्गाधिक्या- त्फलाधिक्यं युक्तमित्यभिप्रायः। दृष्टं हि रोके वणिक्छबरयोः
उस अक्षरके द्वारा दोनों दी प्रकारके रोग क्म करते है; [कोन- - कौन १] ८१) जो इस अक्षरको जैसी कि ऊपर ष्याष्या की गयी दहै उसौ प्रकार जानते है; बौर (२) लो केवरु कर्मो ही जनते है, अक्षरे मथाथं स्वरूपको नहीं जानते, वे दोनों दही कर्मानुष्ठान करते ६ । [ भव यदि को कटे कि] उने कर्मके सामथ्यंसेः ही फलकी प्रापि हो जायगी, भक्षरफे याथास्यको जाननेकी क्या भावहम- कृता है, क्योकि शोकम हरौतकौ (हर) के रसको जाननेवले ओर न जाननेवाले इन दोनोको दी हरीतकौ खनेसे दस्त होते देखे गये ईै- तो रेसा कहना दीक नर्ही, क्योकि विद्या भौर अविघा इन दोनो भेद है- विदा ओर अविद्या दोनों ही मिन्न-मिन्न है 1 (तु, शब्द् पक्षी व्यावृत्ति करनेके स्यि है ।
ओंकार रसतम तथा आपि ओर समृद्धि इन गुणेसि युक्त है पेसा जानना उसे केवर कमङ्गिमात्र जाननेके ही तुल्य नदी है, तो फिर कैसा है १ उससे सब प्रकार बदा हु हे । अतः अभिप्राय यह हे कि कमङ्गज्ञानसे उक्कृष्ट होनेके कारण उसके फलकी उक्कृष्टता भी उचित दी, है । रोके यह देखा ही गया है कि व्यापारी ओर भीक
४६ छान्दोग्योपनिषद्
> >~ ~> ऋ
[ अध्याय १
पश्ररागादिमणिविक्रये वणिजो । इन दोनोंमेसे व्यापरीको पद्मरागादि
विज्ञानाधिक्याकलाधिक्यम् तस्माद्यदेव विद्यया विज्ञानेन युक्तः सन् करोति करम श्रद्धया भरदधानश्च सनुपनिपदा योगेन ुक्तवेत्यथः, तदेव कर्म वीरय- वत्तरमविद्रतकर्मणोऽधिकफलं भवतीति । विद्रककर्मणो वीरय वत्तरत्ववचनादविदुपोऽपि कर्म बीयंवदेव भवतीत्यभिप्रायः । न॒चाविदुषः कर्मण्यनधि- कारः। ओपरत्ये काण्डेऽविदुषा- मप्याचिज्यदशेनात्। रसतमा्ष- समद्धियुणवदक्षरमित्येकणपास- नम् मध्ये भ्रयल्ान्तराद्रंनात्। अनेके विशेषणेरनेकधोपास्य-
लात् खन्यतस्यैव ढ़तस्योदीथा देखा गय।। अनेकों विरोषणो द्वाराजनेक ` ख्यस्याक्षरस्योपव्याख्यानं भवति
॥ १० ॥
मणिर्योक्ी विक्रीका अधिकृ ज्ञान होनेके कारण अधिक फट होता है। अतः विया अर्थात् विज्ञाने युक्त होकर श्रद्धासे यानी श्रद्वु होकर ओर उपनिषद् अर्थात् योगसे यक्त होकर जो कर्म करता है वही भवरत होता है--अविद्रानूके कसे अधिक फल देनेवाला होता हे । विद्वानूका कर्म प्रवर्त् बत- साया गया है, इससे यह अभिप्राय सूचित होता है कि अविद्रानूका
| भी कमं प्रवर तो होता ही है।
अविद्रानूका कर्मभे अधिकार न हो- रेस बातभी नहीं है; क्योकि ओपस्यकाण्डमे (इसभध्यायके दशम सण्डमे) अविद्व्नोको भी ऋतिककर्म करते देखा जाता है । वह् अक्षर रसतम तथा आति ओर समद्धि गणोसे युक्त है- एेसी एकं उपासना दै, क्योकि इसका निरूपण करते समय वीचमे कोई ओर भयल नहीं
भकारसे उपास्य होनेके कारण निश्चय ही यह् सन इस उद्गीथसं्क प्रकृत
५
1 नकष (उशी ही व्याख्या हे॥१०॥ इ तच्छान्दोम्योपनिषदि प्रथमाध्याये भथम खण्डमाष्यं र" + + = सण्डभाष्यं सम्पणम् ॥ १॥
न
दितधियः कण्डं
पराणोपात्तनाकी उक्तषटता सूचित करनेवाली आस्यापिक्र
देवासुरा ह वे यत्र संयेतिर उभये, प्राजापत्या- स्तद्ध॒ देवा उदृगीथमाजदररनेनेनानभिभविष्याम
इति ॥ १ ॥
भ्रसिद्ध दै, [पूर्वकार्यं] प्रनापतिके पुत्र देवता जर अघर किषी कारणव परस्पर युद्ध करने रगे । उनमेसे देवताओनि यह सोचकर् कि, इसके द्वारा इनका पराभव करगे, उदुगीथका अनुष्ठान क्वि ॥ १ ॥
देवासुरा देवाश्रासुराश्च । देवा आख्यायिकां दीव्यतेद्मोतिनार्थस्य निव॑चनम् शास्रोद्धासिता इन्द्रिय- वृत्तयः । ॑ असुरास्तद्विपरीताः स्वेष्वेवासुषु विष्वग्विषयासु प्राणनक्रियासु रमणात्स्वाभावि-
क्यस्तमआत्मिका इन्द्रियव्ृत्तय एव । ह वा इति पूव्रत्तोद्धासको निपातौ । यत्र॒ यस्मिनिमित्त इतरेत्रविषुयापहारलक्षणे संे-
देवाघुरा-देवता ओर असुर- गण । देवः शब्द चयोतनाथंक दिव् धातुसे सिद्ध हआ है । इसका अभिप्राय शाखारोकिंत इन्द्रिय वत्तरयाँ हँ । तथा उप्ते विपरीत, जो अपने दी अघुञं ( प्राणो ) मेँ यानी विविध विषयों जानेवारी प्राणनक्रियाओमिं ८ जीवनोपयोगी प्राणव्यापारोमे) ही रमण करनेवारी होनेके कारण स्वभावसे दी तमो- मयी ईन्दियवृततिया दै, वे ही ‹अघुर' कदरतीदै । € ओर थवः ये पूवेदृतान्तको सूचित करनेवलि निपात है । यत्र जिस निमित्तसे अर्थात् रक-द्सरेके विषर्योके अप-
(८ 47
७८
छान्दोग्योपनिषद्
[ मध्वाय १
तिरे । संपूवस्य यतते: सङ्ग्रा माथंत्वमिति सडग्रामं कृतवन्त
इत्यथः । शास्मीयप्रकाशबृष्यभिभवनाय
प्रवृत्ताः स्वाभाविक्यस्तमोरूपा
इन्द्रियवृत्तयोऽसुराः। तथा तदि-
शाञ्जाथंविषयिवेक-
ज्योतिरात्मानो देवाः स्वाभावि- कतमोरूपासुराभिभवनाय प्रवृत्ता त ग्राम इव सवेप्राणिषु प्रतिदेहं देवासुरसड्ग्रामोऽनादिकाग्रवृत् इत्यभिप्रायः । स इह शरुत्याख्या- यिकारूपेण धर्माधर्मोतपत्तिविवेक विज्ञानाय कथ्यते प्राणविशुद्धि- विन्ञानविधिपरतया ।
अत॒ उभयेऽपि देवासुराः
परीताः
इत्यन्योन्याभिभवोद्धवरूप श
प्रनापतेरपत्यानीति प्राजापत्याः।
प्रजापतिःकमंजञानाधिृतः पुरुषः
~
हरणरूप जिस किसी निमित्ते संयत हुए । शम् उपसगपू त्, घातुका अथं संम्राम होनेके कारण इसका अभिप्राय “उन्होने संम्राम फिया-रेसा समक्षना चाहिये।
शाखोय प्रकाशावृकत्तिका पराभव करनेके रिये प्रवृत्त ह स्वभावसे ही तमोरूपा इन्द्रियवृचियाँ अघुर है । तथा उनके विपरीत शाज्ञाथविषयक विवेकज्योतिःस्वरूप देवगण स्वा- भाविक तमोखूप अपुरोका पराभव करनेके खयि प्रु है । इस प्रकार परस्परकी बृतिर्योके अभिमव- उञ्चवरूप संप्रामके समान यह देवामुर-संग्राम अनादिकार्सै सम्पणे प्राणियों प्रसेक देहे होता मा रहा 2ै- एेसा इसङ्ा जमिप्राय है । यहाँ शति रमाधम- की उत्पत्तिके विवेकका बोध करानेके ल्वि प्ाणोकी . विञुदधके विज्ञानका
विधान करते हुए आख्यायिका- रूपसे उसीका वर्णन कर रही है |
इसीसे ये देवता ओर भुर
दोनो भजापतिके पतर है इसख्यि' प्राजापत्य, ““पुरुष ही उक्थ है, यही महान् पजापति है" इस अन्य तिके अलसा भजापति, करम र डान
खण्ड २] - शाङ्करमाष्याथे ७९
“पुरुष एवोक्थमयमेव महान्प्रजा- | ८ उपासना ) के अधिकारी पुर्पका पतिः? ति शरत्यन्तरात्। तस्य दि | नाम है [ ब्र्माका नहीं ] । उक्षीकौ ्षासीय ओर स्वाभाविक-ये परस्पर- ब्ाञ्ीयाः स्वाभाविक्यश्च करण- | विरुद रइन्दरियवृतिया संतानकै वृत्तयो विरुद्धा अपत्यानीव, तदु- | षमान है, क्योकि इनका आविर्भाव तत्ततो त्र्षापकपंलक्षणनिभितत | उक्तम निमित्तके | कारण दहोनेवले उस संग्राममे इ देवा पद्रीथष्रीथमक्लयुपल- | देवताओंने उदृगीथका यानौ उद्गीथः ं भक्तिसे उपरक्षित उद्गातके कका क्षितमोदत्रं कममाजहुराहतवन्तः। | आहरण-- अनुष्ठान किया । अकेले | उसीका अनुष्ठान होना असम्भव होनेके कारण उन्होने ज्योतिष्टोम ज्जयोतिषटोमाद्याहृतवन्त इत्यभि- | आदििका अनुष्ठान किया प्सा = इसका अभिप्राय हे । उन्होने उसका प्रायः । तक्किमथंमाजहः १ इत्यु- अनुष्ठान किपल्यि किया १ बह च्यते--अनेन करमणेनानसुरान- | बतखया नाता है-इस कम॑से भिभविष्याम इत्येवममिप्रायाः श १
सन्तः ॥ १ ॥ उदगीथक्षा अनुष्ठान किया ] ॥१॥
तस्यापि केवलस्याहरणासभवा-
~€ न्ट ग~ प्राणादिका सदोषत्व
यदा च तदु रीं कर्माजिदी- | निस समय उन्दने उस उदूगीय- ४ कमंका अनुष्ठान करना चाहा उस् षवस्तदा- समय--
1
५० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ = ऋ > > > ऋ ऋ > > > > ॐ > >> ~ > > > >> +
ते ह॒ नासिक्यं प्राणसुदृगीथसुपासांचक्रिरे । त हासुराः पाप्म्ना विविधुस्तस्मात्तनोभयं जिघति सुरभि च दुगेन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥
उन्हनि नासिकार्म रहनेवारे प्राणके रूपमे उदूगौभकी उपासना कौ । किन्तु अमुरोने उसे पापसे विद्ध कर दिया । हइसीसे वह् सुगन्ध ओर दुगन्ध दोनोको संधा दै, क्योकि वह् पापस विषा हुमा ३ ॥२॥
ते हदेवा नासिक्यं नासिकायां | प्षिद्ध है, उन देवतानि
भवं॒प्राणं चेतनावन्तं प्राणं | गसिक्य--नासिकार्ेरदने वारे पाग यानी चेतनावान् प्रणिन्दियकी, जो माणयुहीधकरताघुद्तारुद्रीथ- | उदूगीथकर्त -उद्गाता है, उदुगीथ- भक्तयोासांचक्रिरे कृतवन्त | भक्तिसे उपासना की, तालं यह है कि उद्गीथसंज्क ओंकार अक्षरकी नासिका्मे रहनेवले प्राणके रूपम हीधार्यम्षरमोङ्ारघुपासांच- | उपासना की। इस भकार भरत ज्थ- का परित्याग ओर अग्रटृत अर्थका तरिर हयः । एवं हि महृताथ- | हण नही करना पा; कयो परित्यागोऽअ्ृतार्थोपादानं च न | ससयेतयैवदरत्यः इस शरतिवचन- कृतं स्यात् । खन्वेतस्येवाकषरस्य' | के अनुसार यरो उपास्यरूपसे इत्योङ्ारो ्यषास्यतया ्रकृतः। | ओंकारका ही भकरण है । नन् द्वीथोपरुकषितं कर्माहृत- | शंका-किति ठुमने तो कहा था कि उन्होने “उद्गीथः शब्दस उप-
चन्त इत्यवोचः, इदानीमेव कथं | धित कर्मा जतुषठान किया |
| ओोङ्कारमुपासां- | अव पसा व्यो कते हो कि उद्गीय- नासिक्यप्राणदष् संक ओंकार अक्षरकी ही नासिकमें
इत्यथः। नासिक्यप्राणदृ्टयो-
खण्ड २ |
नैव दोषः; उदीथकमेण्येव
` हि तत्कत॑प्राणदेवतादृष्टयोद्वीथ- भक्तथवयवशनोङ्कार उपास्यत्वेन
विवक्षितो न स्वतन्त्रः । अतस्ताद- येन कर्माहतवन्त इति युक्त-
मेवोक्तम् । तमेवं देवैचैतथदरातारं शस-
शः स्वाभाविकतम आत्मानो
ज्योतीरूपं नासिक्यं प्राणं देवं स्वोत्थेन पाप्मना ध्मासङ्करूपेण
` विविधुविद्धबन्तः संसगं छृतवन्त
इत्यर्थः । स हि नासिक्यः प्राणः
` कल्याणगन्धग्रहणामिमानासङ्गा-
भिभूतविवेकविकानो बभूव । स
` तेन दोषेण पाप्मसंसगी बभूव 1 ` तदिदक्तमसुराः पाप्मना बि- . विधुरिति।
यस्मादासुरेण पाप्मना विद्ध-
` स्तस्मात्तेन पाप्मना प्रेरितो घ्राणः
प्राणो दुर्गन्धग्राहकः प्राणिनाम् । अतस्तेनोभयं जिघ्रति रोकः
शाङ्करभाष्यं स ५१
~> => >> >< > > ऋः > > = = ~ समाधान-यद कोई दोष नही
है, क्योकि यहाँ उदुगीथ कर्मं ही उसका कर्त जो प्राणदेवता है उसीक्री दृष्टिसे उद्गीथभक्तिका अवयवभूत ओंकार उपास्यरूपसे विवक्षित है- स्वतन्त्र ओंकार नहीं । अतः उसीके स्यि उद्गाताके कका अनुष्टान क्िया-एेसा जोः कदा है वह उचित दी है । देवताओंसे इस प्रकार वरण किये हुए उस उद्गाता ज्योतिः स्वह नासिकास्थित प्राणदेवको स्वभावसे ही तमोमय अघुरोनि अधमे ओर आसक्तिरूप अपने पापसे बेध दिया; अर्थात् उससे संयुक्त कर दिया । वह जो नासिकाम्थित प्राणं है उसमे पुण्य गन्धको भ्रहण करनेके अभिमान जर आसक्तिरूप दोष आ जानेसे उसके विवेक ओर विज्ञानका अभाव हो गया । उस दोषके कारण वह पापसे संसर्गं रखनेवासं हो गया । इसीसे यह कहा है कि अघुरोनि उसे पापसे विद्ध कर दिया । क्योकि प्राण आयुर पापसे विद्ध ह इसख्यि उस पापसे प्ररि हुमा ही वह प्राणिर्योका घ्राणसंज्ञक शाण
दुर्गन्धको अहण करनेवाला है। इसीसे रोक सुगन्धि जर दुगंन्षि
५२ छान्दोग्योपनिषद् [ अभ्याय १ सुरभि च दुगन्धि च पाप्मना | दोनेहीको धता है, क्योकि ग पापसे विधा हआ हे । जिम् प्रकार ह्येष यस्माद्वि ्ः । उभयग्रहणम- | “जिसकी द्रवासक एवं पुरोडाशासक दोनों हवि्ोँ दूषित हो जार (कह इन्द्र देवताके स्यि पाच सकर मात अपण करे)" शु ५ तिमाच्छति' = पद् विवक्षित नहीं हे; उसी प्रकार च्छति | यहाँ भी (भयः पदका ग्रहण म तिरूपं जिघ्रति" | इट नहं है ।*# [बृहदारण्यक-श्रुति ˆ यदेवेदमप्र जप्रति'' | भी] 4 पकरणमे यही ना ¦ गयाहे कि “जो इस प्रतिकूल गन्धको
विवक्षितम्, "यस्योभयं हविरा-
( ० उ० १।३।३) इति | सषता हे ।” [इससे भी यही सिद्ध ¦
होता है कि यहाँ उभयः शब्दको
समानग्रकरणशरतेः ॥ २ ॥ रहण करना उचित नही ह] ॥२॥ अथ ह् वाचमुद्गीथमुपासां चक्रिरे ¦ ताश्टासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सव्यं चान्तं
च पाप्मना द्येषा विद्धा ॥ ३ ॥
फिर उन्होने वाणीके रूपमे उद्गीयकी उपासना की । वितु अघो उसे पापसे विद्ध करदिया । इसीसे कोक उसके द्वारा सत्य भीर मिथ्या दोनों बोलता दै, क्योकि बह पापते विधी ह्रे है ॥२३॥
अथ ह चलरद्गीथसुपासांचकिरे । तद्धासुराः पाप्मना = विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति द्रानीयं चादरानीयं च पाप्मना दयेतद्विद्धम् ॥ ४ ॥
9. वासक वा परेगमार कज त पक्र किसी एक पकारकी हवि मी उरि जद भादि के स्पशंसे दूषित हो जाय तो उसके यि प्रायश्चितकी आवश्यकता होती हे, फिर उ नाश्य दोनो विय भित दोनेषर `या व्यवस्था कयो ताय गयी । अवश्य ह बां "दोनो" (उभयम्) पद् अनावश्यक या अविवक्षित है ।
% कर्योकि पापसे विदध होनेके कारण ठोक दुग॑न्धको ग्रहण दे ।' केबड़ इतना ही कहना उचित है । ५१
य
वाता
क्षण्ड 2 ] शाङ्कराच्याथे ७३ ऋऋ अआ अअ
फिर उन्होने चश्ुके पमे उदुगीथकी उपासना की । अदुरोने उसे भी पापसे विद्ध कर दिया । इसीसे कोक उससे देखनेयोग्य ओर न देखनेयोग्य दोनों प्रकारके पदार्भीको देवता डै, कर्योकिं वह ( चकचु-इन्दिय ) पायसे षा हुमा दे ॥ ४॥
अथ ह श्रोत्रमुद्गीथसुपांसांचकरिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभय* श्रणोति श्रवणीयं खाश्रवणीयं च पाप्मना ह्य तदिद्धम् ॥ ^ ॥ फिर उन्होने श्रोतरके रूपमे उद्गीथकी उपासना की । अघुरोनि उसे भी पापस वेध दिया । इसीसे रोक उससे सुननेयोम्य ओर न घुननेयोभ्य दोनों प्रकारौ वर्तको नता हे, क्योकि वह ( श्रोत्ेन्दिय ) पापसे विधा हुभा ह ॥ ५ ॥
अथ हइ मन उद्गीथमुपासा चक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभय^ संकस्पयते संकस्य- नीयं चासंकटपनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ६ ॥
फिर उन्होने मनके रूपमे उदुगीथकी उपासना कौ । असुरौने उसे भी पापे वेध दिया। इसीसे उसके द्वारा रोक संकल्प करनेयोगय ओर संकल्प न करनेयोग्य दोनोहीका संकल्प करता है, कोक बहं पापे विधा हु है ॥ ६ ॥
मृख्यप्राणस्योपास्यत्वाय तः | सु्य प्राणको उपास्य सिद्ध करने- श , „ 1 के स्यि उसकी विद्युद्धताका अनुभव दिशुद्धतवालुमवार्थोऽयं विचारः चिनार
९ | करानेके ्रयोजनसे श्रतिने इस विचारः
तया प्रवतितः। अतश्वक्षरादि- | का आरम्भ का | अतः च्च आदि
५४ छान्दोग्योपनिषद् [ अल्याय १
` देवताः क्रमेण विचार्मासुरेण | देवता घुर पापसे विद्ध है इस पाप्मना विद्धा इत्यपोद्यन्ते । | प्रकार करमशः विचार करके उनका
। अपवाद किया जाता है । रोषसब भी इसीके समानं । इसी प्रकार उन्होनि चकुः श्रोत्रं भन इत्यादि । वाक् , चश्च, श्रोत्र ओर मन आदिक । भी [ पापसे विद्ध कर दिया ] “इस
अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादि- | प्रकार. निश्चय ही ये देवता पापस संयुक्त है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार, यहाँ जिनका नाम नहीं स्या गया देवताः पाप्ममिः'”(ग०उ०१।३। , दै, उन लक् एवं रसना आदि जन्य | देवताओंको भी पसे दही पापविद्ध
& ) इति भरुत्यन्तरात्॥ ३-६। | समञ्लना चाहिये ॥ २३-& ॥
ख्य ्राणदवारा असुरोका पराभव आसुरेण विद्धताद्घ्राणादि- | अआघुर पापसे विद्ध होनेके कारण देवता अपोद्य-- घ्राणादि देवताभोका त्याग कर-- अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तसुद्गीथमुपासां चक्रिरे । तरहासुरा ऋत्वा विदध्वंसर्यथादमानमा- खणस्घत्वा विध्व<सेत ॥ ७ ॥ फिर यह जो परसिद्ध सु्य प्राण दै उसीके रूपमे उद्गीथकी उपासना ( ॥ उस (प्राणके) समीप पुचकर अघुरगण इस प्रकार विध्वस्त हो गये जञेसे दुभ पापाणके पास पर्हैचकर मिद्धीका ठेखा नष्ट हो जाता हे ॥७॥ अथानन्तर् य एवायं सिद्धो | जथ-इसके पात् जो कि यह यखे भवो मुख्यः प्राणस्तयुद्धीथ- | पसिद्ध॒सख्य- सुखम नेवा | भाण है उसीके ख्पमें उदूगीथकी उपासना कौ । अुरगण पूर्ववत्
समानमन्यत् । अथ ह वाचं
देवता द्रष्टव्याः “एवम खल्वेता
भुपासां चक्रिरे । तं हासुराः पूरव-
| ॥
| । |
।
खण्ड २ 1 8-89-8 + >
बदुत्वा प्राप्य बिदध्व॑सुर्विनशः,
अभिप्रायमात्रेण, अकरत्बा किं चिदपि प्राणस्य ।
कथं विनष्टाः १ इत्यत्र दृषटान्त- माह-यथा लोकेऽमानमाखणं --न शक्यते खनितुं इदा- लादिभिरपि, टङ्कच्छेत्तं न शक्योऽखणः, अखण एव
आखणस्तमृत्वा सामभ्याघ्नोषटः पांसुपिण्डः श्रुत्यन्तराचार्मनि
क्षिप्तोऽदममेदनाभिग्रायेण तस्या- इमनः किंचिदप्यङत्वा स्वयं वि-
वध्येत विदीर्येतेवं विदष्व॑सुरि- (५ ° (~ = [क
व्यथः । एवं धि शु दोऽसुररधपित-
त्वात् प्राण इति ॥ ७ ॥
शाङ्करमाष्याथं ५५
उसे प्राप्त होते ही- प्राणका कुछ भी न निगाडकर केवरु उसे विद्ध कृरनेका संकल्प करके दी विध्वस्त हो गये ।
वे किस प्रकार नष्ट हो गये इसमे दृष्टान्त कहते दै-- जिस प्रकार रोकमे आखण-पाषाणको प्राप होकर- जिसे कुदालादिसे भी न खोदा ना सके तथा नो ोकिर्योपि भीचिन्निन किया जु सके उसे 'अखणः कहते है, “अखणः ही “आखण"(अमेदय)कहा गयाहै उसीको प्रा होकर अर्थात् पाषाणकौ ओर उसे फोडनेके अभिपरायसे फेंका हुआ लोष्ट-पांघुपिण्ड यानी मिद्रीका ठेस उस पत्थरका कुछ भी न बिगाड़ कर् स्वयं नष्ट॒हो जाता है उसी प्रकार बे अघुर भी विनष्ट हो गये। इस् प्रकार अघुरोसे पराभूत न होनेके कारण मुख्य प्राण शुद्ध रहा- यद् इसका तात्पयं है । यहाँ प्रकरणके सामथ्यंसे ओर दूसरी शरुतिके अनुसार
“लोष्टशब्द अध्याहत किया गयाहे।७।
-“- स्वश
श्राणोपासकका महत्त
एवंविदः प्राणात्मभूतस्येदं
फटलमाह-
.इस प्रकार जाननेवाे प्राणास- मूत व्यक्तिके शये श्रुति यह फल
५६ छान्दोग्योपनिषद्
[ सभ्याय !
एवं यथाद्मानमाखणश्रताविध्व सत एवैव स विध्वंसते य एवंविदि पापं कामयते यश्ेनमभिः
दासति स एषोऽदमाखणः
॥ € ॥
जिस प्रकार [ मिद्रीका ठेखा ] दुर्भ पाषाणको प्रात होकर विनष्ट हो जाता है उसी प्रकार वह व्यक्ति नाशको प्राप्त हो नाता नो इ प्रकार जाननेवाटे पुरुषके प्रति पापाचरणकी कामना करता दहै अथव खो इसको कोसता या मारता दै; क्योकि यह प्राणोपासक अभे
पाषाण ही दे ॥ ८ ॥ यथारमानमिति, एष एव
दृष्टान्तः; एवं हैव स विध्वंसते विनश्यति; कोऽसौ १ इत्याह-य एवंविदि यथोक्तप्राणविदि पापं तदनं कतुं कामयत इच्छति यश्चाप्येनमभिदासति हिनस्ति भ्राणविदं प्रत्याक्रोशताडनादि रुङ्क्ते सोऽप्येवमेव विध्व॑सत इत्यथेः । यस्मात्स एष प्राणवित्
प्राणभूतत्वाद्इ्माखण इवादमा- खणोऽधर्षणीय इत्यर्थः ।
जसि प्रकार पाषाणको प्रप्त होकर इत्यादि- यही इसमें दृष्टान्त है। उसी प्रकार निश्चय दही वह
न्टहोनाता दै; कौन नष्टे |
नाता है? सो बतरते हैन इस प्रकार पूर्वोक्तं प्राणको जानने- वाले उपासकके प्रति उसके अयोग्य पापाचरण करनेकी कमना-इच्छा करता है; तथा जो इसका हनन करता है- इस प्राणवेत्ताके प्रति गाी-गरोज एवं ताडनादिका प्रयोग करता है वह भी इसी प्रकार नष्ट हो जाता है--यह इसका अमिपराय हेः क्योकि बह भाणवेतता भाणस्वल्प हानेके कारण दुर्भ पाषाणके समान इच पाषाण अर्थातु दुर्ध हे ।
` ` "= "वा क 2 क~, _
खण्डं 2 | ननु नासिक्योऽपि प्राणो वा- य्वात्मा यथा शरखूयस्तत्र नासि- क्यः त्राणः पाप्मना बिद्धः प्राण एब सन्न युखूयः कथम् ! चैष दोषः; नासिक्यस्तु स्थान- करणवैशुण्याद्विदधो बास्वात्मापि सन् यस्त॒ तदसंभवात् स्थानदेवताबलीयस्त्वा्न विद्ध इति युक्तम् । यथा बास्याद् यः रिक्षावसपुरुषाभ्रयाः कायविरोषं र्वन्ति नान्यदस्तगतास्तदरद्दोष- बटूप्राणसचिवत्वादिदधा प्राण-
देवता न युख्यः ॥ ८ ॥
शाङ्करभाष्य ५७
हंका-जैसा किं मुख्य प्राण ह उसी प्रकार नासिकास्थित् प्राण भी तो वायुख्प दी है; कितु प्राण- हप होते हए भी केवर नासिका- गत प्राण ही पापते विद्ध दै, स॒ख्य प्राण नहीं दै सो कैसे
समाधान~-यह कोई दोष नर्ही है । नासिकामें रहनेवाखा प्राण तो वायुहूप दोनेपर भी स्थानावच्छिनन इन्द्रिये दोषके कारण अघुरोद्रारा पापसे विद्ध हो गया दै; किंतु सख्य प्राण आाश्रयदोषकी असम्भवताके कारण तथा स्थानदेवतासे प्रबूत होनेके कारण पापसे विद्ध नही
हुजा-यह उचित ही दै । जिस.
प्रकार बसूढा मादि ओनार घुशि- कषित पुरषके हाथमे रहनेषर विशेष का्य॑करते है, रितु दूसरेके हाथमे पड़नेषर वैसा नदी करते, उसी प्रकार दोषयुक्त प्राणका साथी होनेके कारण प्राणदेवता पापसे विद्ध है भौर सुख्य प्राण पापविदध नहीं है ॥ ८॥
र्ण -
यस्मान्न विद्धोऽसुरयस्त- |
स्मात्--
क्योकि मुख्य प्राण अघुरोद्रारां . । पापविद्ध नदी हआ, इसव्यि-- `
"न"
षष
ऊन्दोग्योपनिषह्
[ सण्याय १
> ‰< ‰ $ # # < ‰ < < £ ८ ‰ < # # ८ # ‰ # ¬< नै वेतेन सुरभि न दुगन्धि विजानाव्यपहतपापी ह्यं ष तेन यदश्चाति यस्पिबति तैनेतरान्प्राणानवति।
एतमु एवान्ततोऽविच्वोर्छामति वयाद द्ात्येवान्तत
इति ॥ ९ ॥
रोक इस ( मुख्य प्राण ) के द्वारा न सुगन्धको जानता है ओर न दुगंन्धको ही जानता दै; क्योकि यह पापे परामूत नहीं है । अतः यह जो कुछ खाता या पीता दहै उससे अन्य प्रार्णोका ८ इन्दरयोक्ना ) | पोषण करता है । अन्तम ईस मुख्य प्राणको प्राप्त न होनेके कारण ही [ घ्राणादि प्राणसमूह ] उक्तमण करता दहै ओर इसीसे अन्तमे पुष
मुख फाड़ देता हे ॥ ९ ॥ नैवैतेन सुरभि दुर्गन्धि वा
विजानाति प्णेनैव तदुभयं विजानाति रोकः । अतश्च पाप्मकार्यादशंनादपहतपाप्माप- हतो विनारितोऽपनीतः पाप्मा यस्मात्सोऽयमपहतपाप्मा शेष विशुद्ध इत्यथः । यस्माचात्मभरयः कल्याणा द्ासद्गवस्वादुघ्राणादयो न ` तथात्मंभरियख्यः, कि तहिं १ सर्वाः कथम् १ इत्युच्यते-तेन ख्येन यदश्नाति यद्यिबति
लोक इस मुख्य प्राणके द्वारा १ छगन्धको जानता है ओर न दुगन्ष- । को ही, इन दोनोको वह प्राणके द्वारा दी जानता है । अतः पापका | कायन देखे जानेके कारण यह अपहतपाप्मा हे-- जिससे पप ¦ अपहत-विनारित अर्थात् दूर $ दिया गया है वह यह मुख्य प्रण जपहतपाप्मा अर्थात् विद्युद्ध है।
क्योकि प्राणादि इन्द्रियां अपने ।
कल्याणे आसक्त होनेके
कारण अपना ही पोषण करनेवाली `
(य 1 व स उस प
षण } व
समीका दितकारी दे । किस प्रकार!
ताया जाता ईै--उस मुख्य
ण्ड 2 |
शाङ्करभाष्य
५९
लोकस्तेनारितेन पीतेन चेतरान्
त्राणादीनवति पारयति । तेन (^~ 9 (~ 4 (९ त्य थं अ हि तेषां स्थितिभेवतीत्यथ;। अतः सर्वमरिः प्राणोऽतो विबुद्धः । कथं पुन्॑ख्यारितषीताभ्यां स्थितिरेषां गम्यते १ इत्युच्यते- एतं ख्यं प्राणम्, ुख्यत्राणस्य वृत्तिमन्नपाने इत्यथः, अन्ततोऽ- न्ते मरणकालेऽविचखालभ्ध्वोत्ा- मति घ्राणादिग्राणसमदाय इत्यर्थः । अप्राणो हि न शक्रो- त्यरितु पातुं वा । तेन तदोत्ा- न्तिः प्रसिद्धा घ्राणादिकलापस्य। दृश्यते द्युतकरान्तौ प्राणस्याशि- शिषा । अतो व्याददात्येवास्य-
। . विदारणं करोतीत्यथः। ¦
| | ।
साभ उतरान्तस्य लिङ्गम् ॥९॥
प्राणके द्वारा लेग नो कु खाते- पीते है उस खाये-पीयेसे वह मुख्य प्राण घ्राणादि दृस्रे प्रर्णोका पोषण करता डे, क्योकि उसीसे उन सव्- करी स्थिति होती हे । इसलियि सुय प्राण सभीका पोषण करनेवाखा दै, अतः वह विशुद्ध है ।
रितु मुख्य प्राणाद्वारा खाये-पीये पदार्थेसि अन्य प्रर्णोकी स्थिति किस प्रकार जानी जाती दै १ सो बत- कते है-इस सख्य प्राणको अर्थात् इस मुख्य प्राणकी वृत्तिरूप अम- पानको न पाकर दी अन्त समय मरण-कार्मे प्राणादि इन्द्रिय समुदाय उक्तमण करता है, कर्योकि पराणहीन पुरुष खाने या पीनेमे समर्थं नहीं होता । इसीसे उस समय घ्राणादि इन्द्रिय-समुदाय- की उक्रान्ति प्रसिद्ध दै। उक्र मणके समय प्राणकी भोजन करनेकी इच्छा स्पष्ट देखी जाती है । इसीसे उस समय वह सुख ना देता हे । यही उक्तमण करने- वाटे प्राणादिको अन्नादि प्राप्त न दोनेका चिह हे ॥ ९ ॥
म्रणकी आ ङ्गरत संज्ञा हेम हेतु त हा्गिरा उदीथमुपासांचक्र एतमु एवा- द्विरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥ १० ॥
&०
छान्दोग्योपनिषष््
[ अष्याय।
अङ्धिरा ऋषिने इस [सुख्य प्राण] के ही रूपमे उदुगीथकी उप कौ भ । अतः इस प्राणको हौ आङ्गिरस मानते है, कयो यह समू
जङ्खोका रस है ॥ १०॥ तं हाद्धिरास्तं अख्यं प्राणं हाङ्गिरा हत्येवंगुणयुद्रीथयुपासां- चक्र उपासनं कृतवान्यको दाल्भ्य इति वक्ष्यमाणेन संबध्यते । तभा बृहस्पतिरिति, आयास्य इति चोपासां चक्रं बक इत्येवं संबन्धं कृतवन्तः केचित्; "एतमु एवा- ङ्िरसं बृहस्पतिमायास्यं प्राणं मन्यन्ते" इति वचनात् । भवत्येवं यथाभरुतासंभवे संभवति तु यथाश्रुतम्, ऋषिचोदनाया- मपि भुत्यन्तरवत्; “(तस्माच्छ तचिन इत्याचक्षत एतमेव सन्त- मृषिमपि' । तथा माध्यमो ग॒- त्समदो विश्वामित्रो बामदेवोऽ- व्रिरित्यादीन् ऋषीनेव प्राणमा- पादयति तिः । तथेतानपय न् प्राणोपासकानङविरोबदस्पत्याया-
स्यान्प्राण करोत्यभेदविज्ञानाय ह
^तं हा्गिराःः अर्थात् अङ्गि फेसे गुणवाले इस मुख्य प्राणश उदृगीथकी दारभ्य वकने उपमा की-ईइस प्रकार इसका आगेसे समब है । तथा किसी-क्रिसीने दर्भप वकने वृहस्पति ओर आयास्यगुणवाे प्राणरूप उदृगीथकी उपासना कौ इस तरह इसका सम्बन्ध रग | है; क्योकि यह इस प्राणको ही आ्विरस ब्रहस्पति ओर आया मानते दैः एेसा वचन है । ,
ठीक दै, यदि यथाश्रुत भयं ८ श्रृतिका सरलार्थ ) सम्भव न ही तो रेखा [ दृरान्वथी ] भर्थंभैौ च्या जा सकता है । कंतु यहां तौ अतः क्षि होनेपर भी शते भाणको) शतर्चिन' रसा कहकः पुकारते है” इस न्य श्रु तिके अनु- सार ऋषियोका प्रतिपादन करने भढृत्त यथाश्रुत अर्थं भी सम्भव ही । इसी प्रकार श्रुति माध्यम, गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव भैर अत्रि आदि ऋषियोको ही प्राणमाक शी भराति कराती षै; रेस ही प्राण ; प्राण ही माता
ता ईइत्यादिके समान अङ्गिरा,
खण्ड २ ] श्ाङ्रभाष्याथं ६१ --१--- > > > >- -- ऋ > श्राणो ह पिता त्राणो माता' | बृहस्पति जौर आयास्य-इन प्राणो-
व पासक छषियोको भी श्रुति अमेद्- इत्यादिवच्च । तस्माद् विज्ञानके यि प्राप बनाती दै।
नाम आण एव सन्नात्मानमङ्गि- | भतः इसका तासयं यह हे कि अङ्खिरा नामक ऋषिने प्राणस्वरूप रसं प्राणमुद्रीथशरुपासांचक्र इत्ये- | होकर दी अङ्गिरस आत्मा प्राणरूप उदुगौथकी उपासना की; क्योकि प्राण होनेके कारण यह अङ्गका रस है, सनरसस्तेनासाबाङ्खिरसः।।१०॥ | इसस्यि आङ्गिरस दै ॥१०॥ श्राणकरी वृहस्पति संज्ञा होनेमं हेत तेन त९ह बरहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव बृहस्पति मन्यन्ते वाग्वि बृहती तस्या एष पतिः॥११॥ इसीसे बृहस्पतिने उस प्ाणके रूपमे उदुगीथकी उपासना कौ । रोग इस प्राणको ही बृहस्पति मानते दै; वथोकि वाक् ही बृहती है ओर यह उसका एति हे ॥ ११ ॥ । तथा वाचो बृहत्याः पतिस्ते- | तथा यह वाक. यानौ इहतीका नासौ बृहस्पतिः ॥ ११ ॥ । पति दै, इसस्य बृहस्पति है।॥११॥
तत् । यद्यस्मात्सोऽङ्गानां प्राणः
श्राणकी जायास्य स्ना होनेमें हेतु तेन तर्हायास्य उद्गीथमुपारसाचक्र एतमु एवा- यास्यं मन्यन्त आस्यायदयते ॥ १२ ॥
इसीसे आयास्यने इस प्राणके खपे ही उदुगीथकी उपासना की । = । रोग इस प्राणको ही आयास्य मानते है; क्योकि यह आस्य ८ मुख ) € । से निकिर्ता है ॥ १२॥ ह `
५.
६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ! तथा यथ्रसमादास्यादयते | तथा क्योकि यह जस्य (सस 4 से निकलता है, इसलिये आयाघ्
निगच्छति तेनायास्य छरषिःप्राण | जहपिने प्राणरूप होकर ही [इष
प्राणमय उदूगीथकी उपासना की ] एव सननित्यथंः । तथान्योऽपयु- | यद इसका तार्य हे । अर्थात् भन पासक आत्मानमेवाङ्किसादि- । उपसकको भी अङ्गिरस दि गुणोसि युक्त आतमस्वरूप प्रणत गुणं प्राणयुद्रीथ्ुपासीतेत्य्थः | रूपमे ही उदुगीथकी उपासना कपी ॥ १२॥ चाहिये ॥१२॥
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तेन तह बको दारभ्य षिद्ाचकार। स ह नैमिरो- यानामुद्गाता वभूव स ह स्मेभ्यःकामानागायति॥१३॥
अतः द्ल्भके पुत्र वकने | पू्वोक्तरूपसे ] उसे जाना । [ अर्थात् ूोकत मकरारते प्राणमय उदृगीधकी उपासना की । | वह नैमिषारष्यम यज्ञकरनेवारोका उद्गाता हुभा ओर उसने उनकी कामनापूर्तिके लिये उद्गान किया ॥ १३ ॥ ।
न केवलमङ्गिरः्रमृतय उपा- |. केवर अङ्गिरा आदिने ही प्रण- सांचक्रिरेः तं ह वको नामे | रूप उदुगीथकरी उपासना नही की दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो विदा- १ द्ट्भके पुत्र बकने भी उसे
लि न सं ति पवः चकार यथा दशितं प्राणं विज्ञात [ इसी भकार ] जाना था अर्थात् पू
ध „` | भवरचित प्राणका ज्ञान प्रात कि वान् । बिदित्वा च स ह नेमि- | था । इस परार उसे जानकर वह
शीयानां सत्रिणायद्राता वभूव । | नैमिषारण्ये यज्ञ॒ करनेवाोका
स च प्राणविक्ञानसामथ्यदिभ्यो प आ तथा इस प्राणःविज्ञान- | के सामर्थ्य
नेमिरीयेभ्यः कामानागायति से ही उसने उन नैमिज्ञीय
1 याक्तकंकी कामनार्थोका [ उनकी स्मदागातवान्किलेत्य्थः | १३॥ तिके स्थि] जागान किया ॥१३॥
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| विद्ान्यथोक्तयुण
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खण्ड २ ]
श्ाङ्रभाष्याथ
६३
नि 71 ग्राणह्टिसे जोकारोपास्तनाक्रा फठ
आगाता ह वे कामानां भवति य एतदेवं विद्रानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ इते हस प्रकार जाननेवाख जो विद्वान् इस उदगीथसंज्ञक भक्षर [ओंकार] की इस प्रकार उपासना करता है, वह कामनार्जोका आगान करनेवासा होता ह- एेसी यह जध्यास उपासना दै ॥ १४॥
तथा अन्योऽप्युद्राता आगाता ह वै कामानां भवति य एवं
प्राणमन्षर-
दूगीथशुपास्ते । तस्येतद् दष्ट फलपुक्तम्, ब्राणात्मभावस्त्वदृषं ‹ हवो भूता देवानप्येति" इति ुत्यन्तरात्सद्धमेवेत्यमिप्रायः 1 इत्यभ्यात्ममेतदात्मविषयुद्गी- भोपासनमिः्युक्तोपसंहारोऽधिदे- बतोदूगीथोपासने बुदधिसमाधाना्थंः ॥ १४ ॥
ब्ष्यमाणे
इसे ईस प्रकार जाननेवाखा जो विद्रान् इस उद्गीथसंजञक अक्षरकी उपर्युक्त गुणविषशिष्ट॒प्राणूपसे उपासना करता है, वह अन्य उद्गाता भी कामनार्ओका आगान करनेवाखा हो जाता है । यह उसका दृष्ट फर बतलाया गया है । “देवता होकर ही देवताओंको प्राप्त होता दहै” इस अन्य श्रुतिके अनुसार प्राणस्वरूपता- की प्रापिषूप अदृष्ट फर. तो सिदध ही है- यह इसका अभिप्राय हे । हत्यध्यासम्-- यह उद्गीथोपासना आत्मविषयिणी है- इस प्रकार जो पर्वक्तं कथनका उपसंहार क्या गया है बह आगे कीं जानेवारी अधिंदैवत उदगीथोपासनामे बुद्धिको समाहित करनेके स्थि रे ॥१४॥
"~ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्थमाष्याये द्वितीयसण्डमाष्यं सम्पूणम् ॥२॥
--4+-क््9्---
5 च ॥
॥
#
१
॥
तृतीय खल
मादित्यर्िसे उद्गीथोपत्तना अथाधिदेवतं य एवासौ तपति तमुद्मी पासीतोयन्वा पष प्रजाभ्य उदृगाथति । उयस्ः मोभयभपहन्त्यपहन्ता ह वे भयस्य तमसो भवति
य एवंषेद्॥ १॥
इसके अनन्तर अपिदैवत उपासना वर्णन किया जाता है- गे
कि वह [ आदित्य ] तपता है
› उसके रूपमे उद्गौथक्की उपासना करनी
चाहिये । यह उदित होकर परनाओंके चयि उद्गान करता है, उदिति होकर अन्धकार ओर भयका नादा करता है । जो इस मकार इसकी जानता [इसकी उपासना करता] है वह निश्वय ही अन्धकार ओर भयका
नाश कनेवाखा होता है ।॥ १ ॥ अथानन्तरमधिदेवतं देवताविष-
यथुद्गीथोपासनं प्रस्तुत मित्यर्थ; | देवताकिषयक
अनेकभोपास्यत्वादुद्गीथस्य । य
ए्वासावादित्यस्तपति तथुद्गीथ- | नो
इपासीतादित्यदृषटथोदूगीथुपा- सीतेत्यथः। तद्गीथमित्युद्गी- थशब्दोऽक्षरवाची सन्कथमादित्ये वतंते १ इत्युच्यते _
क ~ ण्
इसके अनन्तर अधिदैवत अर्थात् उद्गीथोपासनाका आरम्भक्रिया जाता है, क्योकि उद्- गीथञनेक परक्रारसे उपासनीय है । यह आदित्य तपता है, उस उद्गीथक्री उपासना करे;
अर्थात् आदितय-दष्टिसे उदूगीथकी
उपासना करे । (तयुद्गीथम्ः इसमे उद्गीथः शब्द अक्षरवाचक होता
इञा किंस प्रकार आदिलयमे संगतं होता दै
£ यह् बतलाया जाता दै-
|
1
खण्ड २ ] शाङ्करमाष्याथ ६५
उद्यन्युद्रच्छन्वा एष प्रजाभ्यः
रजार्थद्रायति प्रजानामननोत्प-
स्यरथम् । न ह्यनु ति तस्मिन्
। व्रीह्यादेर्निष्पत्तिः स्यादत उद्राय-
तीवोद्वायति,यथेबोद्वातानाथंम्। अत उद्गीथः सवितेत्यथंः ।
कि चोद्यननशं तमस्तज्जं च भयं प्राणिनामपहन्ति तमेवंगुणं सवितारं यो वेद सोऽपहन्ता नाशयिता ह वै भयस्य जन्ममर- णादिलक्षणस्य आत्मनस्तमसश्च तत्कारणस्य अज्ञानलक्षणस्य भूवति ॥ १ ॥
यह [आदिव्य] उदित होता हुजा --ऊपरकी ओर जाता हुआ प्रजाके ल्यि- प्रजाओंके अन्नकी उतयत्तिके
स्यि उद्गान करता दै, क्योकि `
उसके उदिति न होनेपर त्रीहि आदिकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; अतः जिस प्रकार उद्गाता अन्नके छ्य उदूगान करता है, उसी प्रकार वह उद्गान करनेके समान उद्गान करता है । भतः बुं उदूगीथ है-यह इसका तातपयं है ।
इसके सिवा, वह उदित होकर रात्रिके अन्धकार ओर उससे होने- वाठे प्राणिर्योके भयका भी नाञ्च करता है । जो इस प्रकारके गुणसे युक्त सविताकी उपासना करता हे, वह जन्म-मरणादिरूप आत्माके भय ओर अन्धकारका अर्थात् उसके कारणमूत अज्ञानका नाश करनेवास होता दै ॥ १॥
. ~ ग्भ
सूयं ओर प्राणकी समानता तथा प्राणदषटिसे.उद्रीथोपासना
यथपि स्थानमेदातप्राणादित्यौ
यद्यपि स्थानमेदके कारण प्राण ओर मादित्य मिन्न-से दिखायी देते
मिनाविब रु्येते तथापि न स | है, तथापि वह उनका ताचतिकं भेद
तच््रभेदस्तयोः, कथम् !
| किस प्रकार ! [यह बतडाते है- |
` ६६ छान्दोग्योपनिषद्
समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसे |
[ अध्याय !
स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति परत्थास्वर इत्यप तस्माद्रा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥
यह प्राण] भौर [सूरय] परस्पर समान ही है । यह प्राण उष्ण है `
ओर वह सू्यं॑भी उष्ण है । इस | प्राण ] को तरः एसा कहते है ओर उस [ सूं ] को स्वरः एवं परतयस्वर रेल कहते है । अतः इ
समान उ एव तुल्य एव प्राणः सवित्रा गुणतः, सविता च प्राणेन । यस्माहुष्णो्यं प्राण उष्ण्रासौ सविता कविं च स्वर इतीमं प्राणमाचक्षते कथयन्ति, तथा स्वर इति प्रत्यास्वर इति चु सवितारम् । यस्माताण स्वरत्येव न पनतः प्रत्या
गच्छति, सविता. त्वस्तमित्वा
इनरप्यदन्यहनि प्रत्यागच्छति; अत, भरत्यास्वरः । अस्माद्गुणतो नामतश्च समानावितरेतरं प्राणा- दिन्यौ । अतः तच्वामेदादेतं ग्राणमिममसुं चादित्युद्रीथमर-
पासीत ॥ २।।
। भ्रणं। बौर उष सूर्य] रूपसे उद्गीथकी उपासना करे ॥ २ ॥
गुणृष्िसे प्राण सुर्के स्च ही है तथा सूयं प्राणके सच्श है
क्योकि यह प्राण उष्ण है बीर दहं ।
को सूय भी उष्ण है तथा इस प्राणं स्वरः देसा कहकर पुकारते ह ओर उस सू्को भी श्वरः एवं श्रवः
स्वर' एेसा कहते दै, क्योकि प्राण
तो केवरु स्वरण (गमन) ही करता
है-मरनेके पश्चात् वह पनः रता नही; कितु सूरय भतिदन अस्तमित हो-होकर छोट आता दै,
इसज्यि वह भरयास्वर है । इ भकार गुण ओर नामसे भी ये प्राण ओर भादित्य एक-दूसरेके तुल्य ही
ई । अतः तत्त्वतः शमेद् होनेके `
द्गी थक्ी जकार ) उपासना करे ॥ २ ॥
==; 9 ~=
रण इस प्राण भौर उस सूवरपते ( उदूगीथावयवमूत _
।
खाण्ड च ] शादङकस्ाष्याथ ॐ 3 -- त त त ऋ ~ व्यानदष्टिसे उद्गीथोपासना
अथ खलु व्यानमेवोदगीथमुपासीत यद्र प्राणिति स राणो यदपानिति सोऽपानः । अथ यः प्राणापां नयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः स वाक् । तस्माद्- प्राणन्ननपानन्वाचमभिग्याहरति ॥ ३॥ तदनन्तर दुसरे भकारसे [ अध्यातमोपासना कटी जाती है-- 1 व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे । पुरुष जो प्राणन करता है , (सुल या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकाल्ता हे ) बह भाण. है जीर ज्ञो अपधास ठेता र ८( वायुको भीतरकी ओर सीचता ह ) वह अपान हे । तथा प्राण ओर अपानकी जो सन्धि है वही व्यान हे। जो व्यान ` हे वही वाङ् है । इसीसे पल्ष प्राण ओर अपान क्रिया न करते हुए ही . वाणी बोरूता है ॥ ३ ॥ | अथ खल्विति प्रकारान्तरेणो- । “अथ खल"--अव भ्कारान्तरसे
उदूगीथकी उपासना कही जाती है । पासनयुद्रीथस्योच्यते, व्यानमेव | प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कदे
जानिवारे रक्षणोसे युक्त व्यान है, `
वक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्येव वृत्ति-
विशेषुद्गीथमुपासीत । अधुना
तस्य तन्त्रं निरूप्यते-यद्र पुरुषः . प्राणिति युखनासिकाम्यां वायु बहि्िःसारयति, स प्राणाख्यो
बायोरदत्तिविरोषः, य दपानित्यप-
उसके रूपमे उद्गीथकी उपासना करे 1 अब. उसके तत्त्वका निरूपण किया जाता दै। पुरुष जो प्राणन करता षै -मर्थात् सुख ओर नासिका्रार वायुको बाहर निकार्ताः दै, वह वायुका प्राण नामकं दृिविरोष दै; तथा वह जो अपास करता हे, `
अर्थात् उन ( मुख भर नासिका )
श्वसिति ताम्यामेवान्तराकष॑ति | के ही द्वारा वायुको भीतर सीचता वायुं सोऽपानोऽपानाख्या इत्तिः। | £ वह उसद़ी अपानसंशक वृति दै।
का ॐ डे --
६८
छान्दोग्योपनिषद्
[ अन्याय १
ततः किम्{दत्युच्यते-अथ य उक्त- लक्षणयोः ्ाणापानयोःसन्थस्त। योरन्तरा वृत्तिविशेषः, स | ; यः सांस्यादिशासप्रसिदधः श्रुत्या विशेषनिरूपणामासौ व्यान इत्यमिप्रायः । कस्मात्पुनः प्राणापानौ हित्वा महतायासेन व्यानस्यैवोपासन- मुच्यते १ बीयंवत्करमैतुत्ात् । कथं वीर्यवत्करमहेतुतवमित्याह यो व्यानः सा वाक्व्यानकाय. त्वादयाचः । यस्मादयाननिर्वत्या पानव्यापाराबडूवंन्वाचमभिव्याई रत्युच्चारयति लोकः ॥ २ ॥
इससे क्या सिद्ध हुभा £ यह बत- खया जाता ै-उन उपर्युक्त लक्षण- वेलि प्राण भौर भपानक्ी जो सनि है-उनके बीचका जो वृत्तिविशेष
है, वह व्यान है ।श्रतदवारा विरेष- रूपसे निरूपण किये जनेके कारण यहां वह व्यान भमिप्रेत नहीं है बो साख्यादि शालमे प्रसिद्ध [ सर्व देहव्यापौ ] व्यान है सा इसका ताप्यं है ।
कितु प्राण जौर अपानक्ो छोह- कर अत्यन्त परिधमसे भ्यानक्ी ही उपासनाका निरूपण क्यो किया गया! एेसा प्रर होनेपर कहते है- क्योकि यह वीर्यवान् कर्मकी निष्पत्ति- का कारण हे । यह वीर्यवान् कर्मकी सिद्धिका कारण कैसे है ? इसपर कते ह -जो व्यान है, वही वाणी हे, क्योकषि वाणी व्यानका ही कायं हे । बाणी व्यानसे निष्प होनेवाढी है, इसस्यि रोक माणन शौर अपानन अर्थात् भाण जीर अपानकी किया न करता हुमा वाणीका अभिव्या- दरण--उचचारण करता दै ॥ २ ॥
ककय
श्चण्ड ये ] शाङ्करभाष्यं ६९ व्यानग्रयुक्त ह्ेनेसे वाक्, ऋक् , साम ओर उद्रीथकी समानता
या, वाक्सक्तस्माद भाण नपानन्नूचमभिव्या- हरति यक्तत्साम तस्माद प्राणन्ननपानन्ताम् गायति यत्साम स उद्धीथस्तस्मादभ्राणन्ननपानच्ु द्रायति ॥ ४॥ | जो वाक है वही ऋक दै । उसीसे पुरुष भाण ओर् अपानकी क्रिया न करता हुभा ऋकका उचारण कता ह । नो क् है वही साम हे । इसीसे प्राण ओर अपानकी क्रिया न करता हा सामगान करता है । लो साम है वही उदगीथ है। इसीसे प्राण ओर अपानक क्रिया न करता हुभ उदुगान करता है ॥ ४ ॥
तथा वाग्विशेषामूचम्, ऋक्स- इसी प्रकार वागिशेष ऋक्, 8 चोरी -छकस्थित साम जीर सामके अवय॒व- ` स्थं च साम, सामावयवं चोदधौ- | मूत उदुगीथको भी पुरुष प्राण ओर
पानन््यानेनैव अपानकी क्रिया न करता हुआ चम् केवर व्यानसे दी सम्पन्न करता
निर्वसयतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ / दै--यहं उसका अभिप्राय हैः ॥४॥
न केबलं बागाद्यमिव्याहरण-। केवर वाणी आदिका उच्चारण मेव-- ही नही-- अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथामग्नेम- न्थनमाजेः सरणं ढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपा- स्तानि करोत्येतस्य हेतो्व्यानमेवोदीथमुपा- सीत ॥ ५॥ इसके सिवा जो ओर भी वीयैयक्त कमं है; जेसे-अग्निका मन्थन;
किसी सीमातक दोना तथा युद घनुषको खीचना--इन सब कर्मोको भी पुरुष प्राण ओर अपानकी किया न॒ करता हुआ ही करता है। इस कारण व्यानदष्टिसे ही उदगीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥
७० छान्दोग्योपनिषद् [ ल्य १
अतोऽस्मादन्यान्यपि यानि, इसके सिवा नो दूसरे भी अधिक बीयंवन्ति कर्माणि = भयलसे निष्पत होनेवि वीरय निवै््यानि-यथागनेर्मन्धनम् , छ द जते ममक म्यन, अनेर्मर्ादाया सरणं धावनम् सीमातके दौड़ना ओर युद
8 धनुषक्रो सीचना--उरनह भी पुष दृढस्य धनुष आयमनमाकप॑णम्- | प्राण जीर अपानको क्रिया न करते
अप्राणन्ननपानंस्तानि करोति । | हए ही करता है । अतो विशिष्टो व्यानः प्राणा- | अतः प्ाणादिषृत्तियोकी ओेक्षा
त - | व्यान विशिष्ट है; ओर राजाकी दङतिभ्यः । बिषिष्टस्योपासनं उपासनाके समान फर्वती होनेके ज्यायः य कारण विरिष्टी उपासना भी एतस्य हेतोरेतस्मात्कारणादूव्या उतर दे । स हेतुत मर्था
इस कारणसे व्यानरूपसे दी उदगीथ- नमेबो दवीथमुपासीत, नान्यद्- | की उपासना श रर म॑वीरयवत्तरतव #यं ` | वायुकी अन्य वृत्तियों क क् ˆ || नहीं । कर्मको भविक परवल बनाना फलम् ॥ ५ ॥ ही उसक्रा फर है ॥ ५ ॥ . (=
उद्गीधाक्षरोमे प्राणारिदशि
, अथ खद्धद्रीथाक्षराण्युपासीतो हीय इति घ्राण एवोत्प्राणेन द्यत्तष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्या- चक्षतेऽन्नं थमन्ने हीद<ल्व< ` स्थितम् ॥ ६ ॥
इसके पश्चात् ` उद्गीयाकषरोकी उद्गीथः उस नामके अक्षरोकी, उपासना करनी चाहिये--उद्गीथ' इत शब्दे भाण ही ७त्' है, करयो
प्ाणसे ही = हैः वाणी ही भोः है, वर्योकि वाणीको “गिरां कहते ह तथा जन ही थः है बयो अन्नम दी यह सब स्थित हे ॥ ६ ॥
खण्ड ३] क्राङ्रमाष्याथ ७१ अथाधुना खलूद्वोथाक्षराण्यु- इसके पश्चात् अव उदुगीथके अक्षरोकी उपासना करनी चादिये ।
पासीत भक्तथक्षराणि मा | उदूगीथ, शब्दे उदूगीयमक्तिक नियतो विधिनि _ | अक्षर न सम्ञ ल्यि जायं इसलिये नित्यतो -उद्रीथइति, उद्गीथः यह विशेषण ल्गाते दै । तात्पर्य यह दहै किं उद्गीथ' ईस नामके अक्षरोकी उपासना करे; माक्षरोषासनेऽपि नामवत एवो- | क्योकि अमुक मिश्र फसा कहनेसे . | ज्ञेसे उस नामवाले व्यक्ति-विरोषका
पासनं कृतं भवेदगुकमिश्रा इति | बोध होता दे, उसी भकार नामके अक्षरोकी उपासना करनेसे भी
यद्वत् । नामीकी ही उपासना छी जाती दे ।
उद्गीथनामाक्षराणीत्य्थः। ना-
्राणएव उत्, उदित्यस्मिननकषरे | परण दी 'उद' हे, अर्थात् उत्! प्राणदः । कथं प्राणस्योच्व- इस अक्षरम भाणदषटि करनी चादि । मित्याह-प्राणेन दयततष्ठति सर्वो माण सस भकार द दे सो ॐ बतकते है- सथ रोग प्राणसे ही
ऽप्ाणस्यावसाददशं नात्; अतो- | उठते है, क्योकि प्ाणटदीनकौ शिथि-
ऽदः प्राणस्य च सामान्यम् || र्ता देसी गवी ह; अतः उत् ओर
प पराणकी समानता स्पष्ट ही है ।
बाग्गीः,बाचो ह गिर इत्याः 1 वाक् “गी, हे; क्योकि शिष्ट रोग
शिष्टाः । तथानं थम्, अनन हीदं | वाक्छ्ो 1 ४.६ म है
सर्वस्थितमतो तथा अन्न थ' हं, ही
सवेस्थितभतोसत्यभ्स्य यह सब स्थित दै; अतः अन्न ओर च सामान्यम् ॥ & ॥ थ अक्षरकी समानता हे ॥ ६ ॥
७९ उन्दोग्योपनिषष् [ अभ्याथ १ >< < € € € < € < ऋ < < ऋ ऋ < € ऋ € € ऋ ऋ "< ऋ< > >< ऋ उहीथाक्षरोमे चुटोक्ञादि तथा सामकेदादिदशि व्रयाणां शरुयक्तानि सामा- | इन तीनेकी समानता ्रूतिने न्यानि तानि तेनायुरूपेण शेषे- | बतकायी है । उन्दीके अनुसार् शेष ष्वपि द्रष्टन्यानि- स्थानम भी समक्षनी चाहिये-- योरेवोदन्तरिक्षं गी; परथिवी थमादित्य एवोदायु- गरग्नस्थे सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गी ऋगवेदस्थं दग्धेऽस्मे वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य॒ एतान्येवं विदवालुद्गीथाक्षरावयुपास्त उद्गीथ इति॥ ७ ॥ धौ ही उत्" है, अन्तरि “गी हैः जोर परथिवी “य ह । आदिल दी उत् है, वायु भी, है जोर अग्नि “थः है । सामवेद ही “उत्? है यजुवद शी" है ओर ऋग्वेद “थ | इन अक्षरोको इस प्रकार जानने- बाला जो विद्वान् “उद्गीथः इस भकार इन उदूगीथाक्षरोकी उपासना करता हे उसके ल्य वाणी, जो [ऋवेदादि] वाकूका दोह है, उसका दोहन करती है तथा बह अन्नवान् ओर अत्नका भोक्ता होता हे ॥ ७ ॥ चौरेव उत्, उच्चैःस्थानात् |, ऊचे स्थानवाखा होनेके कारण | युरोक ही उत् ठै, रोको अन्तरि गीगिरणान्रोकानाम् । | गिरण करे (निणलने) सं अन्तर शी" है ओर. भाणिका स्थान पएथिवीथं पराणिस्थानात्। होनेके करण प्रथिवी थः है । ऊँचा
इ होनेके कारण आदित्य ही “उत्? ह, एव उत्; ऊभ्वत्वात् । बायुगीर- अग्नि आदिको न
गन्यादीनां गिरणात् । अग्निस्थं ह है जर यज्ञसम्बन्धी र्वान् ( आश्रय ) होनेसे
यज्करमाबस्थानात्। सामवेद एव ९4 ६ रा स्वगंमे स्तुत स्वमससततत्ात्।यजुदो कारण सामवेद ही उत्, उत्, 1 । यजु ह यजुर्वेद शी? द क्योकि
ण्ड |
शाङ्ूरभाष्यारथं
७३
गीर्यजुबां प्रत्तस्य हविषो देवता- नां गिरणात् । ऋ्वेदस्थम्, ऋछच्यध्यूटत्वात्साम्नः । उदूगीथाक्षरोपासनफर्मधु- नोच्यते- दग्धे दोग््यसमे साधकाय । कासा! वाक्, इत्यादयो वाचो दोहः । ऋग्वेदादिशब्दसाध्यं फएलमित्य- भिप्रायः, तद्वाचो दोहस्तं खयमेव वाग्दोग्ष्यात्मानमेव दोग्धि । किं चान्नवान्प्रभूता- पनोऽ्नादशच दीपता्निभवति य एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त-
गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स नुपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ ^
यनुर्वदिथोके दिये हुए विकर देवता- लोग निगर्ते है तथा ऋगवेद हे; वर्थोकि ऋकमे ही साम अधिष्ठित हे ।
अव उदृगीथक्षरोको उपास्ननाका फर बतलाया जाता है-हस साधक- के स्यि दोहन करती दै, कौन ? वाक्, किक दोहन करती दहै ? दोहक, वह दोह क्या है १ इसपर कहते है-नो वाणीका दोह दै; अभिप्राय यह है कि जो छग्वेदादि शब्दसे साध्य फर दै, वह वाणीका दोह दहे, उसे वाणी स्वयं ही दुहती है । अपनेदीको दुहती है । यदी नदी वह अन्नवान्-बहुत-से अन्न- वाला ओर अन्नका] भोक्ता भो हो जाता ह, उसकी नटरामि उदीप रहती है, जो इन उपयुक्त उद्वीथा- क्षरोकी इन्दं उपयुक्त गुणोसे विशिष्ट जानकर, “उद्गीथः इस खूपसे उपा- सना करता हे ॥ ७ ॥
- ® अक्क -- सकामोपासनाका कम
अथ खल्वाशीःसम॒द्धिरुपसरणानीदयुपासीतं
येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ < ॥ अव निश्चय दी कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णेन क्या जाता है-] अपने उपगन्तव्य ८ ध्येयो ) को इस प्रकार उपासना
~
॥ +
छान्दोग्योपनिषद्
[ ष्याय १
< 96 95 < ऋ ष ¬ ८ ---2-8-5--हण् >< 88 -8€
ऋतः करे- निस सामके द्वारा उदृगाताको स्तुति करना हो उस सामका [ उसकी उत्पत्ति आदिक क्रमसे ] चिन्तन करे ॥ ८ ॥
अथ खल्विदानीमाशीः समू-
(~ (~ (~ 0 द्विराक्षिषः कामस्य समरद्धियथा भवेत्तुच्यत इति वाक्यशेषः । उपस्रणान्युपसतंव्यान्युपगन्त- व्यानि ध्येयानीत्य्थः; कथम् ! इत्युपासीत--ष्व्रुपासीत ; तद्यथा-येन साम्ना येन साम्- विशेषेण स्तोष्यन्स्तुतिं करिष्यन् स्याद्भवेदुद्गाता तत्सामोपधावे-
दुपसरेचिन्तयेदुत्पत्यादिभिः।८॥
इसके अनन्तर अब निश्वय दही भशीःसमृद्धि- जिस प्रकार आशीः अर्थात् कामनाकी समृद्धि होगी वह वतलायी जानी है, इस प्रकार इस वाक्यको पूर्तिं करनी चादिबे । उप- सरण--उपसर्तग्य-उपगन्तन्य अर्थात् ध्येय--इनकी क्रिस प्रकार उपासना करनी चाहिये ? इनको उपासना इस प्रकार करे; यथा- जिस सामते अर्थात् जिस सामविरोषसे उद्गाता- को स्तुति करनी ओ उस सामका उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे उप- धावन-उपसरण अर्थात् चिन्तन
करे ॥ ८ ॥
यस्याखचि तार्चं यदर्थेयं तपिं या देवता-
मभिष्टोष्यन्स्यात्ता
ऋषिवास हो उस ऋषिका तथा उस देवताका चिन्तन करे ॥ ९ |
यस्यामृचि तत्साम तां चर्च
युपधाविदेवतादिभिः । यदायं | हो
साम तं चर्षिम्। यां देवतामभि- (8 ्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् | बौर जिस देवता
॥ ९ ॥
देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥ [ चह साम ] जिस छचामे [ ।
प्रतिष्ठित हो ] उस ऋचाका, निक्ष
जिस देवताकी स्तुति करटनेवाखा हो ।
वहं साम जि चाम अधिष्ठित उस ऋचाका उसके देवतादिके करे । तथा वह साम 1 हदो उत ऋषिका की स्तुति करनेवाला
ः शे ग देवताका भी चिन्तन करे॥९॥
खण्ड २] दाङ्कर्माष्या ७५ ऋ ऋ € ऋ ऋ 8 ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ‰ ॐ ऋ ऋ + # # ++ »<
येनच्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्त्स्तोममुपधावेत्॥ १० ॥
वह निस छन्दके दवारा स्तुति करनेवाखा हो उस छन्दका उपषावन् करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला शे उस स्तोमका चिन्तन करे ॥१०॥
येनच्छन्दसा गायत्यादिना | वह निस गायत्री भादि छन्दसे स्तुति उपा करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन
लाच सयात क्रे तथा निस स्तोमसे स्तुति करने- वेत् । येन स्तोमेन स्तोष्य- | बाला हो उप स्तोमका चिन्तन करे । माणः स्यात्, स्तोमाङ्गफलस्य | स्तोमकरमका अङ्गमूत एक कर्को
कर्वमामिलादातनेपदं स्तोष्य- | ्ा दनेवाड होनेसे यहाँ शोष्य
माण इति, तं स्तोमगुपधा- | माण" _ ६ पदमे आलनेपदका भेत् ॥ १० ॥ प्रयोग किया गया है* ॥१०॥
~~: ० ~
यां दिङमभिष्टोष्यन्स्यात्ता दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥ जिस दिशाकी स्तुति कटेवाख हौ उस ॒दिशाका चिन्तन क्रे ॥ ११ ॥
` यां दिक्ञमभिषटोष्यन्स्यात्तां (क १ 1 ८ पा
नातिन सतुति करनेवाख हो उस दिशाक्ा
दिकगुपधावेदधिष्ठात्रादिभिः | उसके अषिष्ठाता देवता आदिक ॥ ११ ॥ हित चिन्तन करे ॥ ११॥
--; ॐ $= ‰ क्योकि शवरितजितः कतरभिप्राय क्रियाफठे' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार निस क्रियाका फर कर्ताको प्रास होनेवाङा होता है उसमें आत्मनेपदका प्रयोग आ करता हे ।
७६
छान्दोग्योपनिषद्
[ अण्याय १
आत्मानमन्तत उपसत्य स्तुवीत कामं भ्यायन्नपर मत्तोऽभ्यारो ह यदस्मे स कामः सष्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥
अन्तम अपने स्वरूपका चिन्तन कर अपनी कामनाका चिन्तन करते हुए भप्रमत्त होकर स्ति करे । जिस फलकी इच्छासे युक्त होकर वह स्तुति करता है वही फर तत्कारु समृद्धिको प्राप होता है ॥ १२ ॥
आतमानयुद्राता खं रूपं गोत्र- नामादिभिः सामादीन्क्रमेण स्वं चाटमानमन्ततोऽन्त उपसत्य स्तुवीत । कामं ध्याय प्रमत्तः स्वरोष्पव्यञ्जनादिभ्यः प्रमादम- बर्वन्। ततोऽभ्याशः क्षिप्रमेव ह यत्रास्मा एवंषिदे स॒ कामः समृध्येत समृद्धि गच्छेत् । कोऽ सो १ यत्कामो यः कामोऽस्य सोऽयं यत्कामः सन् स्तुवीतेति
उदुगाताको चादिये कि गोत्र भौर नामादिके सहित अपना-अपने स्वरूपका चिन्तन करता हुभा अर्थात् सामादि क्रमसे अन्तम अपना स्मरण करता हुभा स्तुति करे । [ किस प्रकार स्तुति करे १ ] फल- का चिन्तन करता हुशा अप्रमत्त होकर अर्थात् स्वर, ऊभ्म एवं व्यज्ञनादि वर्णोचारणमे प्रमाद न करता हा [ स्तुति करे ] । इस प्रकार जाननेवाठे उस उपासककी जो कामना होती है वह शीघ्रदही समृद्ध ( फर्वती ) दो जाती है । वह कामना कौन-सी है? वह उपासक यत्काम अर्थात् जिस कामनावाख होकर स्तुति करता हे । [ श्रृतिमे ] "यत्कामः स्तुवीतः इन पर्दोका दो गार प्रयोग दरक
दिरुक्तिरादराथा ॥ १२ ॥ ख्यिदहै॥ १२॥ --ः: ‰ :- इतिच्छान्दोम्योपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीयसखण्डमाष्य सम्पूणंम् ॥ ३॥
"वीक
(न ४
चतुर्थं सकणड
उद्गीथसंजञक ओंक्रारोपारनासे सम्बद्ध आस्यायिक्ना
ओमित्येतदक्रमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपठयाख्यानम् ॥ १ ॥
“ॐ यह जक्षर उद्गीथ है--इस प्रकार इसकी उपासना करे । “ॐ रेता [ उच्चारण करके यज्ञम उद्गाता ] उद्गान कर्तां & । उस ८ उदगीथोपासना ) की ही व्याख्या कौ जाती है ॥ १ ॥
ओभित्येतदित्यादिग्रकृतस्या- | पूर््रस्तावित लोका अक्षका ही “ओमिव्येतत् इत्यादि वाक्यदवारा
क्षरस्य पुनरु पादानगु्रीथाक्षरा- | इसरिे ग्रहण किया गया है जिससे बीचमे “उद्गीथः शब्दके अक्षरोकौ उपासनासे व्यवहित हो जानेके कारण अन्यत्र प्रसङ्ग न हो जाय । उस पूरपरस्तावित अक्षरके ही अग्रत रस्यायृताभयगुणिकिषटस्यो- | ओर गमय _शुणविचिष्ट सवसो उपासनाका विधान करना है-इसीके
यासनं बिधातव्यमित्यारम्भः । | ल्थि [आगे भ्रन्थ] जार दय जाता है । जोमित्यादि मन्त्री ओमित्यादिन्याखूयातम् ।।१॥ । व्याए्या पके फी ब घुकी है ॥१॥
प 9 [अ
चुपासनान्तरितवादन्यत् प्सञञ|
मा भूदित्येवमर्थम् ्रकृतस्येवा-
७८ छान्दोग्योवनिषद् [ अच्वाय १
देवा वे श्रत्योबिभ्यतच्लथीं विद्यां षाविङाश्स्त छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादय<स्तच्छन्दसां छन्द्- स्त्वम् ॥ २ ॥
[ एकं बार ] मू्युसे भय मानते हुए देउता्ओंने त्रयीवियारम प्रे किंया । उन्होने अपनेको छन्दसे आच्छादित कर ल्या । देवतार्ओन जो उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोका छन्दपन है । [ अर्थात् देवताओंको आच्छादित करनेके कारण ही मन्त्रौका नाम छन्द हुआ दै ] ॥ २ ॥
देवा वै मृत्योर्मारकाद्बिभ्यतः | प्रसिद्ध देवतार्थोने मारक मृयते कं कृतवन्तः ? इत्युच्यते-त्रयीं | भय मानते हुए 1 ८ # ~. _ < ~ _ | बतराया जाता है- उन्होने त्र विद्यां 4 0 विया केदारा प्रतिपादित विषवन्तो वेदिकं कमं प्रारव्ध- | कमे पवेश क्रिया । अर्थात् वैदिक वन्त॒ इत्यथः, तन्मृत्योख्धाणं | करमको ही मृयते बचनेका साधन मन्यमानाः । किं च ते कर्मण्य- | समञ्चकर उन्होने उसीका आरम्भ
दोभि्नो कर दिया । तथा कमम जिनका , विनषु्तन्दोमिमनेनपहो- विनियोग नही है उन छन्दो-मन्त्रो- , मादि डबेन्त आत्मानं कर्मन्त- | से जप एवं होमादि करते हुए
रष्वच्छादयंद्मदितवन्तः । य. | उन्दनि. अपनेको कर्मन्तरोमिं
यसदभिमेरन्मदवसलत । १ | भाच्छादित कर दिया । क्योकि ~ | उन्होने अपनेको इन मन्त्रि स्माच्छन्दसां मन्त्राणां छदना- आच्छादित कर दिया था, इसलियि
त छादन करनके कारण ही छन्दा यानी च्छन्दस्त्वं प्रसिद्धमेव ॥ २ ॥ मनका छन्दपन प्रसिद्ध ही है ॥२॥
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खण्ड ४ |
~~ (>< < > क = च > ग््
शाद्करभाष्याथं ७९ ~ ¬ ¬> > >> ॐ ऋ >> >
तालु तत्र श्दयर्यथा मस्स्यमुदके
परिपदयेदेवं
पर्यपदरयदचि साग्नि यजुषि । ते नु विदितो्वा ऋचः सास्नो यजुषः स्वरमेव प्राविदान् ॥ ३ ॥
जिस प्रकार [मकरा] जलम मछलियोंको देख ता है, उसी प्रकौर ऋक् , साम ओर यजुःसम्बन्धी करममिं रुगे हुए उन देवतार्ओको मयने देख छया 1 इस बातको नान लेनेपर उन देवतानि ऋक्+साम ओर यजुः सम्बन्धौ कमस निकृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) मं ही प्रवेश किया॥३॥
तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्ृत्युय- था लोके सत्स्यघातको मत्स्य- युदके नातिगम्भीरे परिपश्येद- डिशोदकसरावोपायसाध्यं मन्य- मानः,एवं पर्यपरयददृष्टवान्मृतयुः; कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन इत्यर्थः । कासौ देवान्दद्!इत्यु- च्यते- ऋचि साम्नि यजुषि । ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकरममणीत्य- थैः । तेलु देवा वैदिकेन कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्तो मूत्योरिचिकीषितं विदित- वन्तः । विदित्वा च त ऊर्व व्यादृत्ता; करमभ्य छचः साम्नो
निस प्रकार रोक बंसी ख्गाने ओर जरू उरीचने आदि उपार्योसे मछरियोको पकड़ा जा सकता हे, यह जाननेवाका मेरा उन्दं कम गहरे जलम देख लेता है उसी प्रकार मृद्युने कर्मपरायण देवता्ओको वहाँ [ छि हुए] देख ल्या, अर्थात् मूल्युने यह समञ्ञ लिया किं देवतार्ओंको कम॑ ्षयद्प उपायके द्वारा अपने अधीन किया जा सकता है । उसने देव- ताओंको कहो देखा £ यदह बतराया जाता दे- ऋक् , साम ओर यजु अर्थात् छक , यजुः जोर साम- सम्बन्धी कर्मे । वैदिक कर्मानुष्ठानके कारण शुद्धचित्त इए उन देवताओंने “मृसयु क्या करना चाहता है ® यह जान ख्या । यह जानकर वे छक;
साम ओर यजुःसे अर्थात् ऋक् +यजुः . .
ओर सामसम्बन्धी कमंसे निषृत्
|. ॥#.
८@
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय १
यजुष ऋग्यजुःसामसबदात्कमं णोऽभ्युत्थायेत्यथः। तेन कमणा मृत्युभयापगमं प्रति निराश्षास्त-
दपास्यामूवाभयगुणसमक्षरं स्वरं
स्वरशब्दितं प्राविशन्नेव प्रविष्ट बन्तः; उभकारोपासनपराः संवृत्ताः । एवशब्दोऽवधारणार्थः सन्सयुच्चयग्रतिषेधार्थः । तदुषा- सनपराः संवृत्ता इत्यथः ॥२॥
होकर ऊपरकी ओर उठे । उष कर्मसे मृद्युके भयकी निवृतिके प्रति निरा होनेके कारण वे उसे शोदृ- कर भमत ओर शमय गुणविशिष् भक्षर॒ यानी स्बरर्भे--स्वरसंज्क अक्षरे ही प्रविष्ट हो गये अर्थात् , ओंकारोपासनाम तत्पर हो गये । यहां "एवः शब्द भवधारणके स्यि होकर [ पूवं स्थानोकि साथ स्वरके ]
¡ समुष्चयका प्रतिषेध करनेके रयि
है । तात्य यह है कि वे उसीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ २ ॥
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ओकारका उपयोग ओर महत्व
कथं पुनः स्वरशब्दवाच्यत्व- मक्षरस्य १ इत्युच्यते-- सामेवं विदय
जिस समय [ उपासक अध्य् समय वह ॐ एसा
कितु वह॒ अक्षर स्वरः शब्दका वाच्याथं किस प्रकार है १ यह
वतलया जाता दै-- य॒दा वा ऋचमाप्नोव्योमित्येवातिस्वरत्येवश यजुरेष उ स्वरो यदेतद््षरमेतद्मृतमभयं त देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥
न ---- -
©. खण्ड ४ | शाङ्कस्भाष्याथ ८१ 4 ~> >~ ॐ
यदा बा ऋचमाप्नोत्योमित्य- | निस समय [ उपासक । ऋकको ्रप्तकरता है उस समय वह ॐ
बातिसखरत्येवं सामेवं यजुः। एष | देसा कहकर हौ ऋं आद्रे उचारण करता दहै। इसी प्रकार उ स्वरः । कोऽसौ १ यदेतदक्रमे- | वह साम॒ भौर भजुको ५ करता है । यदी स्वर दै; वह स्वर तदभृतमभयम् , तत्प्रविश्य यथा- | कौन हे १ यह जो अक्षर है, यह अमूत ओर अभयद्ूप दहै, उसमे गुणमेबाखता अभयाशाभवन् | प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत जर अभय हो देवाः ॥ ४ ॥ गये ये॥४॥ व्क
ओक्रारोपसनाका फल
स य एतदेवं विद्वानक्षरं भ्रणोत्येतदेवाश्चर£ स्वरः मघ्रतमभयं प्रविराति तस्परविदय यदश्ता देवास्तदभ्रतो भवति ॥ ५॥ |
वह्, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति (उपासना) करता षै, इस जमृत जर अभयरूप अक्रमे ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमे प्रविष्ट होकर लिस प्रकार देवगण अमर् हो गये ये, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५\, ॥
स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- ¦ उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी
रमेवममृतमभयगुणं विद्वा्प्रणौ- । प्रकार अमूत ओर अभयगुणसे विरिष्टं जानता हभ उसकी स्त॒तिकरता दै-
ति स्तौति-उपासनमेवात्र स्त॒ति-। यहाँ स्तुतिका शमिभाय उपासना
र छान्दोग्योपनिषद् [ भष्याय ! व > 9 > 9 ® 9 3 ध 99 9 क @ < ४ ॐ > 5 रमिगप्रेता--स॒तथेवैतदेवाकषरं ही हे वह उसी पकार (उन्
देवताओंके ही समान ) इस॒ अप्त स्वरममृतमभयं प्रविशति । ओर अमयह्प अक्षरम ही प्रि
' हो जाता हे ।
ल प्रवि-
वलस्य च रजं अति तथा उसमें प्रविष्ट होनेपर, निष शनामिव राज्तोऽन्तरङ्गबदिरङ्ग- | प्रकार राजङरमे पवेश करेवा कोई राजाके अन्तरङ्ग रहते है ओर कोई ब हिरज्ग रहते है, इस प्रका बरिरङ्गताग परग्रह्मके अन्तरङ्ग-बदिरङ्गताका भेद षः; कि तदहि ! नदी रहता । तो फिर क्या रहता यदमृता देवा येना्रतत्वेन यद- | ६ ? जिस अयृतत्वसे देवगण अमर वा व हो गये थे उसी अमृतत्वसे विशिष्ट ता अभूवस्तेनैवाखृतत्वेन वि- | होकर यह भी उनी समान अमर मवति न न्यूनता हो जाता है । इसके अमृतत्वे न
तो न्यूनता रहती है ओरन नाप्यधिकतामृतत्व इत्यर्थः ||५। अधिकता ही ॥ ५ ॥
तावन्न परस्य ब्रह्मणोऽन्तरङ्ज-
इतिच्छान्दोग्योपनिषवि पथमाध्याये चतुथखण्डभाष्यं सम्पूणेम् ॥४॥
न
कड्चम कण्ड्
ओकार, उ द्रीथ जौर अारित्यका अमेद
प्राणादित्यदृ्िनिशिष्ट्ोद्वीथ- । पूर्वोक्त माण ओर भावित विशिष्ट उदृगीथोपासनाका दही स्योपासनरक्तमेवान्च प्रणवोद्री-| अनुवाद् ( पुनरुल्टेख ) कर प्रणव जर उदुगीथकी, एकता करते हए थयोरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राण- | अंब उसी सङ्गमे भाण ओर , | रदिभयोके मदरूप गुणसे युक्त रिममेदगुणविरिष्टदृष्टथाक्च- | दृष्टस उस अक्षरकी ( उदूगीथाबय- वभूत ओंकारकौ ) भनेक पूत्ररूप रस्योपासनमनेकपुत्रफरमिदानीं | फल्वारी उपासना निरूपण करना है-ईसीख्यि [ आगेका व्यमित्यारम्यते-- मन्य ] आरम्म किया जाता है-- अथ खलु य उद्वीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उदृगीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ ` एष भ्रणव
ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १॥ `
निश्चय ही जो उद्गीथ है वही प्रणव दै जर जो पणव हे बहौ उदूगीथ दै । इस प्रसार यह आदित्य ही उदूगीथ है, यही णव
हे, क्योकि यह ८ आदित्य ) ॐ एसा उथारण करता हआ हौ गमन '
करता दै ॥ १॥
अथं खलु य उद्रीथः स प्रणवो , निश्चय हो जो. उद्गीथ है ही
बदुबुचानाम्, यश्च॒ प्रणव- | ऋवे पणव, तया उनका 1
स्तेषां स एव छान्दोग्य उद्वीथ- शब्द्वाच्यः। असो वा आदित्य उद्वीथ एष प्रणवः । प्रणवरब्द्- वाच्योऽपि स एव बदृचानां नान्यः |
उव्गीथ आदित्यः, कथम् ?
उद्वीथाख्यमक्षरमोमित्येतदेष हि बस्मात्स्वरनुचारयन्ननेकाथत्वा-
दरातूनाम् , अथवा स्वरन्गच्छ- मेति; अतोऽसायुद्रीथः सविता
॥ १॥
` पृत्र है रेस कौषीतकि [ मादित्यसे ] भेदरूपसे त्र हग । यह अषिदवत उपासना
क -
छान्दोग्योपनिषद्
कर्
[ ण्याय ! 3 जो प्रणव है वही छन्दोग्य-उप- निषदूमं “उद्गीथः शब्दसे कका गवा
। यह आदिल ही उद्गीथ है यही प्रणव है; अर्थात् ऋमेदियोक यदो भ्रणवशब्दवाच्य भी वष्ट ह कों जौर नष है ।
आदित्य उद्गीथ है-सो कैसे ? क्योकि यह उदगीथसंजञक जक्षरको ॐ इस प्रकार स्वरन्-उचारण करते हुए जाता है [ यपि श्र आक्षेप, इस धातुसूत्रके अनुसार (स्वरन्, का अर्थं आक्षेप या गमन करते हुए होना चाहिये तथापि घातुर्ओके अनेक अर्थ होते है [इप-
स्वरन् का अर्थं “उच्चारण करते हुए" भी होता है] जथवां स्वरन् यानी चलनेवाला सूयं [ प्रार्णोकी
मदृप्तिके पति ॐ इस प्रकार अनुज्ञा करता हा | जाता हे । अतः यह सविता उद्गीथ ही ह ॥ १ ॥
9 -- ६ रस्मिरष्टसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान ओर फट
गानं किया था; इसीसे मेरि तू एक ही अपने
पत्रसे एहा । भतः तू रदिमर्योका १ इससे निश्वय ही तिरे बहुत-से
॥ २॥
~~
खण्ड ५] शाहृरमाष्याथं ८५
-तमेतश्च एवाहमभ्यगासि- | ननिश्वय इसीका मने आमिुल्य
गीत _ | ( प्रमुखता ) से गान् किया आ; षमाभिधरुख्मेन गीतवानस्म्या न न
दित्यरहस्यभेदं कृत्वा ध्यानं | रदिमयोका अमेद करके ध्यान किया कृतवानस्मीत्यर्थः । तेन | थ । इसी कारणते मेरे तू एक ही ~ | पुत्र दै रसा कौषीतकि -कुषी-
त ५ तके पुत्र कोषीतकिने अपने पुत्रसे पुत्र इति ह॒ कोषीतकरिः डुषीत- | का । भतः तृ सूर्य ओर रम्यका कस्यापत्यं कौषीतकिः पुत्रथुवा- | मेदपू्क (१ ध दिवं कर्तृपद तत्वं कारण प
चोक्तवान् । अतो ८०८८ (ह् ( (सा कल्लर ¦ च भेदेन त्वं पर्यावतयात्पर्या- | क्रियाकं स्थानने प्यवर्तयः यह वर्तयेत्यथेः, त्वं योगात् । एवं | मध्यमपुरुषो क्रिया समन्ञनी बहवो वेते र चाहिये । ईसं प्रकार [ उपासना ब् न तव पुत्रा भावन्य- |करनेसे) तेरे बहुत-से पुत्र उवन् होगे। न्तीत्यधिदवतम् ॥ २ ॥ यह अषिदैवत उपासना है ॥ २ ॥
मुख्यश्राणदष्टिसे उद्गीथोपास्ना
अथाभ्यात्म य पवाय सुर्य भ्राणस्तमुद्धीथमुषा- सीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥
इसके आगे अध्यात्म उपासना दै- यह जो स॒ख्य प्राण दै उसीके रूपमे उदुगीथकी उपासना करे, क्योकि यह {ॐ इस भकार अनुज्ञ करता हुभा गमन करता दै ॥ २ ॥
अथानन्तरमध्यात्मश्ुच्यते । { इसके भगे भध्यात उपासना य एवायं युख्यः प्राणस्तथुद्रीथ- | कदी जाती दै - य जो सुल्य प्राण
<& छान्दोग्योपनिषद् [ अभ्याय
ऋ ऋ >< >< > ऋ ऋऋ > युपासीतेत्यादि पूववत् । तथो- | दै,उसीकी दष्टे उटूगीथकी उपना करे-इसं प्रकार पूर्ववत् समङ्चना
मिति शेष प्राणोऽपि स्वरननेत्यो- चाहिये । तथा यह् प्राण भी ॐ
वि इस प्रकार कहता हुआ भर्थात् मिति नुत्ता इुवंनिव वागा- वागादिकी प्रवृतिके स्यि & इस प्रकार अनुज्ञा करता हुभ-पा गमन करता हे । मरणकाले मलने- वाटे पुरुषके समीप रहनेवारे रोग | प्राणका ॐ” उच्चारण करना नही प्राणस्योकरणं शृण्वन्तीति । | खनते [ इसीर्यि “अनुज्ञा करता
हुजा-साः कहा हे ] । इसी सादय एतत्सामान्यादादिव्येऽप्योकरण- | के कारण आदित्यम भी ओंकारो.
¦ रारण केवर अनुज्ञामात्र समञ्चना मनु्ञामत्रे द्रष्टव्यम् ॥ ३ ॥ | चाहिये ॥ ३ ॥
दिप्रवृत्यथमेतीत्य्थः । न हि
मरणकाले पुमूर्षोः समीपस्थाः
-‡+
प्राणमेददष्टिसे मुख्य प्राण्गी व्यरतोपासनाका विधान ओर फल
पपतम एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेको- ऽसति ह कोषीतकिः पुत्रमुवाच श्राणास्वं भूमान-
मभिगायताद्वहवो वे मे भविष्यन्तीति ॥ % ॥
भने परुलतासे केवर इसीका ( स॒ख्य प्राणहीका ढं ) गान छया था, इसल्यि मेरे तू छकेला दही उतर हआ" ेसा कौषीतक्रिने अपने
पुत्रसे कहा अतः तु भेर बहतसे पत्र होगि, इस अ विशिष्ट प्राणोका भुसतासे गान फर ॥ 9 ॥ ह
= | _ पय पवाहमम्यगातिषय ४ ब । अबलो बागादीन् इत्यादि वाक्यका अर्थं पूववत् ही
खण्ड ५] जाङ्रमाष्यार्थं ८७ ---2------ < ऋ > ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ क ॐ क 4
ख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- | समञ्चना चाहिये । अतः तू वागादि _ | ओर सख्य प्राण इनकी दृष्टिसे युद्रीथं परयन्भूमान मनसाभ- उद्गीथको मेदगुणविशिष्ठ देखता हुभाः उसक। मनसे बहत्वरूपसे अमिगान अर्थात् पूर्ववत् आवतंन कर । बहवो ममे मम पुत्रा भविष्य- तात्य यह है कि भेरे बहुत-से पुत्र होगे एेसे अमिप्रायसे युक्त होकर
न्तीत्येवममिग्रायः सन्नित्यथः । | [ उसकी उपासना कर ] ।
© ¢ ५ मायतात् पूवंवदावतयेत्यथेः ।
प्राणादित्येकल्वो द्वीथदृषटेरेक- ! एकपुत्रपरापिरप कल्के दोषसे ुत्रलफलदोपेणापोदितत्वाद्र- | भाण ओर आदिल्यके एकत्वद्प उदूगीथदृषटिकी निन्दा की जानेके
रिमिप्राणभेददषटेः कतंव्यता | कारण इस खण्ठमे अनेक पक्रहप श फलकी प्राप्िके लिये ररिमि जीर चोधतेऽस्मिन्काण्डे बहुपुत् | प्राण इनकी मद्ड्टकना भतिपादन
फरुत्वाथम् ॥ ४ ॥ क्रिया गया हे ॥ ४॥
प्रणव ओर ऊद्गीथक्रा अभेद अथ खट य उद्वीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्रीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुदरीतमनुसमाहरती- त्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥
निश्चय ही जो उदूगीथ दै, वही प्रणव है तथा जो प्रणव हे, वही उद्गीथ दै--इस भकार [उपरसना करके] उद्गाता होताके केम कयि हुए उद्गानसम्बन्पी दोषका अनुसन्धान ( संशोधन ) करता है, अनुसन्धान करता दै ॥ ५ ॥
अथ खलु य इद्रीथ इत्यादि | अथ खु य॒ उद्गीथः स्यादि प्रणवो द्ीथेकत्वदशेनयुक्तं तस्ये- | वायसे प्रणव जोर उद्गीथकी एता.
का प्रतिपादन किया गया है| तत्फल्श्न्यते--दहोदषदनाद्धोता | उसीका यह फल बतल्मया जाता
यत्रस्थ बंसति तर्स्थानं दोत्- है तृषदनात्--नहं पः होकर होता शंसन क्म करता है बदनं हौतरात्रमंणः सम्यकप्रयु- | उस स्थानका नाम होवृषदन दै, [ उससे ] अर्थात् सम्यक् प्रकारे अनुष्ठान किये इए होताके करमसे-- क्योकि केव् देशमात्रसे किमी फलको प्राति नहीं हो सकती । क्या देवापि दुरुद्ीतं दषटयुदीतयुद्रानं | होता है £ उद्गाताद्ारा जो दुरु द्गीत-दोषयुक्त उद्गान किया होता हतयुहाना स्वकमणि क्षतं कृत- | दे जर्थत् जपने कर्मत कोई दोप = _ ९, - किया होता है उसका वह (उद्गाता) ४ समाहार भर्थात् अनुसन्धान (दुधार) इत्यथः । चिकरित्सयेव धातुवै- | कर देता दै, जिस मकार कि चिकि त्सद्वारा धातुर्भोकी विषमता षम्यसमीकरणमिति ॥ ५ ॥ | ठीक कर दिया जाता है ॥ ५॥ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि रथमाभ्याये प्चमसण्डभाष्यं सस्पणम् ॥ ५ ॥
क्तादित्यथः । न हि देशमात्रा्
फलमाहतं शक्यम् । किं तत् !
| +
कष्ठ कण्ड् - ० -+- अनेक ६ प्रकारकती आधिदैविक उद्गीथोपाक्तनाएं अथेदाचीं सबफलसंपर्यथ- | +भव समस्त फर्की प्रा्िके लिये श्रुति उदूगीथसम्बन्धिनी मन्य रस्य उपासनान्तरं निभिः परकारकी उपासनार्ओका विधान
त्स्यते-- करना चाहती हे । इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यास्च्यध्यूढ<साम् तस्मा- हच्यध्यूढश्साम मीयत इयमेव साग्नरमस्तत्साम् ॥९॥ यह् ( परथिवी ) ही क् है ओर ग्नि साम हे | कह यह [ अग्निसकञक ] साम इस कमे अधिष्ठित दै । अतः छक अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है । यह प्रथिवी ही (साः दै ओर अनि
जमः दै; इल प्रकार ये [ दोनों मिखकृर । साम् है ॥१॥
` यह प्रथिवी ही ऋक् है, अर्थात् क , _ | छक एथिवीदषटि करनौ चाहिये । पृथिवीदृष्टः कार्या । तथाग्निः | तथा जम साम दे, साममे जग्नष्टि करनी चाये । प्रथिवी ओर अग्नि
इयमेव पृथिवी ऋक् ऋचि
भ्न्यगनिदष्टिः ं र ह साम, सान ऋक् एवं साम किंस प्रकार है १ सो
(~ ¢ पृथिव्यगन्योक्रक्सामत्वम् ! इत्युच्यते-तदेतत्तदेतद्गन्याख्यं सामैतस्यां पृथिव्यागृच्यध्यूढम्-
धिगतयुपरिमावेन स्थितमित्यथ,
वतलाया जाता है-- यह जो भग्नि- संज्ञक साम है,रस एथिवीसंजञक क् ` म अध्यूढ--अधिगत अर्थात् उपरि मावसे स्थित है, जिसभक्ञार कि साम
क यतक युत्रादिप्रातिरूप एकदेशीय फल्वाली उपा्नाओंका वणन
किया गया है ।
९०
छान्दोग्योपनिषद्
| मभ्याय
ऋचीव साम । तस्मादत एव कारणादुच्यष्युटमेव साम गीयत इदानीमपि सामगैः |
यथा च ऋषसामनी नात्यन्तं भिने अन्योन्यं तथेतौ प्रथि- व्यभ्री। कथम् ? इयमेव प्रथिवी
सा सामनामार्धशब्दवाच्या | ्
राधंशब्दवाच्योऽग्ररमस्तदेततथ- थिव्यगनिदयं सामेकशब्दाभिधेय- त्वमापन्नं साम । तस्मान्नान्योन्यं भिनें पृरथिव्यग्निदयं नित्यसंश्छि- टमक्सामनी इव । तस्माच प्रथि- व्यन्योऋकसामत्वमितयर्थः । सामाक्षरयोः एथिव्यम्निदृष्टि-
ऋकू अधिष्ठित रहता है । अत इस समय भी सामगान करनेवारे ्विोद्वारा कमे अधिष्ठित सामङ्च ही गान किया जाता है |
जिस प्रकार ऋक् ओर साम परस्पर अत्यन्त भिन्न नहीं है, उसी प्रकार ये प्रथिवी ओर अगिभी अव्यन्त भिन्न नहीं है । यह किप प्रकार ? [ सो बतखते है -- ] यह प्रथिवी ही सा साम, नामके जाघे रा्दद्वारा प्रतिपा है तथा उसके अन्य नामां “अम, शब्दका वाच्य अग्नि अमः है । इस प्रकार साम' इस एक शब्दके वाच्यत्वको प्राप्त इए वे हीये प्रथिवी जौर अग्नि दनं साम कहे नाते है । अतः ऋक् ओर सामके समान सर्वदा मिले.जनुे रहनेके कारण ये प्रथिवी ओर अग्नि एक-दूसरेसे भिन्न नहीं है । भाव यह कि ईइसीसे ए्थिवी जर अननक ऋक् एवं साम कहा गया हे । किन्दी-किन्दीका मत कि -साम' शब्दके अकषरोमे एथिवी ओर अग्निद्टिका विधान करनेके लिमि दी (इयमेव सा अगनिरमः देता उपदेश किया गया है ॥ १ ॥
9 २
खण्ड, ६ 1 शाङ्करभाष्यं ९१ अन्तरिक्चमेवर्ग्वायुः साम तदे तदेतस्यासुच्यण्युढ९ लाम । तस्माद च्यध्यूढरसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा
वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥ अन्तरिक्ष ही रक् हे ओर वायु साम दै। वह यह साम इष कमे अधिष्ठित दे; अतः कमे अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता हे । अन्तरिक्ष ही “सा' है भौर वायु "अमः है । इस प्रकार ये { दोनों मिरुकर ] साम है ॥ २ ॥ द्यौ रेवर्गादित्यः साम ॒तदेतदेतस्याखरच्यध्यूढः साम । तस्माद च्यध्यूढश्साम गीयते। यो रेव सादित्योऽ-
भस्वत्साम ॥ ३॥ धौ ही ऋक् है ओर आदित्य साम ह । वह यह [ भादित्यरूप | साम इस [ चौरूप ] ऋक अधिष्ठित है जतः चछकू्म. अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। चौ दही शा है ओर आदित्य “अम है । इस प्रकार ये [ दोनों मिङकर ] साम दै ॥ ३॥ अन्तरिक्मेवर्गवायुः सामेत्या- | अन्तरिक्ष ही ऋक् है जोर वायु
ई साम है इत्यादि पूर्ववत् स्मक्चना दि पूववत् ॥ २-३२ ॥ चाहिये ॥ २-२ ॥
--* ° {-
नक्षत्राण्येवक्चन्द्रमाः साम॒ तदेतदेतस्याखच्य- ध्युढश्साम । तस्माद च्यध्यूढःसाम गीयते । नक्षत्रा तयेव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥
नक्षत्र ही चक् है ओर चन्द्रमा साम हे । वह यह [ चन्द्रमारूप |] साम इस [ नकषत्रहप ] कम अधिष्ठित दै । अतः च्छक जधिषठित सामका ही गान. किया जाता दै। नक्षत्र दी शा है ओर चन्दमा (जमः हे, इव भरकर ये [ दोनों मिर्कर ] साम टै ॥ ४ ॥
नक्षत्राणामपिपतिशन्द्रमा चन्द्रमा नक्ष्नोका अधिपति ह अतः स साम ॥ ४॥ इसख्यि [ नक्रोके ऋका होनेपर ] वह साम है ॥ ४॥
यं य की
अथ यदेतदादित्यस्य शुक्टं भाः सैवर्गय यन्नीलं
परः कर्णं तत्साम तदेतदे तस्याग्र च्यष्युढश्साम ।
तस्माहच्यभ्यूढ<साम गीयते ॥ ५ ॥
तथा यह जो आदिव्यक शुङ्ज्योति है वही ऋक् है जीर उसे
जो नीरुवणं जव्यन्त इयामता दिलायी देती है वह साम है। वह यह
[ नीरणेरूप ] साम इस [ शृ्धज्योतीरूप ] ऋकूमे अधिष्ठित दै । भतः ऋक्मं अधिष्ठित सामक ही गान क्रया जता दहे ॥ ५॥
अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं | तथा यषहट॒जो आदिव्यकीौ शु
भाः शुक्ला दीप्तिः सेव् । अथ | मरभा- शुक दीति है दही छद्
यदादित्ये नीलं परः छृष्णं | है । तथा आदित्यम बो नीरं
परोऽतिशयेन काष्ण्यं तत्साम, | जयन्त इयामता दै बह साम दै
< र) किन्तु वह तो एकमात्र समाहित तद्ध कान्तसमादितदृषेदुश्यते दिवा प्रो ही दिखायी देती ॥ ५ ॥ है॥ ५॥
अथ यदे वेतदादित्यस्य शक्टं भाः तैव साथ यन्नीटं परः कृष्णं य एषोऽन्तरादित्ये दिरणनयः पुरूषो दइ्यते हिरण यरमशररहिरण्यकेदा आर- णखात्सवं पव सुवर्णः ॥ ६ ॥
जया य् जो मादिका शुक परकाश दै बही (सा दै ओर ज नीरवर्णं अयन्त इ्यामता है वहो अमः है, ये ही दोनों मिरुकर साम है । तथा यह
खण्ड £ ]
शा ङ्कुरभाष्याथ
शद
जो आदयमण्डठके अन्तर्गत घुवर्णमय-सा पुरुप दिखायी देत। हं, जो वर्णके समान इमश्रर्मोवाङा (दादी -म्िवास) ओर स्वणंसदक्ष केशवा दै तथा जो नखपयन्त सारा-का-सारा घुवण-सा ही है ॥ ६॥
ते एवैते माः शुक्लृष्णत्वे सा चाम साम। अथय एषोऽन्तरादित्य आदित्यस्यान्त- भ्ये दिरण्मयो दिरण्मय इव
हिरण्मयः । न हि सुवण॑विकार-
त्वं देवस्य संभवति ऋक्सामगे- |
ष्णत्वापहतपाप्मत्वासंभवात् । न दि सोवर्णेऽ्चेतने पाप्मादिप्रापि- रस्ति येन प्रतिषिध्येत । चाषे चाग्रहणात् । अतो लु सोपम एव
हिरण्मयशब्दो ज्योतिर्मय इत्य-
वे ही ये श्चुक्छत्व एवं ृष्णत्वरूप प्रकाश्च क्रमशः साः ओर “अमः होनेके कारण साम ई । तथा यह जो आदिल्यके अन्तर्गत--आदिल्य- के मध्यमे दिरण्मय--युवणमयके सच्श होनेके कारण घुवर्णमय [ साक्षात् वणका नहीं / क्योकि सरयदेवका घुवर्णके विकाररूप होना, सम्भव नहीं है; [ विकारखप होनेपर | उनका ऋक एवं सामरूप प॑ोवाला तथा निष्पापहोना सम्भव न होगा; को करि घुवर्णमय अचेतन पदार्थोमिं तो पाप आदिकी सम्भावना ही नही है, जिसके कारण उनका प्रतिषेष किया जाय । इसके सिवा, नेत्रस्य उपास्य पुरुषमे सुवणंविकारत्वका अहण भी नहीं किया जाता । ईइस-
| स्यि यह दिरण्मय शब्द लपोपम
ही है# अतः इसका अर्थं ज्योतिमय है | भगेके दिरण्मयादि श्दोका अर्थं भी इसीके समान र्गाना
थ । उत्तरेष्वपि समाना योजना॥ चाहिये ।
` @ अर्थात् हके आगे उपमावाचक इव' शब्दका कोप हुआ है ।
__
९७ पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति
बा स्वेनात्मना जगदिति,
दुश्यते निवचचकषुभिः समाहित-
चेतोमित्रयचर्यादिसाधनपिपषैः। तेजस्विनोऽपि उमभरुकेरादयः कृष्णाः स्युरित्यतो विशिनष्टि- दिरण्यर्मभर्दिरण्यकेश इति । ज्योतियान्येवास्य इ्मभूणि के- ाद्चेत्यथेः । आग्रणखास्रणसो नखाग्रं नखाग्रेण सह सर्वैः सुवर्ण इव भारूप इत्यथः ॥ ६ ॥
छान्दोग्योपनिषद्
[ मध्याय १
> ऋज [ एसा जो हिरण्मय ] पुल, [ रारीरखप ] पुरम श्चयन करनेके कारण अथवा अपनेद्रारा सारे नगत्- को पूणे करता है इसि यह पुरुष कहलाता दै, जिनकी इन्दा याह्य विषयोँसे निषत्त हो गयी है उन समाहित चित्त ओर ब्रह्मचर्यादि साधनवान् पुर्षोको दिखायी देता है- तेजस्वी होनेपर भी उसके दादी-्मूढ आदितो कलि ही होगे, अतः श्रुति उसको विरोषता बतलाती दे जो घुनहरी मश ओर घुनहडे केर्चोवाखा है; भर्थात् इसके दाी- मूड ओर केश भी ज्योतिर्मय ही है । तायं यह हेः कि यह नल- पयंन्त॒ अर्थात् नखाग्रसे लेकर सारा-का-सारा सुवर्णके समान प्रकाशस्वरूप ही दहै ॥ ६ ॥
` "स ०---
तस्य यथा कप्यासं युण्डरीकमेवमक्षिणी तस्यो- दिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वे स्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद् ॥ ७ ॥
उसके दोनों नेत्र बन्द्रके नैटनेके वणवाल पुण्डरीकं (कमर) के समान ह | करयोकि वह सम्पूणं पापस ऊपर गया हु है हे वह निश्चय ही सम्पूण पापस उपर उठ ज।
स्थान (गुदा) के सदश्च अरण उसका “उतः पसा नाम है, \ जो इस प्रकार जानता ता हे ॥ ७ ॥
खण्ड दे } = (७ ५८ तस्यैवं सर्वतः सुवणवणंस्याप्य- ह्णोर्विकषेषः । कथम् { तस्य यथा कपेमकंटस्यासः कप्यासः,
आसेरपवेशना्थस्य करणे घन्,
कपिपृषठान्तो येनोपविति । कप्यासं इव पुण्डरीकमत्यन्त-
तेजस्वि, एवमस्ब देवस्या-
क्षिणी । उपमितोपमानतान्न
हीनोपमा । तस्यैवंगुणविरिष्टस्य गोण- मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम्! स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः पाप्मना सह ततकायभय इत्यथं। (व आत्मापदरतपाप्मा' इत्यादि वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्वत इत्यर्थः, अतोऽसाघ्ुमामा ।
तमेवंयुणसंपन्नयुलामानं यथोक्तेन
प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेबो-
€ चाङ्करमाष्याथ ॥ ~अ 2 >-9- >- <-> >< < <~
इस प्रकार - सब ओरसे सुवणं- होनेपर भी उसके नेत्रम एक विरोषता है । किंस प्रकार £ उस देवके, जैसा किं कप्यास होता है उसके सरा लाल पुण्डरीक (कमरे समान अलयन्त तेजस्वी नेत्रे । कपि- मर्कट ( वंदर ) के आसिका नाम कष्यास दै, उपवेशन (ढे) अथके वाचक आसुः धातुसे करणमे 'घम्' पर्यय होनेपरं “आसः शब्द सिद्ध दोता ह । अतः कप्यासः का अथं वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा › है, जिससे कि वह वैठता । [यहो पुण्डरीकः को कप्यास' से उपमित किया गया दै जौर नेर्तरोको पुण्डरीककी उपमा दी गी है; इस प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण यह हीनोपमा नदीं हे ।
देसे गुणवाटे उस आदिवयान्तगंत पुरुषका “उतः यह गौण नाम हे। इसकी गौणता किप प्रकार टै वृह यह देव सम्पूणं पर्पोसे अर्थात् पापोसहित उनके कार्योसे उदित अर्थात् ऊपर गया हुआ दै, इसलि वृह “उतः नामवाख ह । जैसा कि “लो आत्मा पापसे हट हुआ है
| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी ।
एसे गुणसे युक्त उस ˆउत्' नामवाले पुरुषको जो पूर्वोक्त भ्रकारसे जानता है बह भी. इसी प्रकार सूरण
"
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ सभ्याय १
देतयुद्रच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। | पपेंसे ऊपर उट जाता हे । ह ओर हे वा इत्यवधारणार्थो निपातौ | वै'मे निश्वया्थक निपात है- अर्थ् उदेत्यवेत्यथंः । ७ | ऊपर उठ ही जाता है ॥ ७ ॥ तस्योद्गीतवं देवस्यादित्या- | आदित्यादिके समान उस [ उत्- संज्ञकं | देवका उदूगीथत्व कहना दीनामिव विवक्षितत्वादाह-- ` इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती ै- तस्यक्चं साम च गेष्णो तस्मादु ्वीथस्तस्माच्चे-
वोद्वातेतस्य हि गाता । स एष ये चामुष्मात्पराओो ोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदेवतम् ॥ < ॥
उस देवके छक ओर साम--ये दोनों पक्ष है ¦ इसीसे वह देव उद्गीथरूप है, ओर इसीसे [ इसका गान करनेवास ] उद्गाता कंटछाता दे, क्योकि बह इस (उत्) छा ही गान करनेवारा होता है। बह यह उत् नामक देव जो इस ८ आदित्यरोक ) से उपरके लोक दै ओर जो देवतार्ओंको कामना है, उनका शासन करता है । यहं अधिदेवत उदूगीथोपासना दै॥ ८ ॥
तस्यक्चे साम॒ च गोष्णो |. उत देवके चऋक् बोर साम
| ॥ गेष्य हे जथति पूर्वोक्त एथिवी जौर परथिल्यायक्तलक्षणे पवेणी । | अग्नि आदि उसके दोनों पष है,
र क्योकि वह देव सर्वखूप है । वह सर्वात्मा दिं देवः। परापरलोकं | परोक ओर इहसोकसम्बन्धी काम-
नार्भोका शासन करेवा है; अतः
काभेरितत्वादुपपद्ते पृथिव्य | उसका प्रथिवी ओर अग्न आदिषूप ५. | ऋक्ओर साममय पसि युक्त होना
ग्न्यादुक्सामगेष्णत्वम् , सवेयो- स ही हे । तथा सनका फारण
मी [ उसका ऋछक्-सामद्प नित्वाच 1. परकषोवाखा होना उचित है] ।
खण्ड द | ज्ाङ्करथाष्या्थे ९७
इस प्रकारं क्योकि वह उत् नामवाख है तथा ऋक् ओर साम मगेष्णश्च तस्मादेक्सामगेष्णत्व- | उसके पक्ष है, इसलियि ऋक्.साम- ख्प पक्षोवार होनेसे उसमें प्राप्त
परोक्षेण | उदगीथलका परोक्षखूपसे प्रतिपादन हो जाता दै; क्योंकि वह देव परोक्ष परोक्षप्रियत्वादेवस्य, तस्मादु रीथ] भिये । इपर्यि वह उद्गीथ है ठेसा कहा । इसी देसे, क्योकि
इति । तस्मास्वेव हेतोरुदं गाय- [यज्ञम उद्गान करनेवाला] उत्का
= गान करता है इसल्यि वह उद्गाता तीतयुता।तस्ादभेतस्व यथो कहता है । इस प्रकार कर्योकि वह
्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तो-। उपयुक्त उत् नामक देवका गान करता है इसल्यि उद्गाताका उद्गाता
यत एवगनामा चसाब्रक्सा-
प्राप्ठमुद्रीथत्वमुच्यते
द्रातेति.नामप्रसिद्विरुद्रातः। | रेखा नाम परसिद्ध होना उचित ही है। स एष देव उ्नामा ये चारुः | वही यह उत् नामक देव इस १ ध आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो
ष्मादादित्यात्पराश्चः प्ररागश्च- नादर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां
चेष्टे न केवलमीशित्त्वमेव च- शब्दाद्भारयति च, “स दाधार पृथिवीं च्ायुतेमाम्' (यजु ० २५। १० ) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । किं च देवकामानामीष्ट॒इत्येतदधि- देवतं देवताविषयं देवस्योदरी-
पराड् यानी परकै लोक दहै उन लोर्कोका ईश्वर (शासक) है । वह केवल शासनकर्ता ही नही है चच शब्दसे यह मी सिद्ध होता हे कि वहं उनका धारण भी करता है; जैसा कि “उसने इस प्र्वीकरो ओर चुलोक- को धारण किया" इत्यादि मन््रवण॑से सिद्ध होता है । यही ` नहो, वह देवताओंकी कामना्ओंका भी शासक है-इस प्रकार यह उस देवका- उदूगीथका अधिंदैवत-देवता विषयक
थस्य स्वसूपयुक्तम् ॥ ८ ॥ | स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ इतिच्छान्दोम्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डमाष्यं सस्पणेम्॥ ६ ॥
भृतिचे भरमाणित डोती हे ।
खयः कर्ड
अध्यात्म-उद्गीथोपासना अथाध्यास्मं वागेवकर्प्राणः साम तदेतदे तस्यामूच्य
"बरूढर<साम तस्माहच्यध्यूढ<साम गीयते । वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥
इससे अगे अध्यास उपासना है- बाणी हौ छक है ओर प्राण साम हे ।; इस प्रकार इस [ वाकल्प ] ष्छकमे [ प्राणङ्ूप ] पाम ` अधिष्ठित है । अतः कम अिषठित सामक ही गान किया जाता है।
वाक् ही सा हे ओर प्राण अम, है । इस भकार ये [ दोनों मिल्क | साम है॥ १॥ |
अथापुनाष्यात्मगुच्यते- वा- आधिदैविक उपासनाके पश्त्
र अव अध्यात्म उपासनाका वणन क्रिया -वक््राणः साम, अरोपरि- | जाता हे- नीचे-ऊपर स्थान होने- 8: भ तुल्य होनेके कारण वाक् ही स्थानत्वसामान्यात् । प्राणो ऋक् दे ओर पराण साम हे । वधुके < सहित घ्राणिन्द्िय दी यहाँ प्राण का ाणुच्यते सह वायुना । वागेव | गया है । वाक् ही “साः है ओर
म इत्यादि र भाण -अमः हे इत्यादि कथन पूर्ववत् सा प्रागाऽम इत्यादि पूववत् ॥१॥|| समञ्लना चाहिये ॥ १ ॥
[वि रि 0 = चत्तुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्याखच्यध्यूढ साम. ` तस्माद च्यध्यूढ<साम गीयते । चक्षुरेव सात्मामस्त- त्साम॥२॥
(~
शः ७] शाङ्करभाष्याथं ९९
२ चक्षु ही छक है ओर जाला साम ह । इस प्रकार इस [चक्षुरूप्] ऋक यह [आातमारूप्] साम जमिष्ठित है । इसख्यि ऋकर्मे अधिष्ठित ्ामका ही गान क्रिया जाता हे । चश्च ही सा" है लौर आत्मा अमः है । इस प्रकार ये [दोनों भिल्कर्] साम है ॥ २ ॥ चुरेव क्, आत्मा साम, | च्च ही चक् है जौर आत्मा साम आसेतिच्छा ततस्यला- है। यं "आत्वा, शब्दसे छायात्माका प र रहण है; कर्योकिं वही नेत्रम स्थित
होनेके कारण साम दै ॥ २॥
---: ® :-
शरोत्रमेवङ््मनः साम॒ तदेतदेतस्यामच्यचवूढ ताम् तस्मादच्यध्यूढः्साम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽ- मस्तस्साम ॥ ३ ॥ । श्रोत्र ही ऋक् है जीर मन साम है । इस मकार ईस [श्ोत्रर्प)] च्छक यह [ मनरूप | साम अधिष्ठित है । णतः छक अधिष्ठित सामा ही गानक्रिया नाता है । धोत्र ही सा षै जौर मन “अम' है । इस
त्साम ॥ २॥
` प्रकार ये [ दोनों मिखकर ] साम है॥२॥
ोतरमषङर्मनः साम्, श्ोत्रस्या- |. भरोत दी ऋक है ओर मन साम दै, ्रोत्रका अधिष्ठाता होनेकते कारण
धिष्ठातृत्वान्मनसः सामत्वम्।। २॥ मनकी सामरूपता है ॥ ३ ॥
----न्क्-- अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवगेथ यन्नीलं परः छृष्णं तत्साम । तदेतदेतस्या्च्यध्यूढ<साम । तस्मा च्यध्यूढश्साम मीयते। अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्छं भाः सेव साथ यन्नीलं परः ष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥
छाः उ -
१०० छान्दोग्योपनिषद् [ अभ्याय १
>< ८-8-90 ऋ ~ > ~ तथा यह नो ओंखोका शुक्र प्रकाश है वह ऋक् है भौर नो नीलवण अलन्त उयामता दै वह साम दै । इस प्रकार इस | शुक्ट परकाशखूप ] ऋकर्मे यदह [ नीलवण अत्यन्त इयामतारूप ]. साम अधिष्ठित है । अतः ऋक अषिष्ठित सामका ही गान किया नाता है । तथा यह जो नेत्रका क्छ प्रकार है वहो ्ा' दै ओर नो नीरुवणं परम श्यामता है वही “भमः है । इस प्रकार ये ` | दोनो मिर्कर ] साम है ॥ ४॥
अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः | तथा यह जो नेतरोका शुक्छ पकाश
सेवक । अथ यत्रीलं परः कृष्ण- | दै वही छक दै गौर नो तू
~ समान दक्शक्तिका अधिष्ठानम
मादित्य इव दु नीरुवणे अतिशय इयामत्व टै वह तत्साप्र ॥ ४ ॥ साम है॥ ४॥
णि - वि आदिव्यान्तगंत ओौर नेत्रान्तरत पूरूषोक्ी एकता
अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो ददयते सेवक्त॑त्ताम तदुक्थं तयजुस्तदूवरह्म । तस्थतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावसुष्य गेष्णो तो गेष्णो यन्नाम तन्नाम ॥५॥
तथा यह नो नेत्रकि मध्यम पुरुष दिखायी देता है बही छक दे, वही साम दे, वही उक्थ ह, बही यजुः है ओर वही बरहम ( वेद ) दै । उस इस पुरुषका वही रूप दै जो उस ( आदि्ान्तर्गत पुरुष ) का रूप है। जो उसके पक्ष है वही इसके पृ है, जो उसका नाम द वही इका नाम दै ॥ ५, ॥ ॥
आण्ड ७1
अथय एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दुरयते, पूर्ववत् । सैवग्यात्मं वामाद्या पृथिव्याथा चाधि- देवतम् । प्रसिद्धा च ऋक्पाद्- ब्रद्ाक्षरात्मिका तथा साम । उक्थसादचर्यादया स्तोत्रं साम ऋक् शचणुक्थादन्यत् । तथा यजुःस्वाहास्वधावषडादि स्मेव बाग्यनुस्तर्स एव; सर्वात्मक- त्वात्सर्वयोनित्वाचेति ्यबोचाम।
ऋगादिप्रकरणात्तद्भब्ेति त्रयो वेदाः ।
तस्यैतस्य चाज्ञस्य परुषस्य तदेव रूपमतिदिरयते । किं तत् १यदगुष्यादित्यपुरुषस्य । हिरण्मय इत्यादि यदधिदेवत- यक्तम् । यावष्ष्य गेष्णौ पणी तावेवास्यापि चाषस्य गेष्णो । यच्चाधुष्य नामोदित्युद्रीथ इति च तदेवास्य नाम ।
४ १०१
शाङ्करभाष्य ४-४८-9 8-82-89 9995-9 80 5 ~ = 9-95-55 85 8 98
तथा यह् जो नेत्रोकि मध्यमे पुरुष ॒दिखरायी देत ईै-इस वाक्यका तायं पूर्ववत् समश्चना चाहिये । वही वागादि अध्या जीर ए्थिवी भादि अधिदैवत क् ह, जिसके पाद नियत ॒अक्षरोसे वैधे होते है वह ऋक् तो प्रसिद्ध ही है--तथा वही समद । अथवा [ इन ऋक् जर साम, शब्दोका अर्थं इस प्रकार समन्नना चाहिये-- ] उक्थक्रा सहचारी होनेसे स्तोत्र दौ साम दै ओर उक्थसे भिन्न जो शस्त्र (मन्तरविरोष) है वे दी ऋङ् है; तथा स्वाहा, स्वधा जर वषट् आदि सम्पूणं वाक्य ही यजुः है । सर्वातक ओर सवका कारण दोनेके कारण बह यजुः स्वयं पुरुष ही है--एेसा हम पहले ह चुके रै । यहाँ ऋगादिकरा प्रकरण होनेसे'वही बरहमहै'इस वाक्यम [नह्म- शब्दसे] तीनों वेद समञ्षने चाहिये ।
उस इस नेत्रस्य पुरुषका वही खूप बतलाया जाता है । वह् रूप क्या है १ जो खूप उस आदिव्या- न्तग॑त पुरुषका था, जिसका कि हिरण्मय आदि अषिदेवतरूपसे वर्णेन किया गया था। जो उस ८ आदिपुरुष ) के प्कषथेवे दी इस नेतरा्त्मत पुर्षके भी पक्ष है। जो उसके “उत्,अथवाउद्गीय'आदि
नामथे, वेदी इसके मी नाम दै । ` १
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"क अ
१०२ छान्वोम्योपनिषद् [ अन्याय १.
ऋ 2 9८ ८ 3-2-9८ 8-8-5८ ट >. 9 >< 9 9 8 -४ ४ € ;
स्थानभेदाद्रपगुणनामातिदे- | यदि कहो कि आश्यका मेद
होनेसे, [ आदित्यान्तग॑त पुरुषके ]
शादीरितृत्वविषयभेदन्यपदेशा- | रूप, गुण ओर नामका ( बा्ुष
पुरुषमे ) अतिदेश्च" होनेसे तथा
च्चादित्यचाकुषयोर्भेद इति चेत् १ | ईरित्ल ( शासन ) के विषो
"= मेद बतलये जनेके कारण आदिल
न; अघरुनानेनेवेत्येकस्योभया- | जर नेत्रान्त्गत पुर्षोका मेद ै-
तो एसा कहना ठीक ४. #
तेः एसा माननेपर [ भन्त्र ७ ओर ८
ह ५५ | “अमुना “अनेनैव इन शब्दोसे
| एक्के ही द्वारा दोनी भाति श्रम्भव नहीं होगी ।
यदि कहो कि वह उन दोनो
दो रूपसे प्राप्त होता है, जेष फि
““वह एकरूप होता ह, वह तीन
रूप होता है" इत्यादि रूपे श्रुति
कदेगी भौ- तो यह भी ठीक नहीं;
क्योकि निरवयव होनेके कारण एक
ही चेतनक्षा दो रूप होना सम्भव
द्विधाभावेनोपपद्चत इति चेत्, वक्ष्यति हि “व एकधा भवति त्रिधा भवति" इत्यादि, ` .न, सेतनस्पैकस्य॒ निरबयव- त्वाद् द्विपामावानुपपत्तेः। तस्मा
दष्यात्माधिदेवतयोरेक त्वमेव । १ 4. यतु स्पायतिदेशषो भेदकारण- भौर तुमने नो रूणदिके अतिदेशो मबोचो न तद्भेदाबगमाय । कारण बतल्मया,सो वह किति? स्थानभेदाद २ उनका भद सूचित करनेके लि नहींै।
भाद् भेदाङ्का | तो बह किरि हैध्वह तो,ञश्रम-
| ` |श्भेद् दोनेसे कदी उनके मेदी मा वमथम् ॥ ५ ॥ जाशङ्वा न हो जाय-ईसल्थिदै॥५॥
थ १. अन्यके घर्मोको अन्ये ख्णाना ।
खण्ड ७ ] शाङ्करमाष्याथे १०३ ४-3-89 8 < ऋ --8- ऋ
स एष ये चेतस्मादर्वा्चो लोकास्तेषां चेष्ट मनुष्यकामानां चेति । तव्य इमे वीणायां गायन्त्यतं
ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥ & ॥
वह यह ८ चा्चुष पुरुष ) नो इस ( अध्यास आत्मा ) से नीचेके लोक है उनका तथा मानवीय कामना्ओंक। शासन करता है । जत जो ये लोक वीणामे गान करते र वे उसीका गान करते है इसीसे वे घनवान् होते हैँ ॥ ६ ॥
स एष चान्ञुषः पुरुषो ये| वह यह चा्ुष पुरुष जो इस चेतस्मादाध्यात्मिकादात्मनोऽ- | आध्यासिक जत्मासे नीचेके लोक बाश्चोऽ्वाग्गता लोकास्तेषां चेष्टे | है, उनका तथा मनुष्यसम्बन्धी मनुप्यसंबन्धिनां च॒ कामा- | कामनारओका ईडन ८ शासन ) नाम् । तत्तस्मा्य इमे बीणायां | करता है । भतः नो ये गायक्र गायन्ति गायकास्त॒ एतमेव | रोग॒वीणामे गान करते है वे
गायन्ति । यस्मादीश्वरं | उसीका गान करते ह । इस प्रकार गायन्ति तस्मात्ते धनसनयो | क्योकि वे ईशवरका ही गान करते धनलाभयुक्ता धनवन्त | दै, इसख्यि वे धनलभयुक्त इत्यथः ॥ & ॥ अर्थात् धनवान् होते टै ॥ ६ ॥
इनकी अमेददटसे उपासनाका फल अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभो स गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराचा
खोकास्ताशश्वाप्नोति देवकामार् ॥ ७ ॥ तथा जो इस प्रकार [ चाक्षुष ओर आदित्य दोनो परर्पोकी एकता] जानेवाला पुरुष सामगान करता है इह॒ [ च्चुष ओरं आदित्य |
। तथा
दोनोँका ही
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ वह इसके ही द्वारा जो इ ८ आदि.
तयरोक ) से उपरके ङोक टै ओर जो देवताओके भोग दै, उन भ्रा
करता हे ॥ ७ ॥
अथ य एतदेवं विद्रान्य- थोक्तं देवभुद्रीथं वबिद्रान्साम गायत्युभो स॒ गायति चाह्ुष- माद्यं च । तस्यैवंविदः फलघच्यते- सोऽघुनैवादित्येन स॒ एष ये चाधुष्मात्पराश्चो लोकास्तांश्वामरोति आदित्या- न्तगेतदेवो भूतेत्य्थो देवका- मांश्च ॥ ७ ॥
हस उपर्युक्त देवको बो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान करता है बह चा्चुष ओर भादि दोनों ही पुर््षोको गाता है । इस प्रकार जाननेवाले उस उपाघकको जो फर मिरुता है वह बतखया जाता है-- वह यह उपासक इस आदित्यके द्वारा ही जो इते उपरके रोक है उन्हे पराप्त होता है । तासय॑ यह है कि आदित्यान्तर्गत देवप होकर वह इन्द ओर देवतामकि भोरगोको पराप्त करता है ॥ ७ ॥
ˆ =भ्व्छुतकठ अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाओ्चो खोकास्तासश्वाप्नोति
कंते
विद्वान्साम गायति साम तथा इसीके द्वारा जो
मलुष्यकामा<श्च तस्मादु हेवंविदुद्वाता नुयात् ॥ ८ ॥
दयेव कामागानस्येष्टे थ एवं गायति ॥ ९ ॥
रसे नीचेके रोक है उन्द ओर भनुष्य- 0 कामनाओंको माप्त करता है । अतः इस भकार जाननेवाला- उदगाता [यजमानसे इस प्रकार
कामनार्ओका आगान कर”
समथ दता है, जो क़ि इस प्रकार है, सामगान करता है ॥ ९ ॥
1 कदे ॥ ८॥ % तेरे स्थि किन शष्ट क्योकि यह उद्गाता कामनाजोके आगानमें र जाननेवाखा होकर सामगान करता
( ~
त्वण्ड ७ †
रै हाङ्करभाष्याथं १०७५
अथानेनैव वचाल्तषेणेव ये चैतस्मादर्वाश्चो रोकास्तां धा- नोति मदष्यकामांशच चाज्चुषो भूतवेत्य्थः । तस्मादु हैवंवि- दुद्धातां ब्रयाद्यजमानं कम्ष्टं ते तव काममागायानीति । एष हि यस्मादुद्धाता कामागान- स्यो द्रानेन कामं संपादयितु- मीषटे समर्थं इत्यथः । कोऽसौ ! य॒ एवं विद्वान्साम गायति साम गायति । दविरुक्तिरुपासन- समाप्त्या ॥ ८-९ ॥
तथा इस चाक्षुष पुरूषके द्वारा ही, नो इससे नीचेके रोक है उन मनुष्यसम्बन्धी भोगको वह प्रप्त करता है । अभिप्राय यह कि चाक्षुष पस्ष होकर ही उन सनको प्राप्त करता है । अतः इसत भकार जानने- वाल उद्गाता यनमानसे कहे ढि , मै तेरे स्यि किन इष्ट कामना्ो- का आगान कष ¢ क्योकि यह उद्गाता ₹ष्टकामनासम्बन्धी भागान- के उद्गानसे उन कामना्भको सम्पन्न करनेमे समथं होता दै । वह उद्गाता कोन हे ! जो इस प्रकार जानने- वाला होकर साम गान करता है, पाम गान करता है । यह द्विरुक्ति उपा- सनाकी समाघिके स्यि ह ॥८-९॥
इतिच्छान्दोम्योपनिंषदि प्रथमाध्याये सप्तमखण्डमाध्यं सम्पणेम् ॥ ७ ॥
इष्ण खण्ड
उदूगीथोपास्ननाक्नी उक्कष्टता प्रदर्शित करनेके ल्यि शिलक, दात्भ्य ओर प्रवाहणका संवाद
अनेकेधोपास्यत्वादक्षरस्य प्र- | उद्गीथं ्ञक अक्षर (ओंकार) के भनेक प्रकारसे उपासनीय होनेके कारान्तरेण परोवरीयस्त्वगुण- | कारण श्रुति मकारान्तरसे उसकी उ्- रोत्तर उल्कृष्ट गुणविशिष्टं फख्वार फलमुपासनान्तरमानिनाय । | एक अन्य उपाक्तना प्रस्तुत करती दै । यहाँ जो इतिहास दिया जाता है वह
इतिशसस्तु सुखावबोधनार्थः । | सररुतासे समक्षनेके ल्यि ्ै ।
अयो होदरीथे कुशखा बभूवुः शिरुकः शााव- ्यश्रैकितायनो दार्भ्य.परवादणो जेवछिरिति ते होचु- सदये वै छृशखाः स्मो हन्तोद्रीये कथां वदाम इति ॥१॥.
कते है, शाखवानका एन शिरुक, चिकितायनका पुत्र दारभ्य ओर जीवला पत भरवाहण-ये तीनों उदूगीयविधामे कुश ये। उन्होने स्प कदा -- 'इमोग उद्गीयवियामे निपुण हे, अतः यदि आपरोगोंकी अनुमति हो तो उदूगीथके विषयमे परस्पर वार्ताखप करं" ॥ १॥
त्यचजिसंरूपाकाः; ह इत्यै- | त्रयः- तन सल ८५६ तिद्या्थः, ` उद्वीथ उद्रीथज्ञानं निपात इतिहासको सूचित करनेके
| स्यि ह, उदुगीथ्मे थविद्या (1 भ्रति इशला निपुणा बभूवुः । | ङश निपुण 2 बद
खण्ड ८]
शाङरमाष्यां १०७
-3-9 ~ 9-4-96 8-9८-56 ~~ 9-95-39 5 8855 =
करिमधिदेशे काठे च निमित्ते वा समेतानाभित्यभिप्रायः । न हि सर्वस्मिञ्ञगति त्रयाणामेव कोशरयुद्रीथादिविक्ाने । श्रुय- न्ते द्युपस्तिजानश्रुतिकेकेयप्रभृत- यः सवंलकल्पाः ।
के ते त्रयः? इत्याद- शचिङको नामतः शाखावतोऽपत्यं ज्ञाङावत्यः चिकितायनस्या- पत्यं चैकितायनः, दल्भगोत्रो दाल्भ्यो दथागरुष्यायणो बा। प्रवाहणो नामतो जीवलस्या- पत्यं जेविरित्येते त्रयः ।
ते होचुरन्योन्यश्द्रीये वै कुशला निपुणा इति प्रसिद्धाः स्मः । अतो हन्त यद्नुमतिभ- वतायुद्रीथ उद्वीथन्ञाननिमित्तां
है कि किी दे ओर कार्म अथवा किसी निमित्तविदोपसे एकत्रित हुए पुरुषेमिं[ये तीन व्यक्ति उदु गथ निपुण ये ]। सरे सं्ारके भीतर उद्गीभ आदिके ज्ञानम इन तीनकी हो कुशल्ता हो-देसी वात नहीं है; क्योकि श्रुतिमं उपस्ति, जानश्रुति ओर कैकेय आदि सर्वज्ञकल्प पुरुष भी प्रसिद्ध है ्ी । वे तीन कौन थे १ इस विषयमे श्रुति
| कती है- शिलक जिप्षका नाम था
वह॒ शालवान्क्ा पत्र शालावल्य, चिकितायनक्ा पुत्र चैक्रितायन, नो दल्मगोत्रमे उन्न होनेके कारण दारभ्य कहा गया है। अथवा वह द्यामु- „ ष्यायण शोगा । तथा नामसे प्रवाहण ओर नीवलका पुत्र होनेसे जैव कदरनेवास ये तीन पुष ये। उन्होने परस्पर एक-दूसरेसे का~ ` हमखोग उद्गीथमे कुशूनिपुण है- इस प्रकार प्रसिद्ध है । अतः यदि आपलोरगोकौ सम्मति हो तो उद्गीथ-
कथां विचारणां पक्षपरतिक्षोप- | मे -उद्गीथवियाक सम्बन्धमे कथा- न्यासेन वदामो वादं ङ्म | विचार कै, अर्थात् पक्ष-प्रतिपक्षके
€ इत्यथः ।
स्थापनपूव॑क परस्पर विवाद करं ।. `
ॐ जिस पुत्रको "यह मक्षे ओर दक्षे दोनोंहीको जठ ओर पिण्डदान देने-
का अधिकारी होगा एेसा कष्टक षर्मपूवंक प्रण क्रिया जाता ह॑ उसे ्रया-
मुष्यायण' कते हं ।
१०८ छन्दोग्योपनिषद् [ अण्याय १ ~ 9 ऋ ~ 9 9 ¬ 8 ¬ ८ 9 ¬ 9- >
तथा च तद्विद्यसंबादे विपरी- | इस प्रकार, निन्द विवक्षित अर्थकर
नो ज्ञान है उन पुर्षोकि पारष्परिि ` तग्रहनाशोऽपूवविक्ानोपजनः | संवादसे विपरीत ग्रहणका नादय,
अपूव ज्ञानकी उपति ओर संशयङ़ी निवृ होती है । अतः उन-उन ` द्यसंयोगः कतव्य इति चेति- | विषयोके ज्ञाता पुरुषोका साथ करना चादिये- यह भी इस इतिहासका प्रयोजन है । यदी बात शिर्कादिक शिलकादीनाम् ॥ १ ॥ प्रस्ग्मे-भी देखी नाती दै ॥ १॥
-भ- 99
संञ्जयनिबृ्तिश्रेति । अतस्तदि-
_हासप्रयोजनम् । दश्यते हि
तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जेवलि- ` सशुवाच भगवन्तावग्रे वद तां बराह्मणयोवंदतोर्वाचशभो- . ध्यामीति ॥ २॥ ॑
त वे "बहुत अच्छाः पेसा कहकर बैठ गये । फिर जीवे पुत्र भ्वाहणने कहा--“पहले आप दोनों पूज्यवर प्रतिपादन करं । मँ आप „ ब्राहमणो कहौ हदे वाणीको श्रवण करगाः ॥ २ ॥
तथेत्युक्त्वा ते स्ुपविविशरु- | - फिर वे बहुत अच्छा" पेसा कद- -कर बैठ गये । उनम [ ब्रा्मणोके प्रथम बोलनेसे | राजा (क्षत्रिय , . ^ प्रागल्भ्योपपत्तः की प्रगरमता ( धृष्टता ) सिदध होती | व | अत सीव पतर जेविरुवाचेतरो भगवन्तौ प् जा- | पवाहणने शेष दोनोकि भति कहा-- “पहले आप भगवान्-पूजनीय रोग करट; आप तरक्षणोके कटे हुए यन्दो-
इदेपिविष्टवन्तः किर । तत्र राज्ञः
बन्तावग्ने पूवं बद्ताम् । ब्राह्मण-
खण्ड ८ 1 शाड्रमाष्याथं १०९
दोरिति. लिद्काद्राजासौ युबयो- | को मँ श्रवण करूगा । आप दोनो
ब्राक्ष्णोके' इस कथनरूप िङ्गसे ज्ञात बरह्मणयोवदतोर्वाचं श्रोष्यामि । | होता है कि वह क्षत्रिय है वाचम् ठेसा विश्चेषण होनेके कारण दूरे व्याख्याकार “अथंहीन शब्दमात्र विशेषणात् ॥ २ ॥ घुनंगा' दसा अथं करते है ॥२॥
अर्थरहितामित्यपरे वाचमिति
स्र ह शिखकः शालावत्यश्वेकितायनं दाभ्यमु- वाच हन्त तवा पृच्छामीति च्छेति होवाच ॥ ३ ॥
तव॒ उस्र शाकावानके पुत्र शिल्कने निकितायनकमार दाटभ्यसे कादि वुण्डारी अनुमति हो तो मै तुमसे पृष ® उसने कहा-- 'पूछो' ॥ ३ ॥
उक्तयोः स ह शिलकः शा- | उपर्युक्त दोनमिंसे शालवानके पुत्र लावत्यश्रैकितायनं दाल्भ्ययु- | शिले चैकितायन दार्भ्यसे कडा- बाच - दन्त यद्यनुमंस्यसे त्वा | यदि तुम अनुमति दो तो मेँ तुमसे त्वां पृच्छानीत्युक्त इतरः पृच्छेति | पृ । तत्र इस भकार शे नानेपर
होवाच ॥ ३ ॥ दूसरेने 'पूछछो' एसा कहा ॥ ३ ॥ लन्धानुमतिराद- | उसकी अनुमति पाकर [ शिरक्- | ने ] ्डा-
का साम्नो गतिरिति स्वर इति हौवाच 1 स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच । प्राणस्य का गतिरित्य-
त्रमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥॥ _
११० छान्दोग्योपनिषद् [ मध्याय !
'सामकी गति ( आश्रय ) क्या दै इसपर दूसरेने श्वर" ेसा कहा । स्वरकी गति क्या है ¢ सा प्रभ होनेपर दूसरेने श्राण' एेसा कहा । श्राणकी गति क्या है » इसपर दूसरेने अन्न पेसा कहा । तथा “अन्नकी गति क्या है ? पेसा पूछे जानेपर दारभ्यने जू ठेसा कहा ॥४॥
का साम्नः बप्रकृतत्वादुद्री-
थस्य । उद्रीथो द्यत्रोपास्यत्वेन ।
प्रतः । ““परोवरीयां सयुट्री-
थम्” ( १।९।२ ) इति च वक्ष्यति । गतिराश्रयः परायण- मित्येतत्। एवं पृष्टो दा्म्य उवाच-स्वर इति; स्वरात्मक- त्वात्साम्नः। यो यदात्मकः तदरतिस्तदाश्रयश्च भवतीति युक्तं मृदाश्रय इव घटादिः । स्व्रस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच । प्राणनिष्पाद्यो हि स्वरस्तस्मात्स्वरस्य प्राणो गतिः । प्राणस्य का गतिरित्य.
नमिति होवाच । अनावषटम्भो हि प्राणः । “शुष्यति वै प्राण
सामकी--प्रकरणप्राप्त होनेके कारण उदूगीथकी गति--भाश्रय अर्थात् परायण क्या है? क्योकि यहाँ उपास्यरूपसे उदुगीथका ह प्रकरण है, जैसा कि परोवरीयांसमु- दुगीथमुपाप्ते ८ १।९।२ ) इत्यादि श्रतिमे करेगै भी । इस प्रकार पृषे जानेपर दारभ्यने कहा-- स्वर् क्योकि साम स्वरस्वरूप है । जिस प्रकर [ृत्तिकामय] घटादि पदार्थो का मृक्तिका ही आश्रय होती दै उसी प्रकार जो पदाथं यदातक-- जिसके स्वरूपसे युक्त होता है उस पदाथकी वही गति ,जौर आश्रय होता है-यह उचित ही है । -स्वरकी गति क्या है ® रपसा म्र होनेपर [ दारभ्यने ] श्राण' णमा कहा, ब्योकि स्वर प्राणसे ही
निष्पन्न होनेवाला दै, इसखियि स्वर-
की गति प्राण है। श्राणकी गति क्या है ® दसा पू जेप उसने कहा अन्न, क्योकि प्राण अन्नके
री आश्रय रहनेवास दे, सा कि
खण्ड ८ ] शाह्करमाष्याथ १११ ~> ~~~ -3 ~ > ~> ~~ >< 9 9 >
ऋतेऽन्नात्" ८ व° उ० ५ । | “नके विना भाण सू जाता दै” ,;._ . | इस श्रुतिते सिद्ध होत दै तथा “अनन १२।१ ) इति दि श्रुतेः । “अनं | यह [वत्स्थानीय पराणकी] र्ती ह"
दाम!" (ब्रृ° उ०२।२।१) | देसी श्रुति भी है । फिर अननकी
ति च । अन्नस्य का गति- | गति क्या है ? पूसा प्ररन होनेपर ल्भ्यने कदा-- “आप्! क्योकि रित्याप इति होवाच । अप्सं- | शन्न घाप ८ नल ) से ही रसन्न
भवत्वादन्स्य ॥ ४ ॥ होनेवाख दै ॥ ४ ॥
अपां का गतिरित्यसौ रोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं खोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं खोक्सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गस<-
स्तावं९हि सामेति ॥ ५ ॥
(जककी गति क्या है ? रसा प्रशन होनेपर उसने वह लोक! फसा . कहा । “उस रोककी गति क्या है ® इसपर दारभ्यने का कि स्वगं - लोकका अतिक्रमण करके सामको कोर किसी दंसरे आश्रयमे नहीं ले जा सकता । हम सामको स्वर्गलोके हो स्थित करते दै, क्योकि सामकी स्वगे-
रूपसे स्तुति की गयी ह ॥ ५ ॥
अपां का गतिरित्यसौ लोक इति दोवाच । अपुष्मान्लोकाव् वृष्टिः संभवति । असुष्य लोकस्य का गतिः १ इति पृष्टो दान्भ्य उवाच । स्वर्गमयुं रोकमती- त्याश्रयान्तरं साम न नयेत्क- शिदिति होवाच ।
'जर्छोकी गति क्या है इसपर दा्भ्यने "वह लोक प्सा कहा, क्योकि उस रोकसे ही वृष्टि होनी सम्भव ै । “उस रोककी कया गति है ¢ रेका पृष्ठे जानेपर॒दाभ्यने कटहा-- उस स्वर्गलोकक्ा अति- क्रमण करके कोई सामो किसी दूसरे
-आश्चयमे नही ठे जा सक्ता
११९ | । | छान्दोग्योपनिषद् { -अष्टाच १ . = क 3 अतो बयमपि स्वगं लोकं | भतः हम भी सामो स्वगे < स्वर्शलो सामाभिसंस्थाषयामः। क दी स्थापित करते ह । अर्थात् साम । प नीम ४ 5, , | स्वगलोक्मे भतिष्ठित॒ समकषते है, | प्रतिष्ठं साम जानीम हत्यर्थः |
1 क्योकि साम स्वगसंस्ताव भर्थात् स्वगसस्ताय स्वगत्वेन संस्तवनं | जिसका स्वर्गते स्तवन किया संस्तायो यस्य॒ तत्साम सवर्ग- | गया है, एस स्वरगसंप्ताव ह"निशवव संस्तावं हि यस्मात् “स्वगो वै | स्वर्गलोक ही साम है रेसा जानता लोकःसाम वेद” इति श्रुतिः |॥५।॥ दै यह् रति भी है ॥ ५॥
=: ० :=
तह शिलकः शाखावत्यदचैकितायनं दार्भ्यमु-
वाचाप्रतिष्ठितं वे किलते दाल्भ्य साम यस्त्वेतहि
बूयान्सूधां ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति॥६॥ जघ चिकितानपत् दारभ्यसे शाख्वानक पुत्र शिल्कने कदा--ह दारभ्य † तेरा साम निश्चय ही अमतिषठित षै । जो इस मय कोद
सामवे्त यह कह दे ढि "तेरा मस्तक एथिवीपर गिर जाय तो निश्चय ही तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ६.॥ ५
तमितरः शिख्कः शारावत्य- | उस चैकितायन दर्भ्यसे दूरे श्चकितायनं दार्म्यमवाच- - | श्राखवत्य॒धिक्कने कडा-
दारभ्य | निरेचय ही तेरा साम अप्रतिष्ठितमसंस्थितं परावरीय- | अपरतिष्ठित-गसंस्थित अर्थात् ऊ-
रोर उक्ृषटरूपसे असमास गतिवाडा स्त्वेनासमाप्तगति सामेत्यर्थः। वा| दै ।' “वै जर किरु" इन निपातो
इत्यागमं स्मारयति छिलेति च। | से शति भागम यानी उपदेश-
दाल्भ्य ते यस्त्व- | ” ररा स्मरण कराती है । यदि „11. सदिष्णुः साभविदे त्तस्मिन्काले । भभतिषठित सामो ध्य `भतिटित
ह्लण्ड ८ |
शाङ्रभाष्याथ १९१३
्रुयात्कशिद्विषरीतविज्ञानमग्रति- षितं साम प्रतिष्ठितमिति एवं वादापराधिनं मूधा रिरस्ते विपतिष्यति विस्पष्टं पतिष्य- तीति । एवगुक्तस्यापराधिनस्त- थैव तद्विपतेन्न संशयो न त्वहं ब्रवीमीत्यभिप्रायः |
ननु मूथ॑पाताहं चेदपरां कृतवानतः परेणानुक्तस्यापि पतेन्मूर्धा न चेदपराध्युक्तस्यापि
नैव पतति । अन्यथाढ़ृताभ्या- गमः कृतनारशच स्याताम् ।. नैष दोषः; कृतस्य कमणः शुभाशुभस्य फलम्रातिदंशकाल- निमिततापक्षत्वात् । तत्रव
सति मूरध॑पातनिमित्तस्याप्यत्ता-
नस्य पराभिव्याहारनिमित्तापि- षत्वमिति ॥ ६ ॥
हः इस प्रकार कहनेका अपराध कृरनेवाठे तुज विपरीत विज्ञानवानूसे कहे कि तिरा मस्तक गिर जायगा- स्पष्टतया पतित हो जायगा" तो इस प्रकार कहे जानेपर तज्ञ अपराधीका मस्तक उसी प्रकार गिर पडेगा-इसमं संशय नहीं । ताप्यं यह है किमतो
एसा कहता नही ह यदि कोई जन्य ।
कह देगा तो अवद्य देसा ही होगा] ॥ ` शंका-यदि मस्तक गिरनेयोग्य पाप
किया हे तव तो दूसरेके न कदने- पर भी मस्तक गिर ही जायगा ओर .
यदि वह रेसा अपराधी नहीं है तो कहनेपर भी नहीं गिर सकता; नहीं
तो बिना क्यिकी प्राप्ति ओर क्षिय ` | इएका नाश ये दो दोष भाप हगि। .
समाधान-यह दोष नहीं दै, क्योकि
क्यि हुए श्म ओर अश्युम कमेकि -
फरुकी प्रापि देश, कारु ओर निमित्त- की ययेक्षावारी होती है । एसी स्थितिमं मूर्धपातका निमित्तमूत जो अज्ञान है, वह भी दूसरेके कथनरूप निमित्तकी अपेक्षावाखा ही है ॥ ६॥
-~-----नर्य<
१९७ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
> आ एवभुक्तो दाल्भ्य आह- | एसा कहे जानेपर दारभ्यने कहा--
हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवा- चामुष्य रोकस्य का गतिरित्ययं रोक इति होवा- चास्य रोकस्य का गतिरिति न षतिष्ठां खोकमति- नयेदिति होवाच भतिष्ठां वयं लोकश्सामाभिसरस्था- पयामः प्रतिष्ठास्स्तावःहि सामेति ॥ ७ ॥
भै यह नात श्रीमान जानना चाहता. हवै; इसपर [ चिलकने ]
कहा-- जान को ' तव “उस लोककी गति क्या है ¢ एसा पृषे नानेपर
` उसने “यह कोकः पेसा कहा । फिर “इस ोककी गति क्या है ? रेसा
मभ होनेपर “इस प्रतिष्ठामूत छोकका अतिक्रमण करके सामको जन्यत्र
नदी ठे जाना चाहिये, एेसा का । हम प्रतिषटामूत इस रोकमे सामको
स्थित करते है [ अर्थात् यहीं उसकी चरम स्थितिका निश्चय करते है ] कोक सामका परतिषठारूपसे ही स्तवन किया गया है ॥ ७ ॥
हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानि | “जिसमे साम प्रतिष्ठित ( यह यत्पतिषठं सामतयुक्तः ्रत्युवाच । बात भे ॒श्रीमानसे जानना चाहता शालावत्यो विद्धीति होवाच । ह" एेसा कटे जानेपर शारावत्यने गतिरिति उत्तर दिया-- “जान छो । “उस
अबुष्य लोकस्य का गतिरिति रोककी गति क्या है ® इस प्रकार पटे दाल्भ्येन शाला | दारभ्यसे पूछे जानेपर शाखवत्यने बत्योभ्यं रोक इति होवाच । | “यद लोकः एसा कहा; क्योकि यह् अयं दि लोको यागदानहोमा- | लोक दी याग, वान जर होमादिके विन सरः ष्यतीति । हारा उस रोकका पोषण करता
दै । इस विषयमे तः दानके अतः प्रदानं देवा उपजीवन्ति” | जत्र देवगण वित रहते ह"
सखण्ड ८ ]
शाङ्करभाष्य
११५
इति हि श्रुतयः । प्रत्यक्षं हि सर्वभूतानां धरणी प्रतिष्ठेति । अतः साम्नोऽप्ययं लोकः प्रति- छ्रैवेति
वेति युक्तम् ।
अस्य लोकस्य का गतिः ! इत्युक्त आह . शालावत्यः । न प्तिष्ठामिमं लोकमतीत्य नये- त्साम कथित् । अतो वयं प्रतिष्ठां सोकं सामाभिसंस्थाप- यामः । यस्मासप्रतिष्ठासंस्तावं हि प्रतिष्ठात्ेन संस्तुतं सामे त्यर्थः । (इयं वै रथन्तरम्'' इति च श्रुतिः ॥ ७ ॥
एेसी श्रुतियों भी दै । सम्पूणं प्राणियोंकी प्रतिष्ठा परथिवी है- यह प्रयक्ष ही है । अतः सामकी भी यही रोकप्रतिषठा है- एसा मानना उचित ही हे ।
रस लोककी गति क्या हे इस प्रकार पठे जानेपर शालवत्यने का- “किंसीको भी प्रतिष्ठामृत इस कोकका अतिक्रमण करके सामको अन्यत्र नहीं छे जाना चाहिये, भतः हम ्रतिष्ठामूत इस ोकमे ही सामको ` सब प्रकारसे स्थापित करते दै, क्योकि साम॒ प्रतिष्ठासंस्ताव-- प्रतिष्ठारूपसे स्तत दै । “यह [ प्रथिवी ] ही रथन्तर साम है" एसी रति भी है ॥ ७ ॥
९ह प्रवाहणो जेवछ्िरुवाचान्तवद्रे किङ ते शालावत्य साम यस्तवेतदहिं बथान्मू्धां ते विपतिष्य- तीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानोति विद्धीति होवाच ॥ < ॥ । तब उससे जीवलके पुत्र प्वाहणने कहा--दे शालावत्य | निश्वय ही तुम्हारा साम अन्तवान् है । यदि कोई फेसा कह दिया क तुम्हारा मस्तक गिर जाय तो वुम्दारा मस्तक गिर जाता । [शालावल्यने कदा] इते श्रीमानूसे जानना चाहता दँ ॥ इसपर भवाहणने 'जान लोः
एसा कहा ॥ ८ ॥
क | १९६ ऊॐान्दोभ्योपनिषद् [ जष्याय!
तमेवयुक्तवन्तं ह प्रवाहणो | इस प्रकार कहनेवटे उस शा व्यक प्रति जीवर्के पुत्र प्रवाहणे । हे शाखवद्य ! तुम्हारा साम निश ही अन्तवान् हैः इत्यादि पू् ततः शाटावत्य आह--हन्ताह- ¡ 6 । तव राखवलयने कहा-¶ मेतद्गवतो वेदानीति विद्धीति | इसे श्रीमानसे जानना चाहता ह॥
| - | तव दूसरे ( प्रवाहण ) ने कहा- होवाच ॥ ८ ॥ (जान रोः ॥ ८ ॥
जेवलिस्वाचान्तवदरै किल ते
(~ ¢ शालावत्य सामेत्यादि पूववत् ।
-- “=+ ~
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये १ ४ अष्टमखलण्डभाष्यं सम्पृणम् ॥ ८॥
|
|
ककमः
खण्ड `
भिटककी उक्ति-आकाश्च ही सवका जाश्रय ह
इतरोऽलुज्ञात आद-- |
प्रवाहणकी अनुमति पाकर शिक्कने कदा --
अस्य ऊोकस्य का गतिरिस्याकाश इति होवाच
सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव सजुलखयन्त
आका परस्यस्तं यन्त्याकाशो हवेभ्यो उ्यायानाकाराः
परायणम् ॥ १ ॥
“स छोकक्ी क्या गति हे *
क्योकि ये समस्त भूत॒ आकाशसे
इसपर प्रबादणने कहा-- आकाशः
ही उन्न होते है, आकाशे ही
ल्यको परा हते दै ओर आकाश हौ इनसे बड़ा है; अतः आकस री
इनका आश्रय है ॥ १ ॥
अस लोकस्य कां गतिरिति | आकारोऽइति होवाच प्रवाहणः ।
आकाशं इति च प्र आत्मा
(आकाज्ञो वै नाम" ( छ
उ० ८।१४। १) इति भुतः ।
तस्य॒ हि कमम॑सवेभूतोत्याद्- कत्वम् । तस्मिनेव हि भूत- प्रख्यः । '“तत्तजोऽसजत'*(६।२। ३), “तेजः परस्यां देवतायाम्"
(६।८।६) इति हि वक्ष्यति ।
(इस ोककी गति क्या हे । इस- पर प्राहणने कहा “आकाश । यहाँ 'आकारा' शब्दत परमात्मा विवक्षित हे । [ भूताकाश नहीं ] जैसा किं “आकरा ही नाम [ जर रूपका निर्वाह करनेवाला दै ]" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । सम्पूणे भू्तोको उसन्न करना यह उसीका कायं हे र उसी मूर्तका प्रस्य होता हे; जसा कि श्रुति “उसने तेजको रचा” “तेल पर देवतामे रीन होता है” | इयादि मकारसे अगे करेगी ।
११८ छान्दोग्योपनिषद् [ अष्याय {
त-क 880 5 -86 8 - सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि | “आतमन आकाशः सम्भूत
| (तेजो ऽसृजत इत्यादि शरुतियोकि कक्ष
ये सम्पूणं ॑चराचर भूत॒ तेज, बह ¦
त्पदयन्ते तेजोऽवनादिक्रमेण साम- | ओर अन्न इस क्रमसे आकरे ध्यात् । आकाशं प्रत्यस्तं यास्ति ५ उसन् होते टै; ओर प्र्यक्ार प्रलयकाले तेनैव विपरीतक्रमेण । त (५ गान
न „~ | रीन दो जाते दै, क्योकि जक्ष हि यस्मादाका्च एवैम्यः सर्वेभ्यो |
ही इन समस्त मृतोसि बद्र है। भूतेभ्यो ज्यायान्महत्तरोऽतः स॒ | अतः वही समस्त मूता परायण-
सर्वेषां भूतानां परमयनं प्रायणं | प्रम शाश्रयः अर्थात् तीनों करप प्रतिष्ठा त्रिष्वपि कालेष्वित्य्थः।१।। उनकी पतिष्ठा है ॥ १ ॥
आक्ारासंज्नक उद्रीथकी ध ओर उसकी उपासनाका फल स एष परोवरीयानुद्रीथः स एषोऽनन्तः परोव- रीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह॒ खोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीया$समुद्ीथसुपास्ते ॥ २ ॥ वह यह उद्गीथ परम उक्छृष्ट दहै, यह अनन्त है । जो इसे इष भकार जाननेवाखा विद्वान् इस ॒परमोल्कष्ट ८ परमात्ममृत ) उदृगीथकी , उपासना करता है उसका जीवन परमो्छृष्ट हौ जाता टै ओर वह उत्त- रोरर उजृट शोकको जपने अधीन कर छता है ॥ २ ॥ यस्मात्परं प्रं वरीयो व्रीय- | वरथो उततरोर उक्कृष्ट- गर्त सोऽप्येष वरः परथ बरीयांशच | भी 9 अर्थात् पर् ओर ० तः १ यह् उदुगीथ ही परमात्मभा परावगयानुद्राथः परमात्मा सम्पन्न होता ट व
संपन्न ५ इत्यथः । अत एव स | उदूगीथ अनन्त-जिसद्ना फो अन्त एषोज्नन्तोऽविद्यमानान्तः । नहीं है, सा ह ।
स्थावरजङ्गमान्याकाशादेव सयु-
ण्ड र ]
हशाङरभाष्यारथ.
११९
48648508 तः त 8595 +¬ 35 8
तयेतं परोवरीयांसं प्रमात्म- भूतमनन्तमेवं विदवान्परोवरीयां- सद्रीयशुपास्ते; तस्येतत्फल- माह- परोवरीयः परं पर वरीयो विशिष्टतरं जीवनं हास्य विदुषो भवति दृष्टं फलमवष्ं च प्रोवरीयस उत्तरोत्तरविशिष्ट- तरानेव ब्रह्माकाान्तघ्नोकाज- यति य एतदेवं विद्रायुद्वीथ-
्ुपास्ते ॥. २ ॥
उस इस परम उच्छृष्ट परमात्ममूत अनन्त उदूगीथको इस प्रकार जान नेवाला जो विद्वान् इस परमोक्ृष्ट उदुगीथकी उपासना करता है, उत्तके सि श्रुति यह फक बतसाती हे जो इसे इस प्रकार नानने- वाला विद्वान् उद्गीथक्ी उपासना करता षै उस विदानो यह षट फल होता है कि उस विद्वानका जीवन उत्तरोत्तर उक्कृष्टतर हो जाता ह तथा अदृष्ट फ यह होता है कि वह॒ उत्तरोत्तर त्रह्माकाशपर्यन्त
विशिष्ट रोकोंको जीत ठेता है ॥२॥
तश्दैतमतिधन्वा शोनक उदरशाण्डिस्यायोक्तवो- वाच यावच एनं परजायामुद्रीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हेभ्यस्तावदरस्मिह्ोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥ नके पुत्र भतिधन्वाने उस ईइस उदृगीथका उद्रशाण्डिल्यके प्रति
निरूपण कर उससे शदा--जबतक मेरी संततिमेसे [ मेरे वंशज ] इस उद् गीथक्ञो जानेगे तवतक हस लोकम उनङृ¡ जीवन उत्तरोत्तर उक्कृषटतर होता जायगा ॥ २ ॥
दिं च तमेतभरद्रीथं विद्रानति- | तथा इस उद्गीथको जाननेवाले , । अतिषन्वा नामकं शौनकने-- शनक
क्लौनक उद्राण्डिल्याय शि- । लयके प्रति इस उद्गीधविधाका
१२०. ` छान्दोग्योपनिषद् [ मध्याय | `
< ० प्यायतयुद्रीथदशेनयुक्त्वोवाच । | वर्णन करक कहा - जवत्फ तै# यावत्त तव प्रजायां प्रजासंतता- प्रन अर्थात् तेरी सततत वत्यथः। एनशुद्रीथं त्वतसंतति- भोनज इस उदुगीथको नती ` जा वेदिष्यन्ते ज्ञास्यन्ति तावन्तं |
त > ! तवतक-उतं कषमय! उन् , कालं परोवरीयो हेभ्यः प्रसि- | तलक उतने समयत उदे
दवेभ्यो छोकिकजीवनेम्य उत्तरो- | श्न ॒भसिद्ध॒रोकषिक जीवने त्रविशिष्टतरं जीवनं तेभ्यो | अपेक्षा उत्तरोत्तर विशिष्टतर जीका भविष्यति ॥ ३॥ प्राप्त होगा ॥ २३॥
भक 9 = (@ ०
तथामुर्मि्छोके लोक इति। स य एतदेवं
विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्नि्टो के जीवनं
भवति तथामुरिंटोके लोक इति लोके खोक इति.॥ ४॥ । |
तथा परलोके भी उसे [ उक्कृष्टसे उद्कष्ट ] लोककी प्रापि हरत
। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरूष इसकी उपासना करता है,
उका जीवन निश्चय ही इस लोके उ्ृष्टतर -होता है तथा परलोके
भी उसे [ उत्तरोत्तर उृषटतर ] लोक पा होता है- पररोकंम उसे [ उत्तरोत्तर उद्कष्टतर ] कोक पाप होता हे ॥ ४॥
तथादषटऽपि प्रलोके्ष्मि- | (तथा अ परलोके भी उत नपरोबरीयोन्नोको भविष्यतीतयु- | उरो उद्ृट लोककी ही शरा ्तवान्याण्डिन्यायाविभन्वा + शा ञनकपुत्र अतिषन्वा-
स शाण्डिस्यके प्रति कहा । थह नकः। स्यादेतत्फलं पूर्वेषां महा- एरु पू्वकाङ्कि प्रम भाग्यशाली
शण्ड ३ | शाङ्करमाष्याथं १२१ आग्यानां तैदयुगमीनानामित्या- | पपोको मत होता होगा, कमान र | युगके पुरपोको नहीं हो सकता
शङ्कानिदृत्तय आह--स यः | देसी आशा्धाफी निद्िके स्थि कृथिदेतदेवं बिद्ालुद्रीथमेतर्॑पा- | शति कहती दै- ईस समय भौ इते
। इस प्रकार जाननेवाला जो कोर पुरुष उदुगीथकी उपासना करता हे
ह सतत दि उसका भी इस रोकमे उसी प्रकार हास्यास्मि्नोके जीवनं भवति | उत्तरोत्तर उदक्त ही जीवन
तथायुस्मिंन्नोके लोक इति लोके होता है तथा परलोक भी उसे उत्तरोत्तर उल्छष्टतर रोकफी दही
लोक इति ॥ ४ ॥ पराप्त होती हे ॥ ४॥
-~-----
स्ते तस्याप्येवमेव परोवरीय एव
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याय नवमखण्डभाष्यं सम्पणम्॥ ९ ॥
दकम् खकर्डं
उषस्तिका आख्यान उद्रीथोपासनप्रसङ्खेन प्रस्ताव | उद्गीथोपासनाके प्रसङगते हं
प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उप सना भी बतलयी जानी चहिये, इषः व्यमितीदमारम्यते। आख्यायि- | स्यि आगेका भन्थ भार्म मि
जाता ह । यहं नो आख्यायिका £ का तु सुखावबोधार्था | वह सरल्तासे समञ्षनेके स्मि -
मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषसितिं चाक्रायण इभ्ययामे षद्राणक उवास ॥ १ ॥
ओले ओर पत्थर पड्नेसे कुरुदेशके सेतीके चपट हो जानेषर वह
इभ्य भरामके भीतर (आटिकः ( जिसके स्तनादि स्रीजनोचित चिह प्रकट
नहीं हुए है रेसी अस्पवयस्का ) पलीके साथ चक्रका पुत्र उषसि, दुगंतिकी अवस्थामें रहता था ॥ १ ॥
मटचीहतेषु मरच्योऽशन- | [कुरुजंके] मटचीहत शन
यस्ताभिहतेषु नारितेषु इुरुषु | मरची ओर ओर पत्यरको कटते दै,
ङरसस्यष्वित्यर्थः । तो दिते | नसे छर्वेशके अर्थात् इरदेशकी
खेतीके हत-नष्ट हो जाने तथा उसके
जात आटिक्यानुपजातपयोधरा- | कारण दुर्भिक्ष हो जानेपर आव्की
दिीव्यञ्जनया सह जाययोष्- | यानी जिसके स्तनादि स्जीजनोनित
प्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्त-
स्तिहं नामतशचक्रस्यापत्यं चाकरा- | चिह कट नही ष् है पेसी तीके
चाक्रायण-चक्रका यणः । इमो हस्ती तमहदंतीतीम्य पुत्र इभ्य मामे
इभ हशथीको
॥ 1 ॥
॥
कंच्ड १० शाङ्रमाष्या्थं १२ ">~ (9 -ऋ अ 9 ॐ ॐ = ॐ 9 ॐ 2 = ईरो इस्त्यारोदो वा, तस्य राम | कहते + उसकी पात्रता रखनेवास्र
व्यक्ति इभ्य-- धनी या हाथीवान-
इम्यग्रामस्तस्मन्पद्राणकोऽना- | कंदलाता दै, उसके भामको इम्य- ग्राम कहते रै, उसमे अन्न प्राप न होनेके कारण प्रत्राणक होद्वा इत्सितां गतिं गतोऽन्त्वावस्थां | षाठुका प्रयोग कुत्सित गतिके भथेमं क होता दै, अतः कुत्सित गति यानी
भरा इत्यथः । उवासोषितवान् दुरवस्थाको प्रात हो किसीके षरा कस्यचिद्गृहमाभरित्य ॥ १ ॥ । आश्रय लेकर निवास करता था॥१॥
लामात् । द्रा इत्सायां गतौ ।
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तश्दोवाच । `
नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्चये म इम उपनिहिता इति ॥२॥
उने धुने हुए उडद खानेवाले एक महावतसे याचना की | तब
उसने उससे कहा--इन जुटे उददोके सिवा मेरे पस ओर नह दै । जो
कुछ एकत्र ये वे सव-के-सव ये मेने [ अपने भोजनपातरभ ] रख खथ ईं [ अतः भँ किस प्रकार आपकी याचना पूणं करं १] ॥ २ ॥
सोऽन्नार्थमटननिम्यं इुल्माषा- | भन्नके ठियेभरूमते-षूमते उसने न्कुत्सितान्माषान्खादन्तं मक्षयन्त| अकस्मात् ९९ हाथीवानको घुने
यदृच्छयोपलम्य विभिष याचित- | हद लाते देल उसने याचना ़ी। `
„ , | उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा-- ६ । त्सति दोवापिभ्यः । मेरद्रारा खाये जाते हुए इन जूठे नेतोऽस्मान्मया भश्यमाणादुच्छि-| उददोकि समूहके सिवा मेरे षास राशेः इल्माषा अन्ये न विद्य- | ओर उड़द नहीं है । जो एकत्रित न्ते । यच्च ये रारो मे ममोपनि- | थ वे समी मेरे इस पतरम गिरा हिताः प्रकष्ा इमे भाजने किं | स्थि गये दै, अव भ श्या करोमि १॥ २॥ क १॥ २ ॥ ¦
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१२४ छान्दोग्योपनिषद् [ सष्याय। इत्युक्तः प्रत्युवाचोषस्तिः- | सा कदे जनिप्र उर
| उत्तर दिया- । एतेषां मे देहीति होवाच तान्मे प्रददौ हन्ता- सुपानमिप्युच्छिषठं वे मे पीतरस्थादिति होवाच ॥६॥
त् से दन्द दी दे दे-रेसा उपत्तिने कहा । तव महावते प उद् उसे दे दिये ओर कहा "यह. अनुपान भी ठो ; इसपर क बोका-'इसे ठेनेसे मेरदरारा निश्चय ही उच्छिष्ट ज पीया जायगा ॥३॥
एतेषामेतानित्यथैः,मे महयं, तेषाम्, इस पषठन्त प
अर्थं एतान् ( इन्द ) ह । भर देदीति होवाच । तान्स इभ्यो- | (तू सुने इन उददोक्तो ही दै, पष
उषस्तिने कहा । तव उस महावने ऽस्मा उषस्तये प्रददौ प्रदत्तवान् । | उपस्तिको वे उडद दे दिये त्थ
पीनेके स्थि पास रखे हुए जक अनुपानाय समीपस्थयुदकं हन्त | लेकर बोरा- “भाई ¡ अनुपान भी
ठे खो ।' पसा के ब भ |
गृहाणानुपानमित्युक्तः - | ने कदा--यदि. मे इस ज
^ पीडगा तो निश्चय ही मेरेद्रारा यह वाच-उच्छिषटं वै मे ममेदयुद्कः | उच्छिष्ट जल पिया जायगा [अर्थ्
मुञे उच्छिष्ट जर षीनेका दोष प्रा पीतं स्यादि पास्यामि ॥ २॥ । होगा] ॥ ३॥
इस प्रकार कदनेवाले उद
ःप्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः-- | उषस्तिसे दूसरे ८ महावत ) ने ' क्दा--
न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजी विष्यमि-
मानलादश्निति होवाच कामो म उदकपानमिति ॥४॥ +
स्लण्ड १० |
> शाङ्करमाष्याथ १२९५
श्या ये ( उडद ) भी उच्छिष्ट नहीं है ¢ उसने कहा -“इन्दे बिना खये तो म जीवित नहीं रह सकता था, जक्पान तो सुञ्ञे यथेच्छ
मात्रामे मिरूता हैः ॥ ४ ॥
किं न स्विदेते कुल्माषा अप्युच्छिष्टाश्युक्त आहोषर्तिन वा अजीविष्यं न॒ जीविष्यामी- मान्कुल्माषानखाद श्रमक्षयन्निति होवाच । काम इच्छातो मे ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः|
अतशचैतामवस्थां प्राप्तस्य वि~.
द्ाध्मयसोबतः स्वात्मपरोपकार- ¢ . (~ (९) -.(&
समथस्यैतदपि कमं वतो नागः-
स्य इत्यभिप्रायः । तस्यापि
जीवितं '्रत्युपायान्तरेऽजगुष्िते सति जुगुष्ितमेतत्कमं दोषाय ।
ज्ञानावलेपेन इवंतो नरकपातः
स्यादेवेत्यमिप्रायः, प्रद्राणक शब्दश्रवणात् ॥ ४ ॥
“क्या ये उडद् भी उच्छिष्ट नहीं है १ एेसा कटे जानेपर उषस्तिने कहा-- न उड््दोको बिना खये- बिना भक्षण क्रिये तो भे जीवित नहीं रह सकता था । जकूपान तो ु्ञे इच्छानुसार मिक जाता दै ॥
अतः इसका यह अभिप्राय है कि इस अवस्थाको भाप हए, विया, धरं ओर यद्चसे सम्पन्न तथा अपने जीर दूसरोके उपकारमे समथ पुरुषको ठेसा क्म करते इए भी पापका स्पशं नहीं हो सकता। उसके भी नीवनक्रा यदि कोई अन्य अनिन्य उपाय हो तो यह् निन्दनीय क्म॑दोषके ही स्यि होगा । ज्ञानाभिमानवश्च एसा कमं करनेवारे पुरूषका भी नरकमे पतन होगा दी-यह इसका अभिप्राय हे; क्योकि श्रुतिमें (राणक शब्द्का प्रयोग हे#॥४॥
क 1
® चाक्रायणने श्रद्राणक' अर्थात् अयन्त आपदूस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था--इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जौवनरश्ाका करो वैष साधन न रहनेपर ही किया जा सकता ह अन्यथा कदापि नहीं ।
1 1.1.
|
१२६ छान्दोग्योपनिषद्
स ह खादिखवातिदोषाज्ञायाया आजहार साप्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रति्ह्य निदधौ ॥ ५ ॥ उन्द खाकर वह वचे हुए उड दोको अपनी पलीके स्मि ढे भय ।
वह पटल ही खूब भिक्षा प्रप्त कर चुकी थी | अतः उसने उन ठक |
रख दिया ॥ ५ ॥
तांच स खादित्वातिरोषान- | उन्हे खाकर वह बचे हुए उद
तिचिष्टाञ्जायाये कारुण्यादाज- | को करणावश्च अपनी मायकि छि |
हार । साटिक्यग्र एब इल्माष्- | ठे जया । वह आपकी उदृदमि प्राप्तेः सुभिक्षा शोभनभिभ्ा | मिख्नेसे पूवं दी धमिक्षा-शोभः रन्धानेतयेतद्बभूव संदा । भिक्षाहो ची ओ भर्भात् भन
ठ प्राप्त कर चुकी थी । तथापि ली.
तथापि सखीस्वाभाव्यादनवज्ञाय स्वभाववश, [ पतिके दिये ह |
तान्डल्माषान्पत्ुदस्तातपतिगु ह्य | उनउद्दोकी थवहेखना नकरके उं
निदधौ निक्षि्ठवती ॥ ५ || | पतिक हाथ लेकर रख दिया ॥५॥ सह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य
लभेमहि लभेमहि धनमात्रार्राजासो यक्ष्यते स मा
सर्वेरासििज्येडेणीतेति ॥ ६ ॥
उसने परातःकारु शय्यात्याग करनेके अनन्तर का- यदि हमे कछ
अन्न मिरु जाता तो हम कुछ धन प्राक्त कर ठेते, वर्योकि वद राना यज्ञ करनेवाला हे, वह समस्त ऋखिक्कमेकि छियि मेरा वरण कर रगा ॥६॥
© स तस्याः कमं जानन्प्रात- | वह अपनी पलीके उस कार्यको किं
[ सष्याय!
इसने उदङ् वचा रखे है, जानता था,जतः
भातःसमय-उषःकार्मे शय्या अथवा
रुपःकाले संजिहानः सयनं निद्रां | नद्राका व्याग कनके भनन्तर उद
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इ्लण्ड १० | वा परित्यजन्तुवाच पल्याः शृण्वन्त्याः, यद्यदि बतेतिखिद्य- मानोऽ्नस्य स्तोकं लभेमहि तद्धक्त्वान्नं समर्थो गत्वा
लभेमहि धनमात्रां धनस्याल्पम्
ततोऽस्माकं जीवनं भविष्यतीति।
धनलामे च कारणमाह-- ` राजासौ नातिदूरे स्थाने यक्ष्यते । यजमानत्वात्तस्यात्मनेषदम् । स च राजामा मां पात्रयुपरम्य सर्वैरालिज्ये कसिक्ममिचऋछ लि- ्र्मप्रयोजनायेत्यर्थो ब्रणी- तेति ॥ ६ ॥
6 श्ाङ्रमाष्याथ १२७
अपनी पलीके सुनते इए कहा-- '्यदि [ भूखसे ] विन्न होते इए हमें थोडा-सा अन्न मिरु नाता-यहां "वतः अंन्ययका तातयं॑दहै “खिन्न होते इएः--तो उस अन्नको खाकर सामथ्यंवान् हो [ कुछ दूर ] जाकर हम धनकी मात्रा अर्थात् थोडा-सा धन प्राप्त कर ठेते ओर उससे हमारा जीवन-निर्वाहि हो जाता ।
धनखम्मे कारण बतरता है- यहँसे थोडी ही दूरपर वह् राजा यज्ञ करेगा । यजमान होनेके कारण उसके ल्यि “यक्ष्यते ेसा आत्मने- पदका प्रयोग किया गया दै#। वह राजा स॒ञ्चे युपात्र समञ्लकर ` समस्त आलिज्यों - ऋलिककमेकि रिगे अर्थात् ऋलिक्कर्मोको करानेके प्रयो- जसे वरण कर ठेगा ॥ ६ ॥
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तं जायोवाच हन्त पत इम एव करस्माषा इति तान्त्रादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥
उससे उसकी पलीने कहा -^्वामिन् | [ आपके दिये हुए ] व उदद ही ये मोद है; [इन्दे रीनिये ] ॥ उषत्ि उन्दं लाकर ऋलिनो- द्वारा विस्तारपूर्वक कयि जानेवाके उस यज्ञम गया ॥ ७ ॥
णं १ गष @ क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाको दी प्राप्त होनेवाडा या ॥
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१२८ जन्दोन्योपनिषद् [ अच्याय १
# 5 एवुक्तवन्तं जायोषाच-- | इस प्रकार कहते हुए उष
हन्त गृहाण हे पत इम एवं ये | उसकी पलीने कहा--दैस्वाि्।
द्धस्ते बिनििपतास्त्वया - आप इन उड्दौको ही लीजिये जि न , _ , | आपने मेरे हाथमे दिया था । उषसि षा इति । तार्खादित्वामं यज्ञं
ल उन्हं खाकर राजाके उस वितत रो वितं िस्तारिश्त्विगम- ऋषिजद्रारा विस्तारपूर्वक सम्पादित
रेयाय ॥ ७ ॥ होनेवाले यज्ञम गया ॥ ७ ॥
राजयन्ञमें उषस्ति ओर ऋविजोका संवाद्
तत्रोदरातृनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेदा स ह स्तोतारमुवाच ॥ < ॥ वहं [ जाकर वह ]आस्ताव ८ स्तुति ) के स्थानम स्तुतिकरते हृए । उद्गाताओंके समीप बैठ गया ओर उसने प्रस्तोतासे कदा-॥ ८ ॥ तत्र च गत्वोदधातूलु दराठपुरु- | ओर बहो जाकर वह उद्गाता । पानागत्य स्तुबन्त्यस्मिभित्या- | ोगकि पस आ आस्तावमे- जि, सतावस्तस्मिास्ताबे स्तोष्य- | स्थानम (ष्तोतागण ) सठति कत । माणालुपोपविवेश समीप उपवि- | ह, उसे आस्ताव कहते दै, उस्े~ ।
(हिस 1 । स्तुति करते हुए उद्गाताओकि समीप | शसतेषामित्यथः । उपविडय स ह | वेठ गया । तथा वहाँ बेठकर उसे प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥
। भस्तोतासे कडा-॥ ८ ॥ पस्तोत्या देवता भस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्रा-
५ मूधा ते विपतिष्यतीति ॥ ९॥ भस्तोतः ! जो देवता परस्ताव-भक्तिमे उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर १५६
इ्लण्ड १० ]
हे प्रस्तोतरित्यामन्त्याभिभु- सीकरणाय । या देवता प्रस्तावं
शाङ्करभाष्या्थं १२९ ¬ << < < -
हे प्रस्तोतः [--इस प्रकार अपनी ओर रक्ष्य करानेके स्यि म्बोधन करते हुए [ वह बोला]
व्रस्तवभाक्तमनु गतान्वायत्ता ता , (नो देवत। प्रस्तावरमे- प्रस्तावभक्ति-
चेदेवतां प्रस्तावभक्तेरविद्रान्सन्
म अन्वायत्त यानी भनुगत है, यदि उस प्रस्तावभक्तिके देवताको बिना जने ही तू उसका, उसे जाननेवाले
्रस्तोष्थसि विदुषो मम समीपे । | मेरे समीप. प्रस्तवन करेगा तो तेरा
मस्तक गिर॒ जायगा यदि यह्
तत्परोकषेऽपि चेद्विपतेत्तस्य मूरा | माना जाय कि देवतां-्ञानियोके
कर्ममात्रविदामनधिकार करमणि स्यात् । तचानिष्टम्, दुषामपि कम॑द्य॑नात् , दक्षिण-
मारुतेश । अनधिकारे चावि- दुषाणत्तर एवैको मागः श्रूयेत । न च स्मातंकमनिमित्त एव दक्षिणः पन्थाः,“यज्ञेन दानेन” इत्यादिश्रुतेः । (तथोक्तस्य मया! इति च विरोषणाद्िदरसमकषमेव
क्मण्यनधिकरारो न सवाग
परोक्षमे भी मस्तक गिर जायगा तो
एवे | कैव कम॑का ही ज्ञान रखनेवारका अवि-। कमम अनधिकार ही सिद्ध होगा ।
ओर यह बात माननीय नहीं हे क्योकिं कमं ॑तो अविद्रार्नोको भी करते देखा जाता है ओर दक्षिण- मागंका प्रतिपादन करनेवाली श्रतिसे भी यही सिद्ध होता है। जौर यदि उनका अधिकार न होता तो श्रतिमें एकमात्र उत्तरमागंका ही प्रतिपादन करिया होता, क्योकि दक्षिणमागं केवल स्मातं कर्मके ही कारण प्राप्त होनेवाखा नदी है, जैसा किं “यज्ञसे दानसे” इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । तथा “मेरद्रारा इस प्रकार कहे हुए" इस ॒वाक्यद्रारा विदोषः पसे निरूपण किये जनेके कारण भी विद्वानके सामने ही उसे कमका अपकार नही. है । ¶ ।
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१३० र छान्दोग्योपनिषद् होत्रस्मातंकर्माध्ययनादिषु च, स्मत कर्म ओर अध्ययनादि सुत अनुायास्तत् ९ कमृमिं पेन्ना नियम नहीं हे, कयो$ सर स्तत (8 नहो तो [ अविदन् सिव भौ] कमेमात्रविदामप्यधिकारः सिद्धः | कर्मु्ठनकी आज्ञा देखी न कर्मणीति 1 अतः यह सिद्ध हुभाढ़ि 1 । मूधा ते केवर कर्ममात्रका ज्ञान करनेवाशै. विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥ का भी कमम अधिकार है॥९॥
पणी - वि
एवमेवोदवातारमु वाचोद्रातर्या देवतो्रीथमन्वाः यत्ता तां चेदविद्रानुद्रास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ १० ॥ एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच तिहतर्या देवता परतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्ान्रतिषटरिभ्यसि मूधाते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तु ष्णीमासांचक्रिरे॥११॥ , दसी भकार उसने उदूगातासे भी कहा- ह उद्गातः | नो देवत ` उद्गीथे अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उदृगान करेगा तोते । । मस्तक गिर जायगा ॥ १० ॥ इसी प्रकार प्रतिहतसि भी कहा--6 भव्हितः ! जो देवता प्रतिहारमे अनुगत यदित उसे बिना जाने प्रति. ` हरण् करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ तब वे प्रस्तोता आदि भपने- ख -उप्रत हो मौन होकर बैठ गये ॥। ११॥ ` एवमेबोद्रातारं प्रतिदर्तार | इसी भकार उद्गातासे तथा मरि चेत्यादि समानमन्यत् । ते
हसि कहा-इत्यादि शेष अरं पू , भ्रस्तोत्रादयः कमंभ्यः समारता | वत् है । तव वे भर्तोता भादि क्रमे
` , उपरताः सन्तो मूधंपातभया्त- { समारत _ अर्थात् उपरत हो मत्तक | क प्णीमासांचनिरऽन्यच्चाङव भातः | गिर जानेके भयसे चुप होकर 1 |
गये ओर अथहोनेके कारण उन्दने । अर्थित्वात् ॥ १०-११॥ | कुछ जौ नहीं किया ॥१०-११॥ । ६ „ ~: # ६ | 3 इतिच्छान्दोग्योपनिषदि भथमाभ्याये दशमसखण्डमपष्यं सम्पृणंम्॥ १०॥ |
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[ सष्याय !
चं न्तः 4)
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राजा ओर उषस्तिक्रा सकद
अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विवि- दिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥
तष उससे यजमाने कहा--“म आप पूज्य-चरणको जानना चाहता ह इसपर उसने कहा--भ चक्रका त्र उपस्ति ह ॥ १॥
अथानन्तरं = यज- | तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान राजाने कहा भगवानूको-- पूजनीयो जानना चाहता द ॥ रसा कदे जानेपर उसने कहा--
मानो राजोवाच । भगवन्तं वै ` पूजावन्तमहं बिविदिषाणि वेदि-
ठमिच्छमीलयक्त उपस्तिस्मि | ` ` ~ खाक्रायणस्तवापि श्रो 'यदि तुमने सुना हो तो मँ चरका
यदीति होवाचोक्तवान् ॥ १ ॥ | एत्र उषस्ति ' ॥ १ ॥ ~: £ :-
. स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सवेराविज्येः पयेषिषं भगवतो वा अहमवित्यान्यानव्रषि ॥ २ ॥
ने इन समस्त दविक्कमेकि स्यि श्रीानफ्टो सोजा था ।
श्रीमानूके न मिटनेसे ही मने दूसरे लिर्जोका वरण किया था ॥२॥
स॒ ह यजमान उवाच-सत्य- , उस यजमानने कडा-- थह टीक मेवमहं भगवन्तं बहुयुणमश्रौषं | ही दै, मने श्रीमान्को बहुत गुण- स्वैश्च ऋलिकरमभिरासज्यैः | वान् घना दै । भने सम्पूणं छलि- पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । । क्कमके स्थि जप सोल
छाः उ ५-
१६२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
अन्विष्य भगवतो वा अहम- | की थी । द्दनेपर श्रीमानूके न विच्यालाभेनान्यानिमानब्रषिघर- | मिरनेसे ही ने इन दूरे ऋलिनो- तवानस्मि ॥ २॥ काव्रण किया था ॥ २॥
भगवास्तेव मे सवेराविञ्येरिति तथेत्यथ तर्येत एष समतिखष्टाः स्तुवतां यावच्वेभ्यो धनं ददास्ताव- न्मम द्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३॥
मेरे समस्त ऋत्विक्कमेकि रि श्रीमान् ही रह येसा सुनकर उपस्तिने “दीक दै' पेसा का-[ ओर बोला- ] “अच्छा तो मेरे द्वार भस्नतासे आज्ञा वि हुए ये ही छोग स्तुति करं; ओर तुम जितना
धन इन्दे दो उतना ही मुञ्चे देना ॥ तव यजमाने %सा ही होगा' यह कहा ॥ ३ ॥
अद्यापि भगवांस्त्वेव मे मम | “अव भी श्रीमान् ही मेरे समू (५ सवरालिज्यै ऋत्विकं ¢ <~) ज्यं ऋछत्विकर्माथमस्त्वि- ऋलिक्कर्मोके स्यि रहं एेसा स्यक्तस्तथेत्याहोषस्तिः ॥ रं | कटे जानेपर उषस्तिने कदा-- त्वथेव तयत एव त्वया पूवं वृता अच्छा, कितु तुमने पषटरे निनक[ ` मया समतिसृष्टा मया सम्यक वरणकर ल्या हैवे ही ऋवि- सननायुज्ञाताः सन्तः र गगण मेरे द्वारा समतिखष्ट होत्रे
तवेतत्कार्यम्
ताम् । त्वया त्वेत › || म्रसन्नतासे आज्ञा पराप्त कर स्तवन यावचवेभ्य.भरस्तो्ादिभ्यःसर्ेभयो| करं । क तो यही करना होगा क जितना धन तुम इन सम्पूणं प्रस्तोता आदिको दोगे उतना ही सुञञे देना फेसा कटे जानेपर यजमानने “ेसा ही होगा यह् कहा | २ ॥
धनं दद्याः प्रयच्छसि तावन्मम दद्याः । इत्युक्तस्तथेति ह यज- मान उव्राच ॥ २ ॥
खण्ड १९] शाङ्करमाष्याथं १३३ उषस्तिके प्रति प्रस्तोताका प्रदन
अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद शस्तोतर्या देवता परस्तावमन्वायत्ता तां चेद विद्ान्प्रस्तोष्यति मूर्धा ते
विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥४॥ तदनन्तर उस ( उपस्ति ) के पास [ शिष्यभावसे ] प्रस्तोता आथा [ ओर बोा--] “भगवन् | आपने जो मुक्षत कहा था कि हे प्रस्तोतः | जो देवता प्रप्तावमे अनुगत हे यदि तू उसे. विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा--सो वह देवता कौन है ® ॥ ४॥ अथ हैनमौपर्त्यं वचः शरुत्वा | तदनन्तर उपस्तिका यह वचन सुनकर प्र्तोता उषस्तिके प्रति उपसन्न ्रस्तोतोपससादोपसिति विनये- । हुभा- विनीत ावसे उपत्तके समीप आया [ ओर बोख-- ] नोपजगाम । प्रस्तोतर्या देवते- वचनो जो देवता प्रस्तावमें अनुगत है इसयादि वाक्य स॒ङ्षसे कहा थासो वभू; कतमा सा देवता १ या | वह देवता कौन दै, नो कि परप्ताव- 4 भक्तिमे अनुगत है ® ॥ ४॥ प्रस्तावभक्तिमन्वायत्तेति ॥ ४॥
त्यादि मा मां भगवानवोचसपू-
उष्स्तिका द देवता प्राण हे भ्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति ष्राणमभ्युजिहते। सेषा देवता प्स्तावमन्वायत्ता । तां चेदविद्वन्श्रास्तोष्यो मूषां ते
व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५॥ उस ८ उत्ति) ने "वह ( देवता ) प्राण हे" एसा कय क्योंकि
ये सभो भृत प्राणे ही प्रवे कर जते है ओर भाणे ही उलन होते
(क १ /' 7 ए +.
१३७ अ छान्दोग्योपनिषद् [ ष्याय १
है । वह यह प्राणदेवता ही प्रस्तावे अनुगत हे, यदि तु उसे बिना जाने ही परस्तवन करता तो भरदरारा इस प्रकार कहे जनेपर् तेरा मस्तक गिर जाताः ॥ ५ ॥
ृष्टः प्राण इति होवाच । युक्तं ईस प्रकार पूछे जानेपर उसने "वह देवता प्राण हैः एसा कहा । प्राण म्तावका देवता हे- यह कथन दीक सर्वाणि स्थावरजङ्गमानि भूतानि | दी दै । किस प्रकार £ व्ोकि
सम्पूणं स्थावर-जब्गम प्राणी प्रखयका- प्राणमेवाभिसंविरान्ति प्ररयकाले| मे प्राणहीमे मवे करते है, अर्थात्
भाणक्रो ओर रक्षयकर प्राणखपसे दही पाणममि लक्षयित्व प्राणात्म- | [ उत स्थित हो जते] भोर
्रस्तावस्य प्राणो देवतेति। कथम् १
णादेवोद्गच्छ- | उकारे उसीसे उद्गत होत है 7 ४ ` ` । अर्थात् वे भाणसे ही उस्न होते है । न्तीत्य्थं उत्पत्तिकाले । अतः वह यह् प्राणदेवता ही प्रष्तावमें
सेषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता । | अयुगत है।
तां चेदविद्रांस्त्वं प्रास्तोष्यः ` भ्रस्तवनें प्रस्तावभक्ति कृतवानसि यदि मूध शिरस्ते व्यपतिष्य- द्विषतितममविष्यत्तथोक्तस्य
त् यदि उसे बिना. जाने ही प्रप्तवन- भस्तावभक्ति करता तो तेरा मूर्धा यानी मस्तक गिर जाता । धर्थत् उस समय मेरे इघ प्रकार कहनेपर तत्का मूधा ते विपतिष्यः विपतिष्यतीति । क तिरा मस्तक गिर जायगा? तेरा निषिद्धः कमणो यदुपरममकाषीं- निषेष कनेपर कर्मे उपरति की रित्युमिप्रायः ॥ ५ ॥ वह जच्छाही क्रा दै॥ ५॥
[१
<~ >
अण्ड ११ | शाङ्करमाष्या्थं १३५ > > न = उद्गाताका ्रस्न
अथ हेनमुद्रातोपससादोद्भातर्या देवतोद्रीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्रास्यसि मुधा ते विपतिष्यतीति मा भग- वानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥
तदनन्तर उसके समीप उद्गाता आया [ जर ॒बोख-- ]
“भगवन् ! आपने मुक्षसे जो कहा था कि हे उदुगातः | जो देवता उदुगौथमे अनुगत है यदि उसे बिना जने ही तु उद्गान करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा- सो वह देवता कौन है ४॥ ६॥
तथोद्गाता पप्रच्छ कतमा | इसी प्रकार उससे उद्गाताने भी सोद्रीथभक्तिमनुगतान्वायत्ता दे- | पूछा किं वह उद्गीथमक्तिमे अनुगत वता ? इति ॥ & ॥ कोन देवता है १॥ ६ ॥
कि. /, ¬) उषस्तिका उच्तर-उद्गीथानुगत देवता आदित्य है आदित्य इति द्ोवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुचैः सन्तं गायन्ति सेषा देवतोद्वीथम- न्वायत्ता तां चेदविद्वानुद गास्यो मूधा ते उ्यपतिष्यत्त- थोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥
उषस्तिने वह ( देवता ) आदित्य है" एेसा कहा, क्योकि ये सभी भूत ऊँचे उठे आदित्यका ही गान करते हैँ । वह यह आदित्य देवता ही उदुगीथमं अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही उद्गान करता
तो मेरे द्वारा उस तरह कदे जनेपर तेरा मस्तकं गिर जाता ॥ ७ ॥ पष्ट आदित्य इति होवाच । | इस प्रकार पूरे जानेपर उसने “वह [ देवता ] आदित्य है' एसा सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्या- | कदा; क्योकि ये समी प्राणी उंचे
९३६ छान्दोग्योपनिषद् | अष्याय १ > > >>> >~ ट दित्यच्चैरुध्वं सन्तं गायन्ति | अर्थात् उप्र विमान आदित्यका ही | गान---शव्द् अर्थात् स्तवन क्रते है; प्र्तावसे श्र शाब्दे समानता हौनेके कारण जैसे प्राण-प्रप्ताव-देवता था उसी प्रकार यहाँ [उद्गत आदिय जर उदूगीथकी ] उत्" शब्द सामान्यादिव प्राणः । अतः सषा | समानता हने यह् उदूगीथ देवता है, अतः वह यह देवता आदि शेष देवतेत्यादि पूर्वत् ॥ ७ ॥ | अर्थ पूर्ववत् है ॥ ७ ॥
६
शब्दयन्ति स्तुबन्तीत्यरिग्रायः,
उच्छब्द्सामान्यात्; भ्रशव्द्-
ग्रतिहतकि प्रन अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता भरति. हारमन्वायत्ता तां चेद षिद्रन्प्रतिहरिष्यसि सूरी ते विष- तिष्यत्ीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥८॥ किर परतिहर्त उसके पास आया [ भौर वोर-- ] भगवन् | आपने जो सुन्ञसे कहा था कि टे प्रतिहतः | नो देवता प्रतिहारं अनुगत
है यदि उसे बिना जने ही तु प्रतिह्रण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा-- सो बह देवता कौन है ॥ ८ ॥
एवमेवाथ हैनं प्रतिहर्तोपस- ¦ इसी प्रकार फिर उसके पास ८ साद् कतमा सा देवता प्रतिहार | पतिह्त = 94 पतिहारमे अनुगत देवता कौन |
भन्वायत्तेति ?॥ ८ ॥ है॥ ८॥
----ज््----- उपस्तिक उत्तर-प्रतिहारानुगत देवत] अन्न ह
अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह॒वा इमानि भूता- न्यन्नमेव पतिहरमाणानि जीवन्ति सेषा देवता पतिहार-
खण्ड ११ | शाङ्करमाष्याथ १३७
मन्वायत्ता तां चेदविद्रान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपति- यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥
इसपर उसने "वह ८ देवता ) अन्न है" रसा कहा; क्योकि ये सम्पूणं
भूत अपने प्रति अन्नका ही हरण करते हुए जीवित रहते है । वह यहं अन्न देवता प्रतिहारमे अनुगत है । यदि तु उसे विना जाने ही प्रतिहरण करता तो मेरेदरारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ९॥
पृष्टोऽननमिति होवाच । सर्वाणि इ वा इमानि भूतान्य- सरमेवात्मानं प्रति स्वतः प्रति- हरमाणानि जीवन्ति । सेषा देवता प्रतिशब्दसामान्यासरति- हारभक्तिमल्ुगता । समानमन्य- तथोक्तस्य मयेति । प्रस्तावो- दरीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्या- न्दृषटयोपासीतेति समुदायाथेः। प्राणाद्यापत्तिः कम॑समृद्धवा
फरुमिति ॥ ९ ॥
++ इतिच्छान्दोग्योपनिषदि
इ प्रकार पूछे जानेपर उसने वहं देवता अन्न हैः एेसा उत्तर दिया, वर्थोकि ये सम्पूणं मूत सब ओरसे अपनी ओर अन्नका प्रतिहरण करते हुए ही जीवित रहते दै । वह यह देवता ही "प्रतिः शब्दम सादृश्य होनेके कारण प्रतिहार भक्तिमें अनुगत है । [ तां चेदविद्वान्ः यहाँ से लेकर ] तथोक्तस्य मयाः यहोँ- तक रोष अथं पहलेके समान है । समुदायाथं ८ श्राण इति होवाचः इत्यादि सव मन्त्रोका सारांश ) यह हे कि प्रस्ताव, उद्गीथ ओर प्रतिहार भक्तियोकी क्रमशः भ्रण, भादि ओर अत्रदृष्टिसे उपास्नना करनी चाहिये । प्राणादिषूपताकी प्रापि अथवा कर्मम समृद्धिम् करना यह् उस उपासनाक्रा फरु हे ॥ ९ ॥
प्रथमाध्याये
ह
पकादशखण्डमाष्यं सम्पूणम् ॥ १६ ॥
( र -- ० :--
सद्र कण्डु
--०-९ 42 9 ~
ज्ोवसामसम्बन्धी उपाल्यान अथातः शोव उद्गीथस्तद्ध वको दारभ्यो ग्लावो
वा मेत्रेयः स्वाध्यायमुदरनाज ॥ १ ॥ तदनन्तर अव [अन्नरभके लिये जपेत्] सौव उदगीथका आरम्भ
या जाता रै । वहाँ
भरसिद्ध है छि | पूर्वकास्मे ] द्मा पुत्र बक
अथवा मित्राका पुत्र ग्लाव स्वाध्याये रयि [ गोवके बहर ] जङाशयके
समीप गया ॥ १ ॥
अतीते खण्डेऽनाप्रापिनिमित्ता शोबोद्गीयोपदेश- कष्टावस्थोक्तो-
भयोजनम् च्छिष्टपयुपितमक्षण- रक्षणा सा मा भूदित्यमला- भाय अथानन्तरं ओोवः उभि
उद्रीथ उद्दानं प्रस्तूयते । `
सामातः
तत्तत्र ह किक बको नामतो |
दल्भस्यापत्यं दाल्भ्यो गावो बा नामतो मित्रायाथापत्यं मेत्रेयः। बाञ्ञब्दथा्थे दथायुष्या-
अतीत खण्डमे अन्नकी अप्रा्िसे दोनेवाली उच्छिष्ट ओर पर्युषित ( बासी ) अन्नभक्षणङूप कष्टमयी अवस्थाका वणेन करिया गया था,
वैसौ भवस्थाकी प्राति न हो--
इसख्यि जब इससे भागे भन्न- मर्क स्थि शौव- धानोद्ारा देखे हए उद्गीथ--उद्गान खाम- का भारम्भ किया जाता है ।
यहो परसिद्ध दहै कि बकनामक दारभ्य-दरभका पुत्र अथा ग्लव- नामक भेत्रेय-मित्रका पुत्र स्वाध्याय खि भरामसे बाहर “उद्नाजः एकान्त देशम स्थित जलाश्चयके समीप गया। यहो वाः शाब्द चः
खण्ड १२ |
श्ाङ्करभाष्याथं
१३९
> < >< >< < --8- - -<- ----<----<---------
यणो ह्यसौ । वस्तुविषये क्रिया - स्विव
(द्विनामा द्विगोत्रः" इत्यादि
विकल्पानुपपत्तेः ।
हि स्मृतिः । दश्यते चोभयतः पिण्डमाक्त्वम् । उद्वीथे बद्ध- चित्ततवादुषावनादराद्रा वाशब्दः स्वाध्यायार्थः । स्वाध्यायं कतुं ग्रामादूबदिरुदवाजोद्वतवान्विवि- क्तदेशस्थोदकाम्याशम् । उद्व्राज प्रतिपालयाश्का- रेति चैकवचनाघ्निङ्गादेकोऽसा- षिः । शोद्वीथकारग्रतिपारना- दुषेःसवाध्यायकरणमन्नकामन-
येति लक्ष्यत हत्यभिग्रायतः॥ १॥
[थ 1
( ओर ) के अर्थम है । अवद्य ही वह दरयाभरुष्यायण हे, कर्कि वस्तुके विषयमे क्रिया्जौके समान विकल्प दोना सम्भव नहीं दै । “द्विनामा द्विगोत्रः"' इत्यादि वाक्य स्मृति प्रसिद्ध॒ भी है। [ निस गोत्रे पुत्र उत्पन्न होता दहै ओर जहाँ वह धमूवंक गोद ज्या जाता है उन ] दोर्नोका उससे पिण्डग्रहण करना छोकर्मे भी देखा दी जाता है । अथवा उद्गौथविदामे बद्ध- चित्त होनेसे छषिरयोमे अनादर होने- के कारण वाः शब्दका प्रयोग स्वाध्यायके स्यि किया गया है ।
“उद्रवाजः ओर श्रतिपाख्याञ्चकार' इन क्रियारओमे एकवचन ` होनेसे सिद्ध होता है कि यष्ट एक दही चषि है । [तृतीय मन्त्रम कथित ] शानोके उद्गीथकारुको प्रतीक्षा करनेसे तादप्यतः यह रक्षित होता हे कि श्छषिका स्वाध्याय फरना अन्नकी फामनासे हे ॥ १ ॥
अ 4 ५ ०9 र्का
१९०
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय १
तस्मे श्चा श्वेतः प्रादुवभूव तमन्ये श्वान उपसमे
त्योचुरच्ं नो भगवानागायकश्नायाम वा इति ॥२॥
उसके समोप एक श्त कृत्ता प्रकट हुआ । उसके पास दूसरे कुततोने आकर कदा-- भगवन् | अप हमारे ल्य अन्रका आगान कीजिये,
हम निश्चय दही भूखे हः ॥ २ ॥
स्वाध्यायेन तोषिता देवत- षिवा श्वरूपं गृहीत्वा श्वा शवेतः संस्तस्मा ऋषये तदनुग्रहाथं प्रादुर्बभूव प्राुकार । तमन्ये शुङ्ग श्वानं क्षुल्लकाः श्वान उप- समेत्योचुरुक्तवन्तोऽन्नं नाऽस्मभ्यं भगवानागायत्वागानेन निष्पा- दयचित्यथः ।
शृख्यप्राणं वागादयो वा प्राणमन्वन्नयुजःस्वाध्यायपरि-
सन्तोऽयुगृहणीयुरेनं श्ररूपमादायेति युक्तमेवं प्रतिप-
तोषिताः
तुम् । अशनायाम वै बुयुक्षिताः
स्मो वाइति ॥२॥
तान्होवाचेहैव मा पात दाल्भ्यो गावो वा सेत्रेय
स्वाध्यायसे संतुष्ट हो उस ऋषिके निमित्त--उसपर अनुग्रह करनेके स्यि [ कोड ] देवता या ऋषि श्वानछ्प भारणकर शेत कृत्ता बनकर प्रकट हुजा । उस श्वेत कुत्तसे दूसरे छोटे-छोटे कृत्तोने समीप आकर कहा--भगवन् | आप हमारे स्थि जन्नका आगान कीजिये अर्थात् अगानके द्वारा अन्न प्रस्तुत कीनिये ।'
अथवा मुख्य प्राणसे वागादि
` | गोण प्राणोने इस तरह कहा, क्थोकि
मुख्य प्राणके पीके अन्न ग्रहण करनेवाटे वागादि गोण प्राण उसके स्वाध्यायसे संतुष्ट॒हो शानहूप धारणकर उसपर अनुग्रह करं-- एसा मानना उचित ही है । अवद्य ही हमं अशन (भोजन) की इच्छा दै अर्थात् हम निश्चय ही भूखे हैः ॥२॥
सुपसमीयातेति तद्ध बको
प्रतिपाखयाचकार ॥ ३ ॥
शण्ड १९ 1 काङ्करमाष्याथ १४१
~ ------- <<< --~ उनसे उस ( शेत श्वान ) ने कहा--“तुम परातःकार यहीं मेरे पाच जाना ! ठव दारभ्य बक अथवा मेत्रेय ग्छाव उनकी प्रतीक्षा करता रहा ॥ ३ ॥ एवुक्ते श्वा श्वेत उवाच | यपेसा कटे नानेपर रेत कुेने उन = ~ _ | छोटे-छोटे कुत्तौसे कहा- वम प्रातः- ता्॒नकाञ्ुन॒इवास्ममेव कार इसी स्थानपर मेरे पास आना। प्समीयातः इसत ॒करियापदमें दीर्धपाठ छान्दस है अथवा प्रमादके कारण समीयातिति । द्यं छान्दसं | दै । मरातकारुकी जो निधुक्ति कौ गयी है वह उसी समय उद्गानकरी सभीयातेति व्रमादपाटो वा । | कर्तव्यता सूचित करनेके ल्थि ्रातःकालकरणं तत्का एव | अथवा मध्याहोरर कामे अन्नदाता करवया्थम् । अन्नदस्य वा | सयं उद्गाके सन्ल नही रता सबितुरषराङ्केऽनाभिष्ख्यात् । | यह सूचित करनेके स्थि दे । तत्तत्रैव ह बको दाल्भ्यो | तब दारभ्य वक अथवा मैत्रेय ग्लावो बा मैत्रेय ऋषिः प्रतिपा- | ग्व नामक ऋषि उसी स्थानपर र्याशचकार ब्रतीक्षणं कृतवा- श्रतिपाख्याश्चकार'-म्रतीक्ष करता नित्यथेः ॥ ३ ॥ रहा-यह इसका तात्पयं है ॥ ३ ॥
देशे भा भां प्रातः प्रातःकालडउपः
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ते ह यथेवेह बहिष्पवमानेन रतोष्यमाणाः स रब्धाःसर्षन्तीत्येवमासश् युस्ते ह सम् पविदय हि चक्तु॥४॥ उन कोने, जिस प्रकार कर्मे बहिष्पवमान सतोतसे स्तवन कने-
वारे उद्गाता परस्पर भिरकर भमण करते दै उसी प्रकारं अमण क्या ओर परर वहो वठकर हकार करने रगे ॥ ४ ॥ |
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१४२ छान्दोग्योपनिषद्
[ चष्याय १
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ते शधानस्तत्रैवागम्य ऋषेः | उन कुतोने वहो उ ऋष्क समक्षं यथेह कर्माणि बहिष्पवमा- | सम्पुल आकर, जिस प्रकार कर्मे नेन स्तोत्रेणस्तोष्यमाणाउद्वात्- | बदिष्पवमान स्तोत्रस स्तवन करने. पुरुषाः सरन्धाः संलग्ना अन्यो- वाले उद्वातारोग एक-द्सरेसे मिल- न्यमेव भुखेनान्योन्यस्य पुच्छं | कर चन्ते है उसी प्रकार हस गृहीत्वा ससुपुरासु न्तः परि- एक-दूसरे पूंछ पकटकर सर्पण- त १ परिभ्रमण क्रिया । उन्होने रस सन्तो हि चक्र्हिकारं कृतवन्तः | प्रकार परिभ्रमण कर फिर वशं 91 ` वैटकर हकार किया ॥ ४॥
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कृत्तोदवारा भिया हुजा हिकार
ओ भदारमोंर३पिवा३ेमों३ देवो वरुणः
परजापतिः सविता २ न्नमिहा २ हरदन्नपते ३ ऽन्न- मिहा २ हरा २ हरो ३ मिति॥५॥
ॐ हम खाति है, ॐ हम पीते टै, ॐ देवता, वरुण, प्रजापति, सुयेदेव यहाँ अन्न खव । हे अनपते | यहाँ अन्न खभो, अनन सभो, ॐ ॥ ५॥
ओमदामों पिबामो देवो चयो-| ॐ हम खाते है, ॐ हम पीते तनात्, वरुणो वषेणाजगतः, | दै, ॐ । आदित्य ही चोतनथीर ल पारनातमजानाम् होनेके कारण देव, जगतूकी वर्षा
4: ९ _ १ | करनेके कारण वरुण, प्रनार्जोका सप्ता प्रसत त्वात्सवस्यादित्य | पारन करनेसे भजापरि तथा सबका उच्यते । एतैः पर्यायैः स एव | पसव्ति होनेके कारण सविता भूत॒ आदित्योऽ्नमस्मम्यमिहा 1
सरत करण पेसे गुर्णोवाले वे आदिय 1हरात्व हमारे ९) दरदादरत्विति । यल अन रि ।
न
खण्ड १२ ] शाङ्रभाष्याथे १५३ त एवं हि छरत्वा पुनरप्यूचुः- | इस प्रकार ईकार कर उन्होने _ 6८ [फिर भी कहा-व्हीतु हे भन्नपते |
स तवं हैऽ्नपते ! स हि सवस्या- - सम्पूणं नका उत्त्तिकर्ता होनेके = कारण वी अन्नपति दै, क्योकि
लस्य प्रसवितृतवात्तिः । न दि उसके पाक विना उत्यन्न हो जानेपर त्पाकेन मिना श्ह्वमनमु- | भौ भिय स्थि _भयुगात भौ अन्न उत्मनन नहीं होता, अतः वह
मात्रमपि जायते प्राणिनाम् । | अन्नपति है--दे अन्नपते | तृ हमारे लिये यहाँ अन्न ख ।' आहरः इस अतोऽमपतिः । हेऽमपतेऽ्नमस्म | शव्दङ्ी पुनरृत भद्रके च्य `
समाप्ति सूचित करनेके श्यि
आदरार्थः । ओमिति ॥ ५ ॥ । दै ]॥ ५॥ --; ॐ ;---
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाभ्याये दादराखण्डमाष्यं सस्पूणम् ॥ १२॥
खौद्त र ~ छामावयवमूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासना भक्तिविषयोपातनं सामा-, सामभक्ति-विषयक उपासना
वद्रभित्यतः सामावयर्वोसे सम्ब । अतः वयवसंबद्भमित्यतः सामावयवा- मसि ४ व | न्तरस्तोमाक्षरविषयाण्युपासना- | स्तोमाक्षरविषयक अन्य संहत न्तराणि संहतान्युपदिर्यन्ते- | उपासनार्ओका वर्णन किया जाता ऽनन्तरं सामावयवसंद्धःवावि- | दहै, क्योकि उनका भी सामावयव- ख्पसे [ सामभक्तिके साथ ] सम्बद्ध
शेषात्-- होना समान ही है--
अयं वाव रोको हाउकारो वायुर्हाहकारश्न्द्रमा अथकारः । आम्मेहकारोऽभ्चिरीकारः ॥ १ ॥
यह छोकं ही हाउकार है, वायु हाईकार है, चन्द्रमा भकार दै, आत्मा इकार है ओर अग्नि ईकार है ॥ १ ॥
अयं बावायमेव रोको हाड- यह छोकं ही रथन्तर साम कारः स्तोभो रथन्तरे साम्नि प्रसिद्ध हाउकार् स्तोभ है। ही सिद्धः । इवं ैरथन्तरम्' इत्य रथन्तर हे" इस सम्बन्धसामान्ये 9 र हाउकरार स्तोभ ही यह छोक है-इस स्तोभोभ्यं लोक इत्येवभुपासीत् । | प्रकार उपासना करे । वायु हाइकार वायुाडकारः। वामदेव्ये सामनि | है; वामदेव्य सामे हादकार स्तोम त रिद । वायु सोर. जलका बन्धश्च वामदेञ्यस्य साम्नोयानि सम्बन्ध ही वामदेव्य सामका मूक
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्याथ १४५ > ~ < = <-> >< 1 >< >- <
रिति । अस्मात् सामान्याद्धाई- | है । अतः इस समानताके कारण हाइकार सामकी वायुदृष्टिसे उप- कारं वायुदष्टयोपासीत । सना करनी चादिये । ४ | चन्द्रमा अथकार है | अथकारकी चन्द्रमा अथकारः । चन्द्रः | उपासना चनद्रद्टिते करनी चाहिये, क्योकि यह ८ चन्द्रमा ) अन्नम दी स्थित है । चन्द्रमा अन्नस्वूप ही स्थितम्। अन्नात्मा चन्द्रः । | है । थकार जर अकारमें समानता होनेके कारण भी [अन्नखप् चन्दरमा- थकाराकारसामान्याच । आत्मे- | कौ अथकाररूपसे उपासना करनी तीतः चादिये ] आत्मा इहकार है; इद" इकारः । इहेति स्तोभः परत्य थह [ एक प्रकारका | स्तोम होता | हे । प्रक्ष ही आत्मा हः पसा | कहकर निर्देश क्रिया नाता है ओर चस्तोभः, तत्सामान्यात् । अमि- ¡ शदः देषा स्तोम भी होता दै, 1 अतः उसकी समानताके कारण रीकारः । निधनानि चाग्नेयानि | [ आत्मा इहकार दै ] । अनि ईकार | हे । सम्पूणं आग्नेय साम ‰' में समाप्त ; होनेवाटे दै । अतः उस सद्दाताके | कारण अग्नि ईैकार है॥ १॥
-व्9-+-
आदित्य उकारो निहव एकारो विखे देवा ओ- होयिकारः धरजापतिहिकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या
वाग्विराट् ॥ २॥ आदिल ऊकार दै, निहव एकार दै, विवेदेव ओहयोयिकार दै,
दृष्टयाथकारमुपासीत । अन्ने हीदं
दयात्मेहेति व्यपदिश्यते, इहेति
सर्वाणि सामानीत्यतस्ततसामा-
न्यात् ॥ १ ॥
` ्नापति हकार है तथा भरण सवर दै, जन या दै पव वरद् वाक् दै ॥२॥
क 0.
१४६ नि
आदित्य उकारः । उच्चैरूध्वं
सन्तमादित्यं |
स्तोभः। आदित्यदेवत्ये साम्नि स्तोभ ऊ इत्यादित्य उकारः । निहव इत्याहवानमेकारः स्तोभः। एहीति चाहयन्तीति तत्सामा- न्यात्। विश्वे देवा ओहोयिकारः। वैरवदेव्ये साम्नि स्तोभस्य दर नात् । प्रजापतिर्दिकारः । आनि- रु्तथारदिकारस्य चाव्यक्ततवात्।
प्राणः स्वरः, स्वर इति स्तोभः । प्राणस्य च स्वरहेतुतव- सामान्यात् । अननं या। या इति स्तोभोऽन्नम् । अन्नेन हीदं यातीत्यतस्त्सामान्यात् । वा- गिति स्तोभो विराडन्नं देवता- विशेषो वा। वैराजे साम्न स्तो- भदशेनात् ॥ २ ॥
छान्दोग्योपनिषद्
[ अध्याय १ < > ¬>
भादि उकार है; ऊँचा धरथत् उपरकी ओर स्थित आदिलका ही उदूगाता रोग] गान करते दै, अतः उकार ही यह स्तोभ है । आदि देवतासम्बन्धी सामम ऊ स्तोम है, अतः आदित्य उकार है- | रेी उपासना करे ] । निहव आहानक्गो कहते दै; वह एकार स्तोभ दै, क्यो. किं एहि एेसा कहकर रोग पुकारा करते ह, उस सादृश्यके कारण [ निहव एकार है ] । विश्वेदेव जदोयिकार रहै, क्थोकि वैरवदेव्य सामे यह स्तोभ देखा जाता दै । भ जापति हिकार है, क्योंकि उसका किसी प्रकार निर्वचन नहीं किया ना सकता तथा हकार भी अव्यक्त ही है। प्राण स्वर दै; श्वरः बह एक प्रकारका स्तोम है । स्वरका कारण होनेमे उससे प्राणकी सदश्चता होनेके कारण (माण स्वर है] । अन्न याहै। धाः यह स्तोम अन्न है,
क्योक्ति अन्नसे ही यह प्राणी यत्रा .
करता है अतः उसकी समानता होनेके भरण अन्न ॒या दहै । वाक् यह
स्तोभ विशट्--अन्न॒ अथवा देवताविरेष दै, वयोंकि वैराज सामे वारस्तोभ देला जाता दै ॥२॥
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खण्ड १२ ] श्ाङ्करभाष्याथ १४७
अनिरक्तलयोदराः स्तोभः संचरो हकारः ॥६॥
जिसका [ विरोपरूप्सो ] निरूपण नही क्या नाता ओर जो [ कारयरूपसे ] संचार करनेवास है वह तेरहवाँ स्तोम हुंकार है ॥ २ ॥ अनिरुक्तोऽव्यक्तत्वादिदं चेदं | जो अव्यक्तं होनेके कारण शह चेति निर्वक्तं न॒ शक्यत | ओर यह" इस रूपे ० नही कि किया जा सकता, इसलिये अनिरुक्त इत्यत् संचरो म हे ओर संचर अर्थात् विकठ्प्यमान- स्वरूप इत्यथः। कोऽसो १ इत्याद स्वरूप है, वह क्या है १ सो बतलाते त्रयोदशः स्तोभो हकारः । | दब तेवो स्तोम हए द। बह र र „ _ । अव्यक्त ही है, अतः अनिरुक्तविरोष- एवोपास्य इत्यभिप्रायः ॥ २॥ । अभिप्राय हे ॥ ३ ॥
ू ( न © न्न
स्तोमाक्षरसम्बन्धिनी उपासनाजका एल
स्तोभाक्षरोपासनाफलमाद-- | अब स्तोभाक्षरोकी उपास्नाका फल बताते है--
` दुग्धेऽस्मे वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्न वानन्नादो भवतिय एतामेव<साम्नासुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद्॥४॥ जो इस प्रकार इस सामसम्बन्धिनी उपनिषदो जानता है उसे बाणी, जो वाणीका फल दै उस फलक देती है तथा वह अन्नवान् ओर अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
द्पेऽ्मे वाण्दोदमित्याबु- | ऽस्मे बाग! इादि- वाक्यका अथं पटले (छा १।२ ।
७ मे) क्डा जाचुकादहै। जो
क्रथम् । य एतामेवं यथोक्त-
१४८ छान्दोभ्योपनिष् [ मध्याय ! लक्षणां साम्नां सामावयवस्तो- | इस उपयुक्त रक्षणविशिष्ट स्न
3 „ , ९.. | सामावयवमूत स्तोमाक्षरसम्बन्धिी माक्षरविषयाुपनिपदं दशनं वेद | उपनिषदको नानता दै, उते वह पूर्वोक्त फक मिरता है-पेसा इका तात्पयं है । उपनिषदं वेद् उपति षदं वेद्" यह् पुनरुक्ति अध्यायी समाति सूचित करनेके स्थि दै। अथवा स्ामावयवविषयक उपासन-
विरोषकी समाति बतानेके स्मि परिसमाप्त्यर्थो वेति ॥ ४॥ | हे॥४॥
तस्यैतद्यथोक्तं फरमित्यथः | द्विरभ्यासोऽध्यायपरिसिमाप्त्य्थः
सामावयवविषयोपासनाविशेष-
~ -+ च्च
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये चयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥
~: 9 :-~ इति श्रीमद्गोविन्द्भगवत्पृज्यपादरिष्यपरमदं सपरि वाजकाचारथ-
श्रीमच्छंकरभगवःपादरृतो ऊन्दोग्योपनिषद्धिवरणे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥
द्वितीय अध्याय
पथः कर्व
साधुदशिसे सस्त छामोपासना
ओसिव्येतदक्षरमिस्यादिना
सामावयवविषययुपासनमनेक- फलषुपदिष्टम् । अनन्तरं च स्तोभाक्षरविषयपासनयुक्तम् । सवेथापि सामेकदेशसम्बद्मेव
तदिति । अथेदानीं समस्ते साम्नि समस्तसामविषयाण्युपा- सनानि वक्ष्यामीत्यारभते
शरुतिः । युक्तं दयेकदेशोपासना-
नन्तरमेकदेशिविपयथुपासनयु- च्यत इति ।
[प्रथम अध्यायमें स्थित] ओमिलये- तदक्षरम्" इत्यादि मन्त्रके द्वारा अनेक फर देनेवाटी सामावयवस्षम्बन्धिनी
| उपासनाओंका उपदेश किया गया ।
उसके पश्चात् सामके अवयवभूत स्तोभाक्षरविषयिणी उपासनाका निद पण हआ । वह भी सर्वथा सामके एकदेशसे दी सम्बन्ध रखती है । इसके बाद अव मे समस्त सामे होनेवाली अर्थात् समस्त सामसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना्ओंका वर्णन कंगी--इस आश्चयसे श्रुति आरम्भ करती है । एकदेश [अर्थात् अवयव ] सै सम्बन्ध रखने- वारी उपासनाके अनन्तर एकदेशी ( अवयवी ) से सम्बद्ध उपासनाका
} वर्णनक्तिया नाता है-यह ठीक ही दहै।
ॐ समस्तस्य खट साम्न उपासनःसाधु यत्खट साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥१॥
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१५०
छान्दोग्योषनिषद् < #< < ऋ # +€ < < < € ऋ "ऋ ऋ € € =< € ‰ ऋ ऋ ॐ समस्त सामकी उपासना साघु है । नो सधु
[ मन्याय ¦
होता है उप्र
साम कहते दँ ओर जो असाधु होता दै वह अपाम कहलाता है ॥१॥
समस्तस्य सर्वावयवविशिष्टस्य पाश्चभक्तिकस्य साप्तभक्तिकस्य चेत्यथंः। खल्विति बाक्याल- काराथंः साम्न उपासनं साधु । समस्ते साम्नि सापुदृष्टिविधि-
पत्वा पूरवोपासननिन्दार्थत्व साधुशब्दस्य । नजु पूवत्राविद्यमानं साधुत्वं
समस्ते साम्न्यभिधीयते, न; साधु सामेत्युपास्त इत्युपसंहा- रात् । साधुशब्दः शोभनवाची कथमवगम्यते १ इत्याह-यत्वलु लोके साधु शोमनमनवद प्रसिद्धं तत्सामेत्याचक्षते इलाः ।
-यदसाघु विपरीतं तदसा- मेति ॥ १॥
समस्त अर्थात् सम्पूणं अवते युक्त यानी पाञ्चभक्तिक ओर साप. भक्तिक सामकी उपासना साधु है। खट" यह निपात वाक्की शोभ | बद्ानेके ल्यि है । समस्त सामं । साधुदृष्टिका विधान करने प्रह होनेके कारण साधु शब्द पूवं उपः सनाकी निन्दाके स्वि नहीं दै ।
यदि कदो कि पूवं उपासना † रहनेवाखी ही साधुता समस्त साम बतलायी जाती हे, तो एता कहना ठीक नदी; क्योकि [पूर्वोक्त उपासना
। का] साम साधु है इस प्रकार उपः
सना क्रे" एेसा कहकर उपसंहार । क्रया हे । साघु" शब्द शोभन भथा बोधक है-यह कैसे जाना जता दै १ इसपर कहते दै--रोकषमै जी वप्तु साघु-सोभन भर्थात् निर्दोषः | रूपसे परसिद्ध हे उसको निपुण सामः एेसा कहकर पुकारते है । , तथा जो असाधु यानी विपरीत शेती । द, उसको जसाम कहते है ॥१॥
की तक
ण्ड १] शाङ्करभाष्याथं १५१ >>> ~~ >< < <<
तदुताप्याहुः साम्नैनसुंपागादिति सधुनेनमु- पागादित्येव तदाहूरसाम्नेनसुपागादित्यसाधुनेन- मुपागादित्येव तदाहुः ॥ २.॥ ` इसी विषयमे कहते है [ जन् कहा जाय कि अयुक पुश्ष | इस [ राजा आदि ] के पस सामद्रारा' गया तो [ एेसा कहकर | रोग यही कहते हैँ कि वह इसके पास साधुभावसे गया ओर [ जब यो कहा जाय कि ] वह इसके पास असामद्रारा गया तो [ इससे ] रोग वही कहते है कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुमा ॥ २ ॥ तत्तत्रैव साध्वसाधुविवेक- । वहां-उस साधु-असाधुका विवेक
करण उताप्याहुः । साम्नेनं करने्मे ही कहते दै कि [ जब यह कहा जाता है कि] इस राजा
ध ) सल्ल राजानं सामन्तं चोपागादुपगत अथवा सामन्तके पास ॒सामछ्पसे वाच् । कोऽसौ १ यतोऽसाधुत्व- | गया-कौन गया १ जिससे कि
्राप्त्याशङ्खा स इत्यभिप्रायः । | असाधुत्वकी प्रा्तिकी आशङ्का थ 8 धुत वह--एेसा इसका तार्यं है-- तो शोभनामिप्रायेण साधुनेनधुपा- | उसके बन्धन आदि जसाधु कायेकि गादित्येव तततत्राहलो किकः! | न देखनेवाठे रौकिकं पुरुष यही बन्धनाद्यसाधुकायंमपरयन्तः ।